" झूठा सिन्दूर"

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फीचर्स डेस्क। अक्सर ही आशु कोचिंग आते जाते समय अपनी कोचिंग के रास्ते में पड़ने वाले एक घर को बहुत ध्यान से देखा करती थी। उस घर की बनावट बहुत ही सुन्दर थी जो उसको हमेशा आकृषित करती थी। ये घर उसके गांव का सबसे खूबसूरत घर था। इस घर के मालिक रज्जन निगम(वकील साहब) बहुत ही व्यवहारिक और धनी थे। उनके दो पुत्र और एक पुत्री थी जिन्हें वह गांव से बाहर शहर में पढा़ रहे थे। इस घर में वकील साहब अपनी पत्नी और अपनी मां(जो प्रिंसिपल पद से रिटायर्ड थीं) के साथ रहते थे।

एक दिन कोचिंग जाते समय आशु ने वकील साहब के घर के बाहर एक लड़के को बैठे हुए देखा जिसे उसनें पहले कभी नहीं देखा था।अब आशु प्रत्येक दिन कोचिंग आते जाते समय उस लड़के को देखती। कुछ दिनों के बाद किसी दोस्त के जरिये आशु को पता चला कि वो वकील साहब का छोटा बेटा रविन्द्र है। जिसका एडमिशन जिले के डिग्री काँलेज मे ही हो गया है। गांव से जिला डिग्री काँलेज की दूरी मात्र पन्द्रह किमी.थी।इसलिए रविन्द्र गांव से ही प्रतिदिन काँलेज जाता था और शाम तक वापस लौट आता था। चूंकि आशू की कोचिंग शाम की ही थी इसलिए दोनों की अक्सर मुलाकात हो जाती थी। रविन्द्र ने आशु के घर के सामने रहने वाले अनुज से दोस्ती कर ली जो रिश्ते में आशु का कजिन था और उसके मोहल्ले में आना जाना शुरू कर दिया। जल्द ही रविन्द्र ने आशु से भी दोस्ती कर ली।कुछ दिनों बाद दोनों को अहसास हो गया कि दोनों एक दूसरे से प्रेम करते है।और जल्द ही दोनों के घर वालों को भी इस बात की जानकारी हो गई।दोनों तरफ से प्रतिबन्ध लगना शुरू हो गए।

रविन्द्र के घर वालों ने रविन्द्र का एडमिशन माँस कम्युनिकेशन के कोर्स के लिए करा दिया और उसके दुबारा शहर जाने की तैयारी होने लगी।यहां आशु को जब पता चला तो उसने रविन्द्र से कहा कि जाने से पहले उससे कोर्ट मैरिज कर ले। रविन्द्र भी इसके लिए तैयार हो गया ताकि दोनों के रिश्ते को एक स्थाइत्व मिल जाये। चूंकि आशु के ऊपर नजर रखी जा रही थी तो वह गांव से बाहर नहीं जा सकती थी। रविन्द्र ने जिले में किसी वकील से बात की और अपनी समस्या बताई। वकील ने उसे सलाह दी कि वह आशू के सिग्नेचर और थम्ब सिम्बल किसी कागज पर ले आये। आशू ने एक कागज पर अपने सिग्नेचर और थम्ब सिम्बल लगाकर रविन्द्र के पास पहुंचा दिये।

अगले दिन ही रविन्द्र ने जिला कोर्ट जाकर अपनी कोर्ट मैरिज की प्रोसेस पूरी की उसने वकील से आशू की बात भी कराई।आशू ने भी फोन पर सहमति दे दी और दोनों की कोर्ट मैरिज का सार्टिफिकेट तैयार हो गया।अगले दिन ही रविन्द्र ने उसे शादी के सार्टिफिकेट की एक प्रति सौंप दी और दो दिन बाद पढाई करने के लिए शहर चला गया।वहां से रविन्द्र आशु को फोन करता और दोनों घंटों बातें करते।वो हर दो महीने पर दो तीन दिन के लिए घर भी आता और आशु से भी मिलता ।यहां आशु भी एक सुहागिन की तरह रहती,हाथों मे चूडियां, माथे पर कुमकुम लगाती पर लोगों के डर सिन्दूर छुपा कर लगाती। आशु चाहती थी कि जब तक रविन्द्र की नौकरी न लग जाये तब तक ये बात किसी को न पता चले।धीरे धीरे समय गुजरता गया अब रविन्द्र का गांव आना भी कम हो गया और आशु को फोन करना भी।

आशु को अहसास होने लगा था कि रविन्द्र बदल रहा है कभी कभी वह रविन्द्र से इस बात की शिकायत भी करती पर रविन्द्र उसे समझा देता कि पढ़ाई में व्यस्त है और दोनों के अच्छे भविष्य के लिए वह रात दिन मेहनत कर रहा है ताकि जल्दी नौकरी पा जाये। यों दो साल गुजर गए। पिछले छः महीने से रविन्द्र गांव भी नहीं आया था। एक दिन आशु को पता कि रविन्द्र शहर में जिस घर में किराए से रहता था उस घर की लड़की को अपने साथ लेकर फरार हो गया और पुलिस दोनों को ढ़ूढते हुए उसके घर आयी है। आशु के पैरों तले से जैसे जमीन खिसक गई। उसे विश्वास ही नहीं हो रहा था पर ये बात सच थी। वह सारी रात रोती रही, रविन्द्र का फोन डायल करती रही पर फोन बंद था। आशु की दस दिन  से रविन्द्र से कोई बात नहीं हुई थी।

दूसरे दिन उसे सबसे पहली बुरी खबर ये मिली कि रविन्द्र ने उस लड़की से कोर्ट मैरिज कर ली थी। आशु अपनी कोर्ट मैरिज का सार्टिफिकेट लेकर अपने ही गांव के एक वकील के पास गई ताकि वो ये साबित कर सके कि रविन्द्र ने जो शादी की है वो अवैध है और वो ही रविन्द्र की वैध पत्नी है। पर वहां जकर आशु के होश ही उड़.गये जब उसे पता चला कि उसके पास जो सार्टिफिकेट है वो नकली है।उन दोनों कि तो कभी कोर्ट मैरिज हुई ही नहीं थी।गांव में रहने वाली आशु, जिसे कानून की सही जानकारी नहीं थी उस व्यक्ति द्वारा छली गई थी जिस पर वह सबसे ज्यादा भरोसा करती थी। कुछ दिनों बाद रविन्द्र अपनी पत्नी को लेकर गांव आ गया और गांव में ही रहने लगा।

आशु जिसका जीवन बर्बाद हो चुका था जब भी रविन्द्र को अपने सामने देखती परेशान हो जाती। रविन्द्र ने कभी उससे बात करने की कोशिश नहीं और न ही आशू ने उससे कुछ कहा।एक साल बाद आशु के घर वालों ने सामूहिक सम्मेलन से उसकी भी शादी कर दी।आशु को लगा शायद किसी और से शादी कर के वो रविन्द्र को भूल जायेगी पर ऐसा नहीं हो सका।एक बार के अलावा वो कभी दुबारा अपनी ससुराल वापस नहीं गई।घर वालों ने और ससुराल वालों ने उसे बहुत समझाया पर वो नहीं मानी।

आखिरकार मजबूर हो कर उसके पति ने उसे डाइवोर्स दे दिया। आशु को ऐसा लगा जैसे रविन्द्र से उसका डाइवोर्स हुआ हो उसने खुद को आजाद महसूस किया। आज उसी गांव में आशु और रविन्द्र दोनों रह रहे है। रविन्द्र लोकल न्यूज चैनल मे काम करने लगा है। आशु उसी गांव में एक प्राईवेट स्कूल में पढा़ रही है। रविन्द्र का बेटा आशु के ही स्कूल में पढ़ता है पर वह उसे दूसरे अन्य बच्चों की ही तरह ट्रीट करती है। कभी कभी रविन्द्र भी बच्चे को लेने स्कूल आ जाता है पर अब उसके आने या न आने से  आशु को कोई फर्क नहीं पड़ता है और न ही रविन्द्र को । दोनों एक दूसरे के लिए ऐसे अजनबी हो गए जैसे एक दूसरे को कभी जानते ही नहीं थे और न ही अब कभी एक दूसरे को जानने की कोशिश ही करना चाहते है।

स्टोरी इनपुट :  वाणी तिवारी, प्रयागराज सिटी।