उज्जैन महाकाल की सवारी यात्रा किसने चालू की और क्या इसका महत्व?

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31st July, 2020, Edited by Focus24 team

फीचर्स डेस्क। महाकाल राजा की शाही सवारी का किस प्रकार उद्घाटन हुआ और केसे महाकाल अपने नगर वासी और भक्तों को दर्शन देते हे और उनकी पुकार सुनते ? भगवान शिव राजाधिराज के रूप में विराजमान है। श्रावण मास में वे अपनी प्रजा का हालचाल पता करने के लिए उज्जैन नगर भ्रमण पर निकलते हैं। महाराज महाकाल सबको मिलते हैं, सबको दर्शन देते हैं। एक तरफ सुरक्षा का बड़ा कड़ा दायरा और दूसरी तरफ भक्ति का चरम उत्कर्ष, जिसने भी यह द्र्स्य पहली बार देखा उसकी तो भावावेश में आंखें ही छलछला जाती है। महाकालेश्वर मंदिर का समूचा परिसर जय-जयकारों से गूंज उठता है। हाथी, घोड़े, चंवर डुलाते कर्मील, सरकारी बैंड की ह्रदय विदारक धुन, शहर के प्रतिष्ठित गणमान्य नागरिक, आम जन की श्रद्धा का उमड़ता सैलाब, बिल्वपत्र, ‍विभिन्न फल और विविध प्रकार के फूलों की विशेष रूप से बनी माला, झांझ-मंजीरे, धोल, नगाड़ों,शाही बेंड के साथ होता अनवरत कीर्तन और अपने राजा को देख भर लेने की विकलता के साथ दर्शनार्थी का मन बहुत ही भाव-विभोर हो जाता है।

सवारी के साथ पधारे गजराज अपनी सूंड को ऊंची कर राजा के सम्मान में हर्ष व्यक्त करते हैं। पवित्र मंत्रोच्चार के साथ शाही सवारी काई घंटों के बाद पुन: मंदिर पहुंचती है। नगरवासी दिन भर अपने राजा के सम्मान में किया व्रत सवारी के दर्शन के बाद ही खोलते हैं। उज्जैन नगर के मुख्य मार्ग से भ्रमण करती सवारी का सबसे सुन्दर द्रश्य क्षिप्रा नदी के तट पर देखने को मिलता है, जब नदी के दूसरे छोर से संत-महात्मा भव्य आरती करते हैं और वहीँ विशेष तोप की सलामी के मध्य से राजा महाकाल क्षिप्रा का आचमन करते हैं। देश के अलग-अलग प्रांतों से लोग श्रावण सोमवार की इस दिव्य सवारी के दर्शन करने आते हैं, और मनचाहा वरदान प्राप्त करते हैं। इस भव्य सवारी को देखने के बाद ही राजा महाकालेश्वर की दिव्यता को अनुभूत किया जा सकता है। राजा महाकाल इस तरह श्रावण के प्रति सोमवार एवं भाद्रपद के कृष्ण पक्ष के दो सोमवार नगर भ्रमण करते हैं और कहते हैं कि इस समय महाकाल इतनी राजसी मुद्रा में होते हैं कि हर अभिलाषा को पूरी करने का आशीर्वाद देते चलते हैं।

ऐसे शुरू हुई महाकाल की यात्रा

यहां के विशेषज्ञ बताते हैं कि सावन महीने के आरंभ में महाकाल की सवारी नहीं निकलती थी। सिर्फ सिंधिया वंशजों के सौजन्य से महाराष्ट्रीयन पंचाग के अनुसार दो या तीन सवारी ही निकलती थीं।  एक बार उज्जयिनी के प्रकांड ज्योतिषाचार्य पद्मभूषण स्व0  पं.  सूर्यनारायण व्यास के निवास पर कुछ विद्वजन के साथ कलेक्टर भी बैठे थे।  आपसी विमर्श में परस्पर सहमति से तय हुआ कि क्यों न इस बार सावन के आरंभ से ही सवारी निकाली जाए।  सवारी निकाली गई और उस समय उस प्रथम सवारी का पूजन सम्मान करने वालों में तत्कालीन मुख्यमंत्री गोविंद नारायण सिंह, राजमाता सिेंधिया व शहर के गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे सभी पैदल सवारी में शामिल हुए और इस तरह एक सुन्दर परम्परा का आरंभ हुआ।  

सिंधिया परिवार ने शुरु की परंपरा

सिंधिया परिवार की ओर से शुरू की गई ये परंपरा आज भी जारी है। पहले महाराज स्वयं शामिल होते थे।  बाद में राजमाता नियमित इस यात्रा में शामिल होती रहीं और आज भी उनका कोई ना कोई प्रतिनिधित्व सम्मिलित रहता है। महाकालेश्वर मंदिर में एक अखंड दीप भी आज भी उन्हीं के सौजन्य से प्रज्ज्वलित है। बहुत कम लोग जानते हैं कि भुतपूर्व कलेक्टर स्व।  श्री बुच के खाते में एक अनूठा मील का पत्थर अंकित है। आज जो राजा महाकालेश्वर की सवारी का भव्य स्वरूप है उसका संपूर्ण श्रेय श्री बुच साहब को जाता है। यह बात बहुत कम लोगों को पता है कि शाही सवारी की यह यशस्वी परंपरा का अतीत क्या है और कब से यह परंपरागत आकर्षक रूप में निकाली जाने लगी है? स्वयं बुच साहब ने अपने करीबी मित्रों के बीच चर्चा में बड़े ही विनम्र भाव से बताया था कि कैसे यह सवारी इस स्वरूप तक पहुंची। उन्होंने बताया था कि पहले श्रावण मास के आरंभ में सवारी नहीं निकलती थी, सिर्फ सिंधिया वंशजों के सौजन्य से महाराष्ट्रीयन पंचाग के अनुसार दो या तीन सवारी ही निकलती थी। विशेषकर अमावस्या के बाद ही यह निकलती थी।

एक बार उज्जयिनी के प्रकांड ज्योतिषाचार्य पद्मभूषण स्व0  पं.  सूर्यनारायण व्यास के निवास पर कुछ विद्वजन के साथ कलेक्टर बुच भी बैठे थे। उनमें महाकाल में तत्कालीन पुजारी सुरेन्द्र पुजारी के पिता भी उपस्थित थे। आपसी विचार विमर्श में परस्पर सहमति से तय हुआ कि क्यों न इस बार श्रावण के आरंभ से ही सवारी निकाली जाए और समस्त भार कलेक्टर को दिया जाय। फिर क्या सवारी निकाली गई और उस समय उस प्रथम सवारी का पूजन सम्मान करने वालों में तत्कालीन मुख्यमंत्री गोविंद नारायण सिंह, राजमाता सिेंधिया व शहर के गणमान्य नागरिक प्रमु्ख थे। सभी पैदल सवारी में सम्मिलित हुए और नगर की प्रजा ने रोमांचित होकर घर-घर से पुष्प वर्षा की। इस तरह एक खूबसूरत परंपरा का आरम्भ हुआ।

महाकाल महाराज के रूप में साक्षात करते हैं निवास

सावन महीने में महाकाल की नगरी उज्जैतन में भक्तोंर का तांता लगना शुरू हो जाता है।  उज्जैन सम्राट विक्रमादित्य की राजधानी के रूप में भी इतिहास के पन्नोंर में दर्ज है।  प्राचीन काल में इस शहर को अवन्तिका के नाम से जाना जाता था। इसका उल्लेख प्राचीन धर्मग्रन्थों में भी मिलता है। मान्यता है कि आज भी उज्जैन शहर में भगवान शिव राजाधिराज महाकाल महाराज के रूप में साक्षात निवास करते हैं। सावन, महाकाल और उज्जैन इन तीनों की पवित्र त्रिवेणी से भक्तोंप का जीवन सफल हो जाता है। सावन में शिवभक्ति और शिवभक्तों का उत्साह देखते ही बनता है।

प्रजा अपने महाकाल राजा से मिलने के लिए इस तरह व्याकुल होती है कि शहर के चौराहे-चौराहे पर स्वागत की विशेष तैयारी की जाती है। शाम चार बजे राजकीय ठाट-बाट और वैभव के साथ राजा महाकाल विशेष रूप से फूलों से सुसज्जित चांदी की पालकी में महाकाल राजा सवार होते हैं। जैसे ही राजा महाकाल पालकी में विराजमान होते हैं। ठंडी हवा के एक शीतल झोंके से या हल्की फुहारों से प्रकृति भी उनका भीना सा अभिवादन करती है।

इनपुट सोर्स : ज्योतिषाचार्य विनोद सोनी, भोपाल सिटी।