जेएनयू

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20th November, 2019, Edited by Focus24 team

नई दिल्ली/(अताह तापस चतुर्वेदी) । ग़ौर कीजिएगा, देश में ( ज़्यादातर) जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय के छात्रों की विचारधारा का विरोध नहीं है। विरोध है जेएनयू कैंपस के माहौल का। मीडिया और दूसरे तमाम माध्यमों से जो देश के सामने आ रहा है। भाजपा की सरकार केंद्र में आने के बाद जेएनयू छात्रों की संस्कृति देश के सामने किसी दूसरे देश की संस्कृति की तरह सामने आई है। हालिया रीलीज चुम्मा-चांटी के वीडियोज देखकर तो अखिल भारतीय क्रोध उपज रहा है। 

मैंने तो जेएनयू में पढ़ाई नहीं की ( नहीं तो यूनिवर्सिटी बंद हो जाती), पर इतना समझता हूँ कि 2014 के बाद से यहाँ वामपंथ और दक्षिणपंथ की लड़ाई चरम पर आ गई है। 'लाल गढ़' में 'भगवा' ने पैठ बना ली है। 

अब इस लड़ाई में पूरे देश को पेरा जा रहा है। जैसे गन्ने की पेराई होती है। फ़ायदा बेचनेवाले और ख़रीदनेवाले को होता है। अंत में गन्ने को निचोड़ कर फेंक दिया जाता है। वैसे ही हमारे बहुआयामी देश की विचारधाराएं हमें विकल्प नहीं देतीं, सवाल करती हैं 'बताओ हमारे साथ हो या उनके साथ हो?' हमारे साथ हो तो ठीक है, वर्ना 'मारो साले को'। रस निकालो गन्ने का। अर्थात एक आम भारतीय अपनी स्वर्ग से भी महान जन्मभूमि का एक गन्ना मात्र है। 

सच वामपंथ और दक्षिणपंथ से दूर है। देश की मुख्यधारा से दूर है। क्या आपको लगता है इतने बड़े देश का बौद्धिक वर्ग दिल्ली की एक यूनिवर्सिटी पर निर्भर है!  उस पर यह कि बौद्धिकता वामपंथ के भरोसे है??? जिस वामपंथ पर दुनिया को भरोसा नहीं रहा! 

और वामपंथी बौद्धिकता पर दक्षिणपंथी बौद्धिकता को लादने की क़वायद को आप क्या कहेंगे? जिस तरह वामपंथी होना देश विरोधी होना नहीं होता उसी प्रकार दक्षिणपंथी होने से कोई नारेबाज़ देशभक्त नहीं हो जाता! 

(- अगली कड़ी पढ़ने के लिए बने रहिए फोकस24न्यूज़ पर)