छठ महापर्व भाग 2 : कह देब त लाग जाइ भक्क से...

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29th October, 2019, Edited by Shikha singh

फीचर्स डेस्क। हं त जे है से की काल्ह हमहू खूब सुने शारदा जी के।का गाती हैं महाराज,जेतना सुन्नर वाणी ओतने सौम्य उ! लगता है कि खुद माइये चाची सब नु गा रही है। त जब आप सुने बैठिएगा न,त सांच कहते हैं एगो दुगो से त तनिको मन नही भरेगा,आपको लड़ी लगा के घंटा दो घंटा से पहिले उठने का मने न पड़ेगा।आ हमरा जइसन आदमी त हर गीतवे के बाद आँखि से लोर पुयार हो जायेगा।बात नही न बूझ रहे हैं मेरा आप लोगिन।तब चलिये महाराज अपना हिसाबे से सुना देते हैं,त तनी गौर कीजियेगा।

जे है से की बिहार के सब गीत गवनई का अपना अलगे अलगे राग होता है जैसे,सोहर का अलग राग त चैता के ताल अलग,होरी के गवनई के आपन अलगे ठिठोरी।त ओइसही छठ के पारम्परिक गीतन का अलग तान आ राग है, इतना अलग की छव कोस दुरो से आपका कान चिन्ह जाएगा कि छठे का गीत बज रहा है फलाने जगहा पे।हां, अब ई मत कहियेगा की महाराज नयका छोरवा सभ का छठ का एल्बम अलगे अलगे निकसता है।उ का है कि ई सब है बुलबुला! ई सब को परम्परा आ रीति रेवाज से का मतलब है ई सब के लिए त छठ के गीत भी एगो सिजनिया धंधा है जौन में इस सब भी दु चार लाख कैसेट बेच के साल भर खाता है।

पारम्परिक गीत त गाती है माईं चाची सब।सबसे पहिलका गीत जो जेहन में आता है उ है,

"कांच ही बांस के बहंगिया, बहंगी लचकत जाए"

गीत में बात हो रहा है बांस अउर बहंगी का।त तनी गौर कीजिए मालिक की अब जब सब पेड़ पौधा को काट आप महल अटारी खड़ा कर दिए हैं त उहवाँ कौनो बँसवारी बचा हुआ है का,आ अगर गाहे बगाहे बचबो किआ है त केतना लोग ओकर बहंगी बनाना जानते हैं अब।बहंगी का त छोड़ ही दीजिए पहिले घर मे आजी मामा लोग जौन दउरा बनाता था अब उ केतना जानी बना पाएंगी।आ सरकार सांच कहे तो बमुश्किल माथे दउरा सजता है।आ बाप चाचा भइया लोग कहरियाँ बनते है।आ इसको छोड़िए महाराज का एगो इहे गाना बचा है, त लीजिये सुनिए दूसरका-

"केरवा जे फरेला घवध से ओहपे सुगा मेंड़राय"

अब लीजिये एह में है कि केरवा घवध से फर रहा है और उसपे तोता मंडरा रहा है, त महाराज केरवा के लिए कौनो बगान लगा के रखे हैं का,जौनो बाप दादा का बगीचा लगावल था उहो सब त काट के चौखट के पल्ला आ शीशम के चौकी बनवा लिहिन है लोग।आ हई सुग्गा सब मेंड़रायगा ओहपे, त हमनी हाथ मे दही जमइले हैं का,धर के सरवा के पिंजरा में न रेल देंगे।न रहेगा बाँस न बजेगा बाँसुरी।मेडरात रहीहें ओहिमे।

अब तिसरो गीत सुनने का ताकत रखते हैं त सुनिये-

"रुनकी-झुनकी बेटीS मांगीला,आ पढ़ल पण्डितवा दमाद, ए छठी मइया दर्श दिही न आपन"

जानते हैं लइकाई में जब ई गीत सुनते थे त पितृसत्तात्मक समाज में पलने बढ़ने पर भी लगता था कि ई समाज हम लईकीन को भी मांगता है छटी माई से,ठीक वैसे ही जइसे लइका लोग को।पर साहेब जइसे जइसे बड़हन हुए समाज का असली चेहरा सामने आने लगा। इहा त लोग खाली गीत गाता है मनोरंजन खातिर, नही त बेटी केकरा चाही।अरे बेटा होवेगा त लमहर चेक भंजेगा बियाह में आ बेटी का तो सब जानिबे करते हैं जिनगी भर घसीट घसीट के बाप देबो करेगा तो भी कवन गारंटी उसका खुश रहने का।

भाई अब ऐसा है कि एकरा से जादे न तो हम सुन सकते हैं न लिख सकते हैं, है गट्टा में दम त लिखिए सुनिये आ समझिये।न त छोड़ दीजिए, चार दिन भोंपू बजेगा छठ के गीत का,आपहुँ भावुक हो जाइयेगा आ फिर त बाकी दिन,जे है से त हइए है।

कंटेंट सोर्स : विजया एस कुमार, आरा, बिहार।