छठ महापर्व भाग-5 :  नि:संतान यहाँ करते हैं सूर्य की उपासना, पुत्र प्राप्ति के बाद कराना होता है नेटुआ नाच !

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31st October, 2019, Edited by Shivangi Agarwal

फीचर्स डेस्क। पटना के दुल्हिन बाज़ार स्थित उलार और ओलार्क सूर्य मंदिरदेश के 12 प्रसिद्ध सूर्य मंदिरों में शामिल है। सूर्य भगवान की यह पवित्र नगरी दुल्हिनबजार प्रखंड मुख्यालय से पांच किलोमीटर दक्षिण एसएच2 मुख्यालय पथ पर स्थित है। देश के 12 आर्क स्थलों में कोणार्क और देवार्क ( बिहार का देव) के बाद उलार (उलार्क) भगवान आदित्य की सबसे बड़ी तीसरी आर्क स्थली के रूप में जानी जाती है।

किवंदती के अनुसार दापर युग में भगवान श्रीकृष्ण के पुत्र शाम्ब ऋषि मुनियों के श्राप के कारण कुष्ठ रोग से पीड़ित हो जाते हैं। नारद भगवान की सलाह पर उलार के तालाब में स्नान कर सवा महीने तक सूर्य की उपासना की थी। इससे वे कुष्ठ रोग से मुक्त हो गए थे। प्रचलित कथा के अनुसार है,भगवान श्रीकृष्ण के पुत्र शाम्ब सुबह की बेला में स्नान कर रहे थे, तभी गंगाचार्य ऋषि की नजर उन दोनों पर पड़ गई। यह देख ऋषि गुस्सा हो गए और शाम्ब को कुष्ठ रोग से पीड़ित होने का श्राप दे दिया था। तब नारद जी ने श्राप से मुक्ति के लिए उन्हें 12 स्थानों पर सूर्य मंदिर की स्थापना कर सूर्य की उपासना का उपाय बताया।

इसके बाद शाम्ब ने उलार्क (अब उलार), लोलार्क, औंगार्क, देवार्क, कोर्णाक समेत 12 स्थानों पर सूर्य मंदिर बनवाए। इसके बाद उन्हें श्राप से मुक्ति मिली। इतिहास से मिली जानकारी के अनुसार मुगल शासक औरंगजेब ने इस स्थान पर बने मंदिर को तोड़ दिया था।किंतु फिर भी भक्त उस जीर्णशीर्ण मंदिर के ऊपर लगे पीपल के पेड़ व जंगलरूपी स्थान में भगवान सूर्य की प्रतिमा की पूजा करते रहे।सन1948 में संत सद्गुरु अलबेला बाबा जी महाराज ने संत नारायण दास उर्फ सुखलु दास के आग्रह पर पीपल के पेड़ की पूजा-अर्चना की।

कहते हैं जीसके प्रभाव से पीपल का वह पेड़ सूख गया। उसके बाद अलबेलाजी महाराज ने भक्तों के मदद से इस स्थान पर सूर्य मंदिर का निर्माण कराया कहते हैं कि सच्चे मन से जो भी नि:संतान यहाँ सूर्य की उपासना करते हैं उन्हें संतान की प्राप्ति अवश्य होती है। पुत्र प्राप्ति के बाद मां के आंचल पर नेटुआ नाच करवाया जाता है।

लोगों का मानना है कि मंदिर के चमत्कारी तालाब में स्नान करने से शरीर की थकावट तो दूर हो ही जाती है वही असाध्य चर्म रोगों से भी मुक्ति मिलती है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी इसके जल व आस पास के मिट्टी में गंधक की मौजूदगी पायी गयी है। चैत और कार्तिक, दोनों ही छठ पर यहां लाखों की भीड़ जुटती है।इतना ही नही प्रत्येक रविवार को भी काफी संख्या में श्रद्धालु स्नान कर सूर्य को जल व दूध अर्पित कर अपने कष्टों से मुक्ति पाते हैं।

इनपुट सोर्स :  विजया एस कुमार, आरा, बिहार।style="color:#800080">