आपका बेटा शिक्षा ग्रहण कर रहा तो षष्ठी माँ के पुजा में ये मंत्र जरूरी !

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31st October, 2019, Edited by Priyanka Shukla

फीचर्स डेस्क। आज से छठ पर्व की शुरूआत हो गई। मुख्यत: बिहार का पर्व बड़े हर्षोल्लास और नियम पूर्वक मनाया जाता है। इस पूजा में सूर्य देव की आराधना और षष्ठी देवी के पूजन का विधान। लेकिन बात यह महत्वपूर्ण है कि आखिर कौन हैं षष्ठी देवी और उनके इस नाम के पीछे क्या है इतिहास इन सबको जानने के लिए पढ़े ये आर्टिकल। इसके साथ ही मां षष्ठी को प्रसन्न करने के लिए कुछ मंत्र बताए गए हैं जिनके पढऩे से आपके सारे कष्ट दूर होते हैं।

कहा जाता है कि मां षष्ठी देवी, मां कात्यायनी का ही रूप हैं और मां कात्यायनी को दुर्गा का छठा अवतार माना जाता हैं। शास्त्रों के अनुसार देवी ने कात्यायन ऋषि के घर उनकी पुत्री के रूप में जन्म लिया, इस कारण इनका नाम कात्यायनी पड़ गया। षष्ठी तिथि के अलावा नवरात्र के छठे दिन कात्यायनी देवी की पूरे श्रद्धा भाव से पूजा की जाती है। कैसा है षष्ठी देवी कात्यायनी का स्वरूप - पुराणों के अनुसार मां कात्यायनी देवी का शरीर सोने के समाना चमकीला है।

इसके साथ ही इनके चार भुजा और इनकी सवार सिंह है। मां अपने एक हाथ में तलवार और दूसरे में अपना प्रिय पुष्प कमल धारण करती हैं। जबकि इनके अन्य दो हाथों में वरमुद्रा और अभयमुद्रा विराजते हैं। इसलिए पड़ा मां का नाम कात्यायनी - एक कथा के अनुसार एक वन में कत नाम के एक महर्षि थे उनका एक पुत्र था जिसका नाम कात्य रखा गया। इसके पश्चात कात्य गोत्र में महर्षि कात्यायन ने जन्म लिया। उनकी कोई संतान नहीं थी।

मां भगवती को पुत्री के रूप में पाने की इच्छा रखते हुए उन्होंने पराम्बा की कठोर तपस्या की। इसके बाद महर्षि कात्यायन की तपस्या से प्रसन्न होकर देवी ने उन्हें पुत्री का वरदान दिया। कुछ समय बीतने के बाद राक्षस महिषासुर का अत्याचार अत्यधिक बढ़ गया। तब त्रिदेवों के तेज से एक कन्या ने जन्म लिया और उसका वध कर दिया। कात्य गोत्र में जन्म लेने के कारण देवी का नाम कात्यायनी पड़ गया। इन सरल मंत्रों से करें मां षष्ठी देवी की पूजा चंद्र हासोज्ज वलकरा शार्दू लवर वाहना कात्यायनी शुभं दद्या देवी दानव घातिनि मां कात्यायनी अमोघ फलदायिनी मानी गई हैं।

शिक्षा प्राप्ति के क्षेत्र में प्रयासरत भक्तों को माता की अवश्य उपासना करनी चाहिए।

षष्ठी देवी मंत्र षष्ठांशां प्रकृते शुद्धां सुप्रतिष्ठाण्च सुव्रताम।

सुपुत्रदां च शुभदां दयारूपां जगत्प्रसूम।।

श्वेतचम्पकवर्णाभां रत्नभूषणभूषिताम।

पवित्ररुपां परमां देवसेनां परां भजे।।