संगम पर माघमेला : एक माह का अलौकिक शक्ति से भरा कल्पवास

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9th January, 2020, Edited by manish shukla

अमरीश मनीश शुक्ल 
इलाहाबाद / प्रयागराज । मोक्षदायनी गंगा, ममतामयी यमुना और ज्ञान व आध्यात्म की अद्श्य सरस्वती के मिलन स्थल अर्थात संगम की रेती पर कल से यानी पौष पूर्णिमा से सनातन संस्कृति का अलौकिक दर्शन कल्पवास के तौर पर देखा जा सकेगा। प्रयागराज में कल से पुन: जप का केंद्र होगा, तप की स्थली दिखेगी, ज्ञान का संगम नजर आयेगा, शिविर दर शिविर यज्ञ का अयोजन होंगे, तंबुओं के शहर में आध्यात्म का ब्रह्मांड विद्वमान होगा, पूजा की विधियां देवाताओं को हर तरह से यहां विराजमान होने को बाध्य कर देंगी।  आरती का दिव्य स्वरूप श्रृष्टि की सर्वोत्तम दृश्य के समकक्ष हो जायेगा। कीर्तन की मनमोहनी ध्वनि सुनकर राग द्वेष सब विलुप्त हो जायेंगे। संत समागम का ऐसा अवतरण कण कण में होगा कि मन स्वत: संत हो जायेगा। संगम के हर छोर पर सत्संग की चहुंओर बेला गूंजयमान होगी। मानवता का साक्षात् दर्शन त्रिवेणी तट पर उद्वेलित होगा। वेदपाठ की अविस्मय छटा घनघोर बादलों सी पूरे प्रयागराज मंडल को तृप्त कर देगी। संगम के शंखनाद की स्वर्ग तक गूंज होगी,  संयम का प्रमाण कल्पवासी देंगे और त्याग का प्रदूर्भाव ऐसा होगा कि अपना सर्वस्व दान कर देंगे। कल से कल्पवास का आध्यात्मिक दौर शुरू होगा। आइये इसके बारे में आपकों विस्तार से बताते हैं। 

पौष पूर्णिमा पर प्रथम स्नान
कल्पवास करने के लिय पूरे देश से लोग अपने सांसारिक जीवन का त्याग कर एक माह तक त्याग, संयग और जप तप के साथ आध्यात्मिक उर्जा के पान के लिये संगम की रेती पर एकत्रित होते हैं। यहां कपड़े के बने टेंट में वह एक वक्त का अल्पाहार कर आध्यात्म से अपने भौतिक शरीर का रोम रोम प्रभू भक्ति में लगा देते हैं। इस दिन गंगा अथवा संगम में स्नान के साथ कल्पवास का दौर शुरू होता है और सनातन नियमों का एक माह तक पालन करते हुये  माघी पूर्णिमा तक माघमेला क्षेत्र में प्रवास करते हैं। ऐसी मान्यता है कि एक माह तक कल्पवास करने वाले मनुष्य के सारे पाप नाष्ट हो जाते हैं और वह जीवन-मृत्यु के बंधनों से मुक्त होकर वैकुंठ को प्राप्त करता है। 

तन मन की शुद्धि का महायज्ञ
कल्पवास के दौरान कल्पवासी अपनी सनातन संस्कृति के अनुरूप आध्यात्मिक दिनचर्या का पालन करते हैं । उठने, बैठने, सोने से लेकर प्रत्येक कार्यों को नियमों में समावेशित कर दिया जाता है। संगम की शुद्ध प्राकृतिक हवा, पानी व सात्विक भोजन के साथ सात्विक विचार व आध्यात्मिक उर्जा का यह रेत के एक एक कण में प्रवाह होता है, जिससे कल्पवासी का तन मन दोनों शुद्ध हो जाता है। 

तुलसी और जौ 
कल्पवासी जब कल्पवास करने के लिये पहुंचते हैं तो सर्वाप्रथम अपने तंबू के निर्माण के बाद तुलसी का पौधा रोपते हैं और जौ की बुआई ककी जाती है। सनातन संस्कृति में इन दोनों का स्नान बहुत उंचा है और इसका महत्व भी आध्यत्मिक तौर पर बहुत अधिक है। आप जब भी किसी कल्पवासी के प्रवास स्थल पर पहुंचेंगे तो आप वहां इन दोनों चीजों को अवश्य देखेंगे। 

21 नियमों का करते हैं पालन 
कल्पवास को लेकर पद्मपुराण में 21 नियमों का जिक्र आता है। जिसमें कल्पवास आने के बाद मनुष्य का किस तरह से तपोभूमि पर आध्यात्मिक जीवन यापन करना है, उसका विस्तार से वर्णन है। इसके अनुसार कल्पवासी को झूठ नहीं बोलना चाहिए। कल्पवास के समय घर-गृहस्थी की चिंता से एक बार भी नहीं हो और वह इस मोह माया से मुक्त हो। गंगा में प्रतिदिन दो बार स्नान, शिविर में तुलसी का बिरवा रोपन, ब्रह्मचर्य का पालन करना होता है। वहीं, भोजन को लेकर भी कठोर नियम है, कल्पवासी स्वयं भोजन बनाये अथवा अपनी पत्नी का बनाया भोजन ही करे। प्रतिदिन संतों का सत्संग करें और इंद्रियों पर पूर्ण संयम रखा जाना चाहिये। यहां पर पितरों का पिंडदान भी करना होता है। साथ ही कल्पवास के दौरान किसी भी तरह की  विलासिता नहीं होनी चाहिये। सबसे खास बात किसी की भी निंदा कल्पवास के दौरान नहीं करनी चाहिये और सिर्फ जमीन पर ही सोना चाहिये।