आज के ही दिन 1931 में शहीद हुये थे चंद्रशेखर आजाद....पढिये कैसे अकेले भिड़े थे अंग्रेजी फौज से

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27th February, 2020, Edited by अमरीश मनीष शुक्ला 

अमरीष मनीष शुक्ला 
प्रयागराज  : हिंदुस्तान के इतिहास में आज का दिन स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज है। यह दिन उस वीर क्रांतिकारी के जीवन का आखिरी दिन था जिसके नाम से अंग्रेजी हुकूमत के अधिकारी कांप जाया करते थे। हालांकि बहुत ही कम लोग जानते होंगे कि आज के ही दिन महान क्रांतिकारी पंडित चंद्रशेखर आजाद तिवारी वीरगति को प्राप्त हुए थे। 27 फरवरी 1931 को इलाहाबाद में अंग्रेजी फौज से अकेले ही भिड़े आजाद ने अपनी कसम को पूरा करने के लिये उस वक्त खुद पर गोली चलाई जब उनके पिस्टल से सिर्फ एक गोली बची थी। 15 अंग्रेज सिपाहियों को निशाना बनाने के बाद जब आजाद की पिस्टल में आखरी गोली बची थी तब उस गोली को खुद को मार कर देश के प्रति अपना सर्वोच्च बलिदान कर गए थे। वह आखिरी दिन आज भी कयी बुजुर्गो को याद है और जाने कितनी किताबों में यह घटनाक्रम हमेशा के लिये अमर हो गया है। आइये हम आपको आजाद के उस आखिरी दिन की कहानी से रूबरू कराते हैं और आजादी के नायक वीर योद्धा को श्रद्धांजलि देते हैं।

आजाद का वह आखिरी दिन....
भगत सिंह की गिरफ्तारी के बाद अब उन्हें फांसी दिए जाने की तैयारियां चल रही थी। चंदशेखर आजाद इसे लेकर बहुत ज्यादा परेशान थे। वह जेल तोड़कर भगत सिंह को छुड़ाने की योजना बना चुके थे, लेकिन भगत सिंह जेल से इस तरह बाहर निकलने को तैयार नहीं थे। परेशान चंदशेखर आजाद हर तरह से भगत को की फांसी रोकने का प्रयास कर रहे थे।
बात सन 1931 के फरवरी महीने की है, चंद्र शेखर आजाद गणेश शंकर विद्यार्थी से मिलने सीतापुर जेल गये तो विद्यार्थी ने उन्हें इलाहाबाद जाकर जवाहर लाल नेहरू से मिलने को कहा। जवाहरलाल नेहरू उस समय एक बड़े नेता के तौर पर स्थापित हो चुके थे और पूरे देश में उनकी एक अलग पहचान बन चुकी थी । महात्मा गांधी के साथ नेहरू आजादी की लड़ाई को आगे बढ़ा रहे थे।

27 फरवरी को इलाहाबाद पहुंचे
27 फरवरी को चंद्रशेखर आजाद इलाहाबाद पहुंच गये और जगह जगह पुलिस की घेराबंदी को आसानी से धोखा देकर आनंद भवन पहुंच गये। भेष बदलने के कारण पहले तो नेहरू, चंद्रशेखर से मिलने को तैयार नहीं थे, लेकिन जब आजाद ने अपने उपरी पोशाक उतारी तो नेहरू के होश उड़ गये। जिस क्रांतिकारी की दहशत पूरे देश में अंग्रेजों के बीच थी और जिसे अंग्रेजी हुकूमत कुत्ते की तरह ढूंढ रही थी वह चारों तरफ ब्रिटिश सिपाहियों से घिरे आनंद भवन में नेहरू के सामने खड़ा था। नेहरू उस वक्त कुछ समझ नहीं पा रहे थे कि आखिर वाह क्या करें ? वह डरे-सहमे भी थे और अपनी आने वाली राजनीतिक तैयारियों को आजाद की वजह से धूमिल होता भी देख रहे थे। आनंद भवन के अंदर आखिरकार बातचीत का दौर शुरू हुआ, लेकिन भगत के मुद्दे पर नेहरु कुछ भी सुनने को तैयार नहीं थे। चंदशेखर की कोई भी बात मानने से नेहरु जी ने इनकार कर दिया। गुस्से में आजाद आनंद भवन से बाहर चले गये।

अल्फ्रेड पार्क में बैठे
आजाद अपने साथी सुखदेव आदि के साथ आनंद भवन के नजदीक अल्फ्रेड पार्क में बैठे थे। वहां वह आगामी योजनाओं के विषय पर विचार-विमर्श कर ही रहे थे कि आजाद के अल्फ्रेड पार्क में होने की सूचना अंग्रेजों को दे दी गई । मुखबिरी मिलते ही अंग्रेजों ने क्रांतिकारियों को घेर लिया। अंग्रेजों की कई टुकड़ियां पार्क के अंदर घुस आई जबकि पूरे पार्क को बाहर से भी घेर लिया गया । उस समय किसी का भी पार्क से बचकर निकल पाना मुश्किल था, लेकिन आजाद यूं ही आजाद नहीं बन गए थे । अपनी पिस्टल के दम पर उन्होंने पहले अपने साथियों को पेड़ों की आड़ से बाहर निकाला और खुद अंग्रेजों से अकेले ही भिड़ गए । हाथ में मौजूद पिस्टल और उसमें रही 8 गोलियां खत्म हो गई। आजाद ने अपने पास रखी 8 गोलियों की दूसरी मैगजीन फिर से पिस्टल में लोड कर ली और रुक रुक कर अंग्रेजों को मुंहतोड़ जवाब देते रहे। चंद्रशेखर आजाद ने जितनी भी गोलियां चलाई हर बार अचूक निशाने पर लगी और कोई न कोई वर्दीधारी मारा गया।

लड़ते रहे आजाद
दहशत के कारण अंग्रेज भी पेड़ों की आड़ में छुप चुके थे। एक अकेले  क्रांतिकारी के सामने सैकड़ों अंग्रेज सिपाहियों की टोली बौनी साबित हो रही थी। चंदशेखर आजाद ने 15 वर्दीधारियों को अपना निशाना बना लिया था, लेकिन अब उनकी गोलियां खत्म होने वाली थी। चंदशेखर आजाद ने अपनी पिस्टल चेक की तो अब सिर्फ एक गोली बची हुई थी। वह चाहते तो एक और अंग्रेज अधिकारी को गोली मार सकते थे, लेकिन उन्होंने कसम खाई थी कि जीते जी उन्हें कोई भी अंग्रेज हाथ नहीं लगा सकेगा। इस कसम को पूरी करने के लिए आखिरकार उस महान योद्धा ने वह फैसला लिया जिसे जिससे वह हमेशा के लिए आजाद हो गए। 

अंतिम गोली खुद पर चलाई
27 फरवरी 1931 का वह दिन आजाद के लिये अंतिम दिन बन गया। चंदशेखर आजाद ने पिस्टल की आखिरी गोली अपनी कनपटी पर चला दी और वहीं पेड़ के नीचे हमेशा के लिए शांत होकर अमर हो गए। आजाद की ओर से गोलियां चलनी बंद हुई और लगभग आधे घंटे तक जब एक भी गोली नहीं चली तो अंग्रेज सिपाही धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगे, लेकिन आजाद का खौफ इस तरह था कि एक एक कदम आगे बढ़ने वाले सिपाही जमीन पर रेंगते हुए अब आजाद की ओर बढ रहे थे ।

मृत शरीर पर भी चलाई गोली
आजाद के मृत शरीर पर जब अंग्रेजों की नजर पड़ी तो उन्होंने राहत की सांस ली , लेकिन अंग्रेजो के अंदर चंद्रशेखर आजाद का भय इतना था कि किसी को भी उनके मृत शरीर के पास जाने तक की हिम्मत नहीं थी। उनके मृत शरीर पर भी गोलियाँ चलाई गयी और जब अंग्रेज आश्वस्त हुये तब आजाद की मृत्यु की पुष्टि हुई। यह आज भी कयी किताबों में लिखा है कि आजाद की मुखबिरी एक बड़े नेता ने की थी और यह राज आज भी भारत सरकार के पास सुरक्षित फाइलों में दफन है।

यहां बसते हैं आजाद 
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद अल्फ्रेड पार्क व कंपनी बाग का नाम परिवर्तित कर चंद्रशेखर आजाद पार्क रख दिया गया है। इलाहाबाद के संग्रहालय में आजाद की पिस्टल, मृत्यु के समय की तस्वीर, इनामी पोस्टर समेत कई ऐतिहासिक चीजे दर्शन के लिये रखी हैं।

चंद्रशेखर आजाद का परिचय 
चंद्रशेखर आज़ाद  का पूरा नाम चंद्रशेखर तिवारी था।  23 जुलाई, 1906 को एक आदिवासी ग्राम धिमारपुरा भाबरा में मध्य प्रदेश इनका जन्म हुआ। मौजूदा समय में इस गांव का नाम बदलकर आजादपुरा रखा गया । 1922 में चंद्रशेखर की मुलाकात राम प्रसाद बिस्मिल से हुई और चंद्रशेखर क्रांतिकारी बन गये। चंद्रशेखर आजाद ने हिंदुस्तान रिपब्लिकन क्रांतिकारी दल का पुनर्गठन किया और भगवतीचरण वोहरा, भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु आदि के साथ अंग्रेजी हुकूमत में दहशत फैला दी। आजाद के नाम से अंग्रेजी हुकूमत में इतनी दहशत थी  कि पुलिस की एक्का दुक्का टुकड़ी सूचना मिलने के बाद छापेमारी में भी दहशत खाती थी। 17 जनवरी 1931 को आजाद पर इनाम की घोषणा कर दी गयी।
27 फरवरी 1931 को  वह इलाहाबाद में अंग्रेजों के साथ मुठभेड़ के दौरान वीरगति को प्राप्त हुए थे।

साथियों से क्या कहते थे आजाद 
"गिरफ़्तार होकर अदालत में हाथ बांध बंदरिया का नाच मुझे नहीं नाचना है। मेरी पिस्तौल में आठ गोली हैं और आठ की दूसरी मैगजीन भी है। पन्द्रह दुश्मन पर चलाऊंगा और सोलहवीं खुद पर !" "लेकिन जीते जी अंग्रेजों के हाथ नहीं आउंगा। जिंदा रहते हुये अंग्रेज मुझे हाथ भी नहीं लगा पायेंगे आजाद हूं और आजाद रहूंगा "- चंद्रशेखर आज़ाद !