प्रिय ठकुराइन :  घबराओ मत!.

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2nd November, 2019, Edited by Shivangi Agarwal

फीचर्स डेस्क। नाम नहीं लिखूंगा क्योंकि मैंने कभी तुमको तुम्हारे नाम से पुकारा ही नहीं। कुछ नाम दे रखे थे तुमको उन्ही से काम चल जाता था। जिस उम्र में लड़के ये सोचते हैं कि PCM लूँ या PCB या कॉमर्स अच्छी रहेगी , उस वक़्त मैं ये सोच रहा था कि तुम्हें गली के नुक्कड़ पर रोकूँ या स्कूल के गेट पर। 

बात जो करनी थी तुमसे। 

खैर रोक तो नहीं पाया। 

और हां... मैंने COMMERCE   लिया था.. इसलिए नहीं की CA बनना था, या BANKING  में कोई तीर मारना था बल्कि इसलिए क्योंकि COMMERCE  की क्लास तुम्हारे क्लास के सामने थी। लैब भी तुम्हारी क्लास के ठीक बगल में। 

पढ़ाई का ज़्यादा ज़िक्र नहीं करूँगा क्योंकि केमिस्ट्री में 'गोल्ड नंबर' और फिजिक्स में फ्लेमिंग के नियम से ज्यादा मुझे कुछ नहीं आता था।

 मुझे तो नायक नायिकाओं वाली कवितायें पसंद थी। पहले संयोग श्रृंगार पढ़ा करता था अब वियोग श्रृंगार में एक आध अधकचरी शायरी लिखता हूँ । शायर वायर नहीं हूँ । बस तुकबंदी और वन लाइनर्स लिखता हूँ , । 

देखो फिर भटक गया। रोक तो पाया नहीं तुमको। तो तुम्हारी गली के चक्कर लगाने लगा। जैसे 40 दिन मंदिर जाना।

 16 सोमवार का व्रत करते हैं ना लोग वैसे ही नियम से। 

जैसे दवा खाते हैं ना लोग वैसे ही सुबह शाम। 

बस तुमको देखने की आरज़ू रहा करती थी। घर से बाहर कोई काम होता तो मैं भागता था। जाना कहीं भी लेकिन रास्ता एक ही था – तुम्हारे घर के सामने से होते हुए। 

कुछ दोस्तों ने सलाह दी थी कि देखो और देखकर 'इग्नोर' करो तो तुम्हारा ध्यान मेरी तरफ खिंचेगा। घण्टा कुछ नहीं हुआ। उल्टा तुम देखकर नाक-भौं सिकोड़ने लगी। गुस्से में नाक लाल हो जाती थी तुम्हारी बाप रे। तुम्हारी कुछ कुछ आदतें ' "न बोले तुम ना मैंने कुछ कहा" वाली मेघा जैसी थी । जब जब उसे देखता हूँ मुस्कुरा देता देता हूँ , तुम्हारा चेहरा आँखों के सामने घूम जाता है। उस वक़्त तुम मेरी पसंदीदा श्रद्धा कपूर जैसी थी। लड़का जिससे इश्क़ करता है वो उसके लिए परी से कम होती ही कहाँ है। फिर धीरे धीरे वक़्त बीतता गया, एक रोज़ अचानक तुम ही मुझसे कुछ बोली और सफ़र शुरू हो गया। बहुत अच्छा, बहुत शानदार वक़्त हमने बिताया।

कस्बाई इश्क़ को महसूस किया। मिसकॉल का इंतज़ार, दीदार की आरज़ू, ख़त का जवाब, महीनों बाद फ़ोन का आना, समाज का डर, जाति की दीवार सब कुछ, मगर हम सामान्य रहे। 

मिसाल देते थे लोग, 

आज भी गाहे बगाहे 'हमारा' नाम लोगों की ज़ुबान पर आ ही जाता है। लेकिन वो खूबसूरत पल अब सिर्फ यादों में हैं।

 कोई कुछ भी कहे मगर यकीन है मुझे कि तुमको कभी तो मेरी याद आती ही होगी। कभी तो सोचती होगी। आँखें भीगती होंगी। ना तुम गलत थी ना मैं गलत हूँ गुनहगार ये वक़्त है। खुद को कभी दोष मत देना। जब बहुत ज्यादा बुरा लगे किसी दिन अपने फैसले पर तो उदास मत होना मुझे दम भर कोसना, सुकून मिलेगा। 

एक बात और बतानी थी मेरे घर में एक दीवार का रंग आज भी 'लाइट पर्पल' है. जो तुम्हें पसंद था..

इनपुट : रंजीत ठाकुर के वाल से