निर्भया की रूह कंपा देने वाली 16 दिसंबर 2012 की वह काली रात

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20th March, 2020, Edited by manish shukla

नये साल के इंतजार में दिल्ली की आबोहवा बदलने का क्रम उन दिनों शुरू हो गया था। लोग नये साल की तैयारी में प्लानिंग कर रहे थे और आधी रात तक जगने वाली दिल्ली में रातें और बडी होने लगी थी। सर्द हवाओं का झोंका इन दिनों हांड मांस कंपाने को तैयार था और उपर से कोहरे की धुंध ने ठंड को किसी खूंखार जानवार सरीखा बना दिया था जो अपने बीच आने वाली हर चीजों को निगल जाता था। यह 2012 का आखिरी समय था और 2013 के वेलकम के लिये दिलवालों की नगरी धीरे धीरे तैयार हो रही थी। लेकिन, इसकी आबोहवा में चीखें भरने वाली थी। नये साल से पहले दिल्ली खून से लथपथ होने वाली थी। लेकिन, इन सबसे अंजान दिल्ली की जिंदगी सड़कों पर सरपट दौड़ रही थी। कंपकंपाती सड़क के किनारे पटरियों पर कंबल ताने बेखबर सो रहे लोगों को कुछ आहटें, पदचाप और गाडी के टायरों की चरचराहट की तो आदत हो गयी थी, तो भला उन्हें आने वाली चीख कहां सुनाई पड़ती। वह तो बेखबर थे, अगली सुबह दो वक्त की रोटी की आश में। वर्दीधाारियों को भी सर्दी का असर कुछ पल आराम कर लेने को और चुपचाप एक जगह टिके रहने को विवश कर रहा था और बस रात का वह पहर शुरू हो चुका था, जब दिल्ली की आंखों में आंसू की फुहार आने वाली थी। यह 16 दिसंबर की रात थी। काली अंधेरी रात में कुछ भी साफ आंखों से देखना मुश्किल था, लेकिन स्ट्रीट लाइटों की रोशनी अंधेरे के डर को कम करती नजर आ रही थी...तभी सन्नाटे को चीरती हुई एक आवाज आई...... धौलाकुआं..... द्वारका.....!!


रविवार की इस मनहूस रात में लगभग सवा 9 बज गये थे। निर्भया चहकती हुई खिलखिला रही थी और उसके साथ उसका दोस्त भी निर्भया की हंसी देखकर खुद भी ठहाके लगाने से रोक नहीं पा रहा था। 
आज तो मजा ही आ गया, मैने तो कभी ऐसी फिल्म नहीं देखी — निर्भया ने चहकते हुये अपने दोस्त से कहा तो जवाब में दोस्त ने उसी उत्साह में जवाब दिया 'सच में बहुत ही शानदार फिल्म थी' 
मुझे न इसके नाम से ही पता था कि ये फिल्म बहुत अच्छी होगी कितना अच्छा टाइटल था न ‘लाइफ ऑफ पाई’ 
हां ये तो है और इसका पोस्टर भी तो देखने से पता चल रहा था कि यह शानदार फिल्म होगी

मुझे 'सी' बहुत पंसद है , लेकिन समुद्र इतना खतरनाक हो सकता है और जिंदगी में इतना खतरनाक क्षण भी आ सकता है, यह मुझे अंदाजा तक नहीं था 

चलो निर्भया अब जल्दी करते हैं, घर पहुंचना है, नहीं तो लेट हो जायेंगे। 

हां तो मैने कौन से रोका है चलो — निर्भया ने हाथ खींचते हुये कहा 

अच्छा फिजियोथेरेपी मुझ पर ही इस्तेमाल कर रही हो डाक्टर साहब

दोनों खिलखिलाकर हंस पडे थे 

आटो आटो ..........दोस्त ने एक आटो रोकी, भैया मुनिरका चलोगे

ड्राइवर — हां जी चलेंगे पर रात का किराया ज्यादा होगा 

निर्भया — क्या भैया साकेत ही तो है ये और यहां सिटी मॉल में तो हम हमेशा आते हैं, कभी ज्यादा किराया नहीं लगता, आप ज्यादा क्यों लेंगे

ड्राइवर — अभी रात की आखिरी शिफ्ट है मैडम पैसे ज्यादा लगेंगे 

दोस्त — निर्भया जिद न करो बैठो, जल्दी चलना है, ठीक है भैया आप चलो, ले लेना पैसा 

हां मैडम उतरिये ये आ गया बस स्टैंड 

15 मिनट हो चुके थे और अभी तक कोई बस नहीं थी, घर जाने के लिये देर हो रही थी और चिंता की हल्की सी लकीरें निर्भया के चेहरे पर नजर आ रही थी। 

क्या हुआ निर्भया क्यों परेशान हो, अरे यार कोई बस नहीं आ रही है, देर हो जायेगा। 

अरे आ जायेगी बस और घर आराम से पहुंच जायेंगे परेशान मत हो

यार जब भी ये वाला शो देखों ऐसा ही लफड़ा होता है और पहले देखने का समय नहीं मिलता

 महिपालपुर.....
 धौलाकुआं......
द्वारका ......

तभी तेज आवाज दोनों के कान में गूंजी और सामने से आइआइटी की तरफ से सफेद रंग की लग्जरी बस इनके पास आकर रुक गई। ​दोस्त के चेहरे पर मुस्कान आई तो निर्भया ने उसकी ओर देखा और कुछ सवाल भरी नजर से कहना चाहा। लेकिन, तब तक आवाज गूंजी— 

अरे बहन जी आइये बैठिये 

दोनों परिचालक की मीठी आवाज सुनकर कुछ राहत महसूस करते हुये बस में चढ़ गये। बस में अंदर जाते ही परिचालक ने बस का गेट बंद दिया । निर्भया ने चौंक कर पीछे देखा तो दरवाजा  बंद हो चुका था और परिचालक की नजर निर्भया पर ही थी। एक तेज झटका सा निर्भया को अपने अंदर महसूस हुआ और पूरा गला सूख गया। लेकिन अपने आप को संभालते हुये उसकने थूक गटक लिया और खुद को रिलेक्स करते हुये सीट पर बैठ गयी। बगल में उसका दोस्त भी बैठ गया। 

क्या हुआ निर्भया ? दोस्त ने निर्भया को असहज देखकर पूछा 

कुछ नहीं मुझे यहां सब ठीक नहीं लग रहा है, हम उतर जाते हैं, दूसरी बस ले लेंगे — निर्भया ने फुसफुसाते हुये दोस्त से कहा

अरे तुम फालतू में परेशान हो, अभी बस भी नहीं मिलेगी, जल्दी से घर पहुंच जायेंगे, तुम शांत रहो मैं हूं न 

20 रूपये हुये — परिचालक की आवाज ने दोनों की फुसफसाहट को डरा सा दिया था। बिल्कुल सकपका कर दोनों ने परिचालक की ओर देखा तो परिचालक किसी वहसी की तरह निर्भया को घूर रहा था। निर्भया ने मुंह फेर कर नीचे कर लिया और ठंड में भी आ चुके पसीने को माथे पर पोछती हुई बैठ गयी। पैसा लेकर परिचालक वापस अपनी सीट पर चला गया और उसके हटते ही निर्भया ने कुछ राहत की सांस ली। लेकिन, उसकी धड़कने बेहद ही तेज हो गयी थी और वह खुद को संभालने का प्रयास कर रही थी। 

निर्भया के कानों पर आवाजें गूंज रही थी, जैसे वहां बैठे 6 लोग उसके बारे में ही बात कर रहे हों। चालक अब तक तीन बार पलट कर निर्भया की ओर देख चुका था और मानों पूरे शरीर का निरीक्षण करने के लिये उसने आंख में एक्सरे मशीन लगायी थी। निर्भया ने अपनी जैकेट को थोड़ा और ठीक करते हुये खुद को उसमें सुरक्षित महूसस करने का प्रयास किया। निर्भया ने हल्का से तिरछा चेहरा करते हुये बस का अवलोकन किया तो वह यह समझ गयी कि हर किसी कि नजर और जेहन में इस वक्त क्या चल रहा है। उसे घूर घूर कर सीट के पीछे से ऐसे देखा जा रहा था , जैसे कुर्सी ही उसका शरीर थी।  
लेकिन, अब उसे दो नहीं बारह आंखें हर तरह से मानों खा जाने के लिये देख रही थी और बस इंतजार था कि पहले शिकार पर हमला कौन करें। 
निर्भया का माथा पसीने से भीग चुका था और पसीना बह कर गालों से नीचे गले पर उतर रहा था। शरीर में कंपकपाहट थी और ठंड में भी ठंड का कोई पता नहीं था। चारों तरफ से बस सील थी तो हवा अंदर नहीं आ रही थी और ऐसा लगा कि निर्भया की सांसे रूक रही हो। उसे बेचैनी हो रही थी और सांसे उखड़ रही थी। 

निर्भया — यार मुझे बहुत दिक्कत हो रही है, शरीर में बेचैनी सी है, हम यहीं उतर जाते हैं। 
दोस्त — अभी इतनी रात को दूसरी बस कहां मिलेगी और यहां इतनी सूनसान जगह पर उतरना ठीक नहीं है। 

कुछ सोंचती हुई निर्भया ने दोस्त की आंखों में देखा तो सारे सवाल उसने दोस्त से कर लिये थे

निर्भया को पसीने से भीगा देखकर दोस्त को भी थोड़ा अजीब सा डर लगा और एक बार उसने पूरे बस में अपनी नजर दौडाई, उसे भी लगा मानों वह भेडियों की मांद में बैठा हो। उसका भी गला अजीब से जवाब दे गया और थूक गटक कर उसने खुद को संभालने और निर्भया के सामने सामान्य बना रहने का प्रयास किया। 

पर अगले पल जो हुआ, वह दोनों के लिये आने वाले खतरे की घंटी जैसा था.....

परिचालक ने बड़ी ही अजीब तरीके से कहा कि — इतनी रात को लड़की को लेकर कहां जा रहे हो
दोस्त ने कडे शब्दों में जवाब दिया — इससे तुमसे मतलब 

परिचालक — जबान नीचे करके बात कर 

दोस्त — ये आप किस तरह से बात कर रहे हैं

परिचालक का साथी—  तुझसे जितना पूछा बस उतना बोल, ज्यादा हीरो बनने की कोशिश मत कर 

दोस्त — अरे, तुम्हारा दिमाग तो सही है, ऐसे बात की जाती है

परिचालक का साथी — अभी तुझे बात करना भी सिखा देंगे और बता देंगे कि तेरी औकात क्या है

दोस्त — जुबान संभाल कर बात करिये आप 

परिचालक — साले तू मुझे सिखायेगा बात करना, तेरी.....

निर्भया ने बीच में ही दोस्त को जवाब देने से रोकने के लिये उसके कंधे पर हाथ रखा और निर्भया की तरफ दोस्त पलट ही था कि परिचालक ने दोस्त का कालर पकड़ कर उठा लिया। तब तक बस में बैठे अन्य चार लोग भी परिचालक के पास आ गये और दोस्त को घरे कर खड़े हो गये। 

निर्भया — अरे सॉरी भैया, प्लीज लडाई मत करिये हमें, घर जाना है, आप प्लीज लडाई मत करिये

परिचालक — तू चुप बैठ साली, जनता हूं तुझे किस तरह की लड़की तू है, चुप चाप बैठ जा— एक युवक ने बडी ही क्रूरता भरे शब्दों में जबा दिया

परिचालक का दोस्त — साली रंरररररररर हमें सिखा रही है कि लडाई न करूं, अपने यार को समझा नहीं तो मार के यहीं फेंक देंगे

निर्भया पूरी तरह से अब तक घबरा गयी, और डर कर खामोशी से दोस्त की आंखों की ओर देखा और शांत रहने का इशारा किया। 

परिचालक का दोस्त — आजा रानी अब रात में हमें भी खुश कर दे, अपनी जवानी का रस थोड़ा हमें भी तो चखा, तेरे दोस्त को तो खूब मजा आता होगा। 

दोस्त ने यह सुनकर तेजी से प्रतिक्रया दी अब आप लोग हद पार कर रहे हैं, ये अच्छा नहीं कर रहे हैं। 

परिचालक — अबे साले हद तो अब हम इस लौंडिया के साथ पार करेंगे, क्या चीज मिली है आज, इसे तो छोड़ेंगे नहीं 

निर्भया — ड्राइवर भैया आप गाड़ी रोक दीजिये हमें आगे नहीं जाना है, आप हमें यही उतार दीजिये

ड्राइवर पीछे पलटा और निर्भया की बात को सुनकर हंसता हुआ वापस गाड़ी चलाने लगा। 
निर्भया ने परिचालक से कहा कि भैया प्लीज हमें यहीं उतार दीजिये हमें आगे नहीं जाना है

परिचालक — हां हां उतार देंगे, पहले जो करना है कर तो लें और सभी हंस पड़े 

दोस्त ने इस बात कर फिर से प्रतिरोध किया और कहा कि तुम सब को मैं कल देख लूंगा अभी पुलिस को फोन करता हूं। दोस्त ने मोबाइल फोन जेब से बाहर निकाला ही था कि धड़ाक की आवाज से दोस्त का पूरा सिर चकरा गया। उसके सिर से खून बह रहा था और एक युवक ने उसके सिर पर लोहे के रॉड से वार कर दिया था। केबिन में रखी उस राड से कितनी तेजी से वार किया गया यह निर्भया को तब पता चला जब खून उसके उपर आकर गिरा। 

निर्भया चीख उठी और जोर से रोते हुये दोस्ते को संभालने की कोशिश करनी लगी। तब तक निर्भया को वहशियों ने अपनी ओर खींच लिया। निर्भया ने हाथ झटका और अपने दोस्त को बचाने के लिये भिड़ गये। उसने जितनी तेजी से झापड़ मारा जा सकता था परिचालक को मारा और एक शेरनी की तरह रौद्र रूप में आ गयी। लेकिन, उसका यह साहस बस कुछ पल का ही था। अगले क्षण उसके दोस्त को तीन लोगों ने बस की जमीन पर पीटना शुरू कर दिया और दो ने उसे बस की जमीन पर पटक कर दबोच लिया। 

दोस्त की चीख सुनकर निर्भया ने हार नहीं मानी और परिचालक के हाथ में अपने दांतों से काट खाया। चीख कर गालियां बकता हुआ परिचालक पीछे हटा तो निर्भया दोस्त को बचाने में जुट गयी।  लेकिन, यह पल सिर्फ एक मिनट ही चला होगा और वापस निर्भया दरिंदों के शरीर के नीचे दब चुकी थी। उसको मसलने के लिये भेडियों ने अपना चंगुल उस पर रख दिया था। लेकिन, हाथ पैर झटकते हुये, दरिदों से निर्भया भिड़ गयी। 

वह खुद को बचाने के लिये हर तरह से प्रतिकार कर रही थी। हाथों से वार कर रही थी, लेकिन ऐसा लग रहा था जैसे कोई चूहा शेर के पंजों के सामने छटपटा रहा हो। निर्भया को सीट पर उठा कर पटक दिया गया। वह अब तक पूरी तरह से डर कर कांपने लगी थी, वह चीख रही  थी, प्लीज भैया मुझे छोड़ दो। आपने मुझे बहन बोला था। प्लीज भैया । निर्भया के हाथ के वार को नेतस्तनाबूत करते दो हाथों कयी जोरदार थप्प्ड़ उसके गालों पर जड़ दिये। उसका पूरा सिर झन्ना उठा था। आंखों के आगे अंधेरा सा छा गया और जब फिर से वह होश में लौटी तो उसके चेहरे से खून सा टपक रहा था। 

निर्भया ने वापस से अपने पैर पूरी ताकत के साथ दरिदें पर मारे तो वह पीछे लुढक गये। अगले पल वह पूरी ताकत के साथ दरिदों से भिड़ गयी, लेकिन लात मूंकों की लाठियां उसके शरीर पर बारिश की बूंदों की तरह बरस उठी और शरीर लगा मानों दर्द का गोला बन गया है। निर्भया की आंखे बंद सी हुई और दो पल के लिये वह अचेत होकर वापस उसी सीट पर गिर पड़ी। 
पर निर्भया की आवाज तो मानों कब्र में दफन हो चुकी थी। गंदी गंदी गालियों की बौछार चालू थी। 

 दरिदों पर कोई असर नहीं हो रहा था। मांस के लोथेड़े पर जैसे शेर टूट पड़ता है वैसे ही दरिदों ने शिकार के लिये पंजे मारने शुरू कर दिये। जिश्म के जिस भी हिस्से को दरिदें पकड़ते मानों नोच कर मांस समेत निकाल लेना चाह रहे थे, कोई पैरों से उपर जांघों को नोच रहा था, कोई दोनों पैरों के बीच में। कोई सीने को छलनी करता हुआ तो कोई चेहरे को खरोच रहा था।

लेकिन, क्रूरता और निर्दयता का यह सिर्फ शुरूआती रंग था, बेरहमी से खुद को नोचते हुये प्रतिकार करती निर्भया अब दर्द से चीख रही थी। जिस भी अंग को राक्षस पकड़ रहे थे, वहां से सिर्फ दर्द की चीख ही बाहर निकल रही थी और जॉकेट से लेकर हर कपड़े ऐसे फटते चले गये जैसे जानवर को काटकर चमडा निकाला जा रहा हो। 

अचानक दोस्त ने लहूलुहान अवस्था में निर्भया को बचाने के लिये कदम बढाये, लेकिन खूनी दरिंदे उस पर फिर से पिल पड़े। लात घूंसों की बौछार से वह फिर से बेहोश हो गया और अगले पल दरिदों के हाथ खंजर की तरह उसके कपड़ों को चीर कर अंग से अलग कर रहे  थे और उसके घिसाव से निर्भया चीखती। आंसुओं की तेज लहरें आंखों से फूट कर बह रही थी, चीखें बस के अंदर गूंज रही थी, पर उसके अंग से चिपके आखिरी कपड़े तक नोंच लिये गये और फिर हवश का नंगा नाच शुरू हुआ। 

जिश्म से जोंक की तरह एक साथ तीन तीन लोग लिपटे। किसी ककड़ी खीरे की तरह उसके निजी अंगों को वहसियों ने दांतों से कूंच दिया था। अंग अंग को अपने दांतों से ​नोंच कर खून से शरीर को रंगने में जैसे उन्हें असली आंनद आ रहा था। दर्द से भीगी चीखें जब कानों में गूंजती थी तो मानों पत्थर भी फट कर चूर चूर हो जाये, लेकिन वहसियों की आंखों में हवस की चमक थी और जाने कौन सा आनंद उन्हें यह सब करने के लिये पागल किये हुये थे। 

वहसियों के दांत निर्भया के अंगों पर गड़ते तो वहां से खून निकल आता, निर्भया  अब तो दर्द के ऐसे दौर से गुजर रही थी, मानों उसका एक एक अंग काट कर शरीर से किसी ने अलग कर दिया हो। जैसे गेहूं के पौधों को थ्रेसर में डालकर भूसा बना दिया जाता हो, वैसे ही बारी बारी से वहसियों ने निर्भया के वजूद को तहस नहस कर दिया। 

बस अभी भी अपने पूरे ​रफ्तार में सडक पर दौड़ रही थी और किसी को भी नहीं पता था कि बस के अंदर पूरी दिल्ली की अस्मत तार तार हो रही थी। चलती बस में युवती की अस्मत लूटी जाती रही। दोनों शोर मचाते, कराहते और चिल्लाते रहे। लेकिन, न बस रूकी और ना ही दरिंदे। वह बारी बार से 5 —5 मिनट पर ऐसे लौटते, जैसे उनके अंदर का खूखार भेडियां हडडियों तक को खा जाना चाह रहा था। हवा को चीरती हुई बस ने करीब 24 किलोमीटर की दूरी तय की थी। और बस का ड्राइवर मुकेश बस को लेकर महिपालपुर रोड एनएच-8 से यू टर्न लेकर द्वारका रूट पर गया था । बस अभी भी नहीं रूकी और फिर वापस महिपालपुर आ गया था। 

साली बहुत कड़क थी, इतना नाटक न करती तो इसे भी मजा आता, ले साली अब भुगत तू — परिचालक की राक्षसी आवाज आयी थी कि दूसरा साथी बोला रंंररररररररडडडडडीीीीीीीी इसने बहुत नौटंकी की है, साली ने हाथ उठाया है हमपर उसे ऐसे नहीं छोडेंगे । फाड़ दो साली का पूरा जिश्म । इसे इसकी औकात बताना जरूरी है। साली हम पर हाथ उठायेगी। आज इसे ऐसा सबक सिखायेंगे कि कभी किसी और के लायक यह रहेगी ही नहीं। 


तब तक एक दरिंदा खून से सनी वही रॉड लेकर सामने आ चुका था, जिससे दोस्त पर वार कर फेंका गया था। और दरिंदगी भरा आवाज में चीखते हुये वहसियों ने निर्भया के चीथड़े उड़ा दिये थे। वह दर्द के उस स्तर पर पहुंच गयी थी, ​जहां उसके लिये मौत बेहतर लग रही थी। उसकी सांसे रूक सी गयी थी और शरीर में ऐसे झटके लग रहे थे, जैसे वह किसी भी पल मर जायेगी। 

वह मर भी जाना चाहती थी, उसे दर्द के आगे मौत ही सबसे अच्छा कारण लग रही थी। उसे इतना अधिक दर्द हो रहा था कि उसका पूरा शरीर शून्य हो चुका था। उसे अपने शरीर का कोई अंग महसूस ही नहीं हो रहा था। उसे अपने पैरों में जान नहीं नजर आ रही थी। ऐसा लगा कि कमर के नीचे का पूरा हिस्सा ही किसी ने काटकर अलग कर दिया हो। 


लेकिन, कुछ ही पल बीता रहा होगा कि एक बार फिर से दर्द का झोंका आया। दरिंदों ने होटल एरिया के सामनेचलती बस से ही दोनों को गेंट से बाहर फेंक दिया। 
रात के लगभग सवा दस बज रहे थे और पिछले एक घंटे से दर्द का ऐसा दौर निर्भया ने देखा था जिसे सोंचने मात्र से पत्थर दिल इंसान की रूह कांप जाये। 


बाहर ठंडी हवा और सर्द मौसम हांड मांस कंपा रहा था और निर्भया व उसके दोस्त के शरीर पर एक भी कपड़े नहीं थी। निर्भया की आंखें पथरा गयी थी। उसके पूरे जिस्म से सिर्फ खून बह रहा था। वह अब तक होश में आ चुकी थी, लेकिन ठंड से दर्द अपने चरम पर पहुंच चुका था। वह आधा ही सचेत अवस्था में थी, लगभग 20 मिनट ऐसे ही गुजर गये, लेकिन न उनमें उठने की हिम्मत थी और न ही दो कदम चल पाने की ताकत। 

अपने आप से खड़े होने लायक की स्थिति में भी निर्भया नहीं थी और उपर से बिना वस़्त्र के एक औरत का जिस्म लेकर बैठी थी, जिसे हर भेडियां सिर्फ नोंचना जानता था, ढंकना नहीं। अपने हाथों से खुद को ढंके पता नहीं वह शरीर को ढक रही थी, दर्द को कम कर रही थी यह ठंड से बचने का प्रयास कर रही थी। तभी सामने से एक जीप की रोशनी उन पर पड़ी और जीप रूक गयी। 


यह इगिस कंपनी के पेट्रोलिंग ऑफिसर की गाड़ी थी। सामने का नजारा देखकर उसके भी होश उड़ गये और एक पल उसे अपनी नजर पर यकीन ही नहीं हुआ। आफिसर ने तत्काल पुलिस इमरजेंसी पर काल किया और बताया कि वह इगिस कंपनी नेशनल हाइवे की सिक्योरिटी से बोल रहा है और यहां लहूलुहान अवस्था में अचेत होकर एक युवक और युवती नग्न अवस्था में हे। यह फोन काल 10.22 मिनट पर दिल्ली कैंट थाने पहुंची थी। 


महिपालपुर से दिल्ली कैंट की तरफ आने पर जीएमआर कंपनी के गेट के सामने अब तक भीड़ लग चुकी थी। लेाग एक लड़का व एक लड़की को बिना कपड़ों के बैठे हुये देख रहे थे। दिल्ली के दिलवाले तमाशबीन बने हुये थे। किसी को इतनी फिक्र नहीं थी कि एक चद्दर लाकर उनका जिस्म ढक दे। इसानियत से न ही सही शर्म वस एक औरत का खुला जिस्म भी लोगों की नजरें नीची नही कर रहा था। काफी देर तक ठंड में बैठी निर्भया की हालत बिगडती जा रही थी और उसे ठंड ने और बुरी तरीके से तोड़ना शुरू कर दिया था। 

पीसीआर मौके पर पहुंची, लेकिन सूचना मिलने के बाद भी पुलिस की यह गाड़ी एक अदद तन ढकने का इंतजाम भी करके नहीं पहुंची। युवती को नग्न हालत में देखकर पीसीआर कर्मियों की भी समझ नहीं आ रहा था कि उन्हें जिप्सी में कैसे बिठाएं। क्योंकि जिप्सी में कंबल नहीं था, जिससे युवती को लपेट दिया जाता। फिर पास के एक होटल से चद्दर लिया गया और उसी से ​तनढक कर उन्हें सफदरजंग पहुंचा दिया गया। रात के लगभग 11 बजे वसंत विहार पुलिस को सूचना मिली कि  जिस इलाके में वारदात हुई है वह इलाका उनका लगता है। इसके बाद 11.35 बजे तत्कालीन डीसीपी छाया शर्मा अपनी पुलिस टीम के साथ अस्पताल पहुंची थीं। कुछ ही देर में पूरे जिला पुलिस की फोर्स इलाके में थी, जांच पड़ताल शुरू हो गयी।


अगली सुबह इस घटना ने पूरी दिल्ली सरकार का , पूरी दिल्ली पुलिस का, पूरी दिल्ली की जनता का सिर शर्म से झुका दिया था। यह बात फैलते देर न लगी और एक दिन में ही बात पूरे देश को पता चल गयी थी। यह दिल्ली पर नहीं देश की आबरू पर हवश का हमला था और निर्भया के लिये एक साथ पूरा देश उठ खड़ा हुआ था। देश के दिल कहे जाने वाले शहर की इस वारदात ने पूरे देश की आंखों में आंसू भर दिये ​थी। निर्भया का इलाज ढंग से नहीं हो पाया और नही उसका आपरेशन। जान बचाने के लिये उसे सिंगापुर ले जाया गया और उम्मीद थी कि उसकी जान बच जायेगी। लेकिन, निर्भया तो शायद जीना ही अब नहीं चाहती थी। 

उसने इंसानियत का वह रूप देख लिया था, जिसे देखकर आखिर कोई जीना भी क्यों चाहेगा। 29 दिसंबर 2012 को निर्भया ने मात्र 23 साल की उम्र में दुनिया को अलविदा कह दिया था। वह भगत सिंह तो नहीं थी, लेकिन उसने एक क्रांति की मशाल देश में जला दी थी, लगा था कि देश अब बदल जायेगा। अब बेटियों के लिये यह समाज संजीदा होगा। अब फिर कभी कोई निर्भया नहीं मरेंगी। लेकिन, अफसोस कोई क्रांति नहीं आई। निर्भया को इंसाफ मिलने में 7 साल लग गये। आज 7 साल बाद चार दोषियों को फांसी पर लटका दिया गया। लेकिन, क्या सच में निर्भया को इंसाफ मिल गया है.....क्या आज से हिंदुस्तान की बेटियां सुरक्षित रहेंगी। 

जय हिंद
अमरीश मनीश शुक्ल 
प्रयागराज, उत्तर प्रदेश