जेएनयू -3 : नार्थ कैंपस पर भगवा गान है और साउथ कैंपस में लाल सलाम! 

Slider 1
« »
21st November, 2019, Edited by Focus24 team

नई दिल्ली (अताह तापस चतुर्वेदी)। तस्वीर जेएनयू के कुलपति अर्थात वाइस चांसलर का विरोध दर्शा रही है। कुलपति बात करने को राज़ी नहीं। छात्र आगबबूला हैं, मानते हैं इसके पीछे सरकार है। वैसे फ़ीस बढ़ोतरी का मुद्दा उचित है। शोध छात्रों के लिए यह पढ़ाई बंद हो जाने सी परेशानी है। रिसर्च बहुत वक़्त और पैसे माँगती है। जेएनयू के अनेक शोधार्थी ख़र्च चलाने के लिए बाहर काम भी करते हैं। जेएनयू भारत के सबसे उम्दा रिसर्च विवियों में एक है। दिल्ली में कहा जाता है ' ग्रेजुएशन के लिए डीयू ( दिल्ली यूनिवर्सिटी) और पीजी ( पोस्ट ग्रेजुएशन) के लिए जेएनयू।' दिल्ली में स्कूल के बाद की पढ़ाई के यही दो ध्रुव हैं।

डीयू नार्थ कैंपस है और जेएनयू साउथ कैंपस। नार्थ कैंपस पर भगवा गान है और साउथ कैंपस में लाल सलाम। यों कहें कि ग्रेजुएशन राष्ट्रवाद से होता है, पोस्ट ग्रेजुएशन कम्युनिज़्म से। वामपंथी धड़ा कैंपस में संघ को रोकने के लिए ' लेफ़्ट यूनिटी' बनाकर एक हो गया है, छात्र संघ पर उसका मज़बूत क़ब्ज़ा बरक़रार है। यह स्पष्ट है कि जेएनयू के अंदर की 'आज़ादी' पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की नज़र है। और इस फ़ीस बढ़ोतरी मुद्दे की आँच में राष्ट्रवादी भी वामपंथियों के बराबर ही रोटियाँ सेंक रहे हैं।

वामी जानते हैं छात्र संघ उसका है किन्तु केंद्र में राष्ट्रवादी सरकार आने से प्रशासन संघ का हो गया है। कैंपस में संघ के नारे एबीवीपी के मुख से ' जो देश के टुकड़े करेगा, हम उसके टुकड़े कर देंगे..., ' जिनको कश्मीर में फिर से ३७० चाहिए उनको पाकिस्तान भेजो..' गूँजने लगे हैं। जेएनयू की मूल संस्कृति के लिए यह स्वीकारना असहज है। वामी दर्शन देश की सीमाओं पर यक़ीन नहीं करता। राष्ट्रवाद उसके लिए जीने की आज़ादी का हनन है। वामी कहते हैं ' कोई कैसे तय कर सकता है, हम कैसे ज़ीयें!'

 हम देश को तोड़ना नहीं चाहते, फ़ासीवादी ताक़तों को रोकना चाहते हैं'!; ' किस करने और शराब पीने से देश की संस्कृति को नुक़सान नहीं पहुँचता'! ;  'हमाम में सब नंगे हैं'! यक़ीन मानिए अगर आप क़स्बाई बंधनों के बीच पले हैं और जेएनयू में पढ़ने का मौक़ा मिल गया तो वामपंथी दर्शन के मुरीद हो जाएँगे। साउथ कैंपस में यही आज़ादी है। शानदार-जानदार और दोस्ताना रवैये के प्रोफ़ेसर्स, मुखर बहसें। लिंगभेद और जतिभेद का निपटारा, ग़रीब को न्याय, अमीरों को ज़मीन पर लाओ, सामन्तवाद ख़त्म हो... सरीखे जनवादी मसलों पर छात्र इतने बेजोड़ तर्क रखते हैं कि मंझोले शहरों के बड़े-बड़े प्रोफ़ेसर्स पानी माँगने लगें। जेएनयू के वातावरण में बुद्ध और बौद्धिकता की हवा बहती है। बस...एक घटक रह जाता है ' अनुशासन'।

वीसी साहब इसी एक बिंदु पर ' आज़ादी' को परिभाषित करना चाहते हैं। जेएनयू का स्वच्छंद एजुकेशन सिस्टम इसके लिए ही बदला जा रहा है। ' भारत तेरे टुकड़े होंगे....'के नारे लगानेवाले खुरापातियों ने जेएनयू की बौद्धिकता पर सवाल खड़े किए हैं। देश उस घटनाक्रम के बाद से जेएनयू से नाराज़ दिखता है। संघ का एजेंडा इससे पुष्ट हुआ है, वामी गरियाये जा रहे हैं। नुक़सान बेचारे ग़रीब छात्रों का हो रहा है जिन्हें राजनीति से मतलब नहीं लेकिन उनकी आगे की पढ़ाई फ़ीस बढ़ोतरी से संकट में है।