जयंती पर विशेष : पुरषोत्तम से हार कर गजल गायक बने जगजीत सिंह

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8th February, 2020, Edited by Focus24 team

बालीवुड डेस्क । जगजीत सिंह के गजल गायक बनने की कहानी बड़ी ही दिलचस्प है। ये उन दिनों की बात है जब जगजीत डीएवी कालेज जालंधर में पढ़ते थे। प्रसिद्ध जासूसी उपन्यासकार सुरेंद्र मोहन पाठक भी उसी कालेज में पढ़ते थे। उन्होंने अपनी आत्मकथा क्या बैरी क्या बेगाना में जगजीत सिंह के क्लासिक सिंगर से गजल गायक बनने की प्रक्रिया बयान की है। पुरषोत्तम जोशी नाम का लड़का शास्त्रीय संगीत में काफी पारंगत था। वो जगजीत सिंह से एक साल जूनियर था। शास्त्रीय संगीत के इंटर कालेज, इंटर यूनिवर्सिटी प्रतियोगिता में वो ही हमेशा पहला स्थान पाता था और जगजीत को दूसरे स्थान से संतोष करना पड़ता था। इस स्थिति में जगजीत सिंह ने क्लासिकल प्रतियोगिता में हिस्सा लेना बंद कर दिया। उन्होंने सुगम संगीत में रूचि लेनी शुरू की। इसके बाद जगजीत सिंह की सफलता के द्वार खुलने शुरू हुए। हर प्रतियोगिता में वे अपना परचम लहराने लगे।

वाद्ययंत्रों पर कमाल का अधिकार

जगजीत सिंह की गायकी तो कमाल की थी ही वहीं वाद्ययंत्रों पर भी उनका कमाल का अधिकार था। वे पूरे आत्मविश्वास के साथ कालेज में दावा करते थे कि उन्हें दुनिया का कोई भी वाद्ययंत्र दे दिया जाए जिसे उन्होंने कभी देखा भी ना हो तो वो उसे बजा देंगी। महज उन्हें आधा घंटा उस वाद्ययंत्र के साथ छोड़ दिया जाए तो वे उसपर कोई भी गीत बजा कर दिखा देंगे। 

जमकर करते थे रियाज

कालेज के दिनों में जगजीत सिंह जमकर रियाज करते थे । उनमें गायन के प्रति  जुनून था। वो सुबह पांच बजे उठाकर दो तीन घंटे रियाज करते। इसके बाद कालेज जाते। कालेज में भी जब ब्रेक के दौरान पब्लिक एड्रेस सिस्टम माइक से प्रिसिंपल का पांच मिनट का भाषण खत्म हो जाता तो जगजीत सिंह उस पर कब्जा जमा कर गाना शुरू कर देते थे। वो पच्चीस मिनट तक बिना इस बात की फिक्र किए की कोई उनका गाना सुन रहा है या नहीं गाते रहते थे। 
हास्टल के लड़कों को भी वे राह चलते पकड़ कर गाना सुनाने लगते थे। कई बार लड़के आजीज आकर कहते ओय तुने तो पास होना नहीं, हमें तो पढ़ने दे। इसपर गुस्से में आकर कहते सालों नाशुक्रो एक दिन ऐसा आएगा कि मेरा गाना सुनने के लिए तुम टिकट खरीदोगे। ऐसा गजब का आत्मविश्वास जगजीत में महज 20 वर्ष की उम्र में था। यह बात कुछ वर्षों में ही सही साबित हुई। जगजीत सिंह गजल किंग बन गए। 

अपनी प्रतिभा को लेकर गजब का आत्मविश्वास था

जगजीत सिंह का जन्म 8 फरवरी 1941 को राजस्थान के श्री गंगानगर में हुआ था।असली नाम जगमोहन सिंह धीमन था। बचपन मे अपने पिता से संगीत विरासत में मिला। गंगानगर मे ही पंडित छगन लाल शर्मा के सानिध्य में दो साल तक शास्त्रीय संगीत सीखने की शुरूआत की। आगे जाकर सैनिया घराने के उस्ताद जमाल ख़ान साहब से ख्याल, ठुमरी और ध्रुपद की बारीकियां सीखीं। पिता की ख़्वाहिश थी कि उनका बेटा भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) में जाए लेकिन जगजीत पर गायक बनने की धुन सवार थी। कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय में पढ़ाई के दौरान संगीत मे उनकी दिलचस्पी देखकर कुलपति प्रोफ़ेसर सूरजभान ने जगजीत सिंह जी को काफ़ी उत्साहित किया। उनके ही कहने पर वे १९६५ में मुंबई आ गए। यहां से संघर्ष का दौर शुरू हुआ। वे पेइंग गेस्ट के तौर पर रहा करते थे और विज्ञापनों के लिए जिंगल्स गाकर या शादी-समारोह वगैरह में गाकर रोज़ी रोटी का जुगाड़ करते रहे। 
 
छी! ये भी कोई सिंगर है,गजल तो तलत महमूद गाते हैं

जब जगजीत सिंह चित्रा से पहली बार मिले थे, तब चित्रा सिंह उन्हें पसंद नहीं करती थीं। चित्रा सिंह पहले से ही देबू प्रसाद दत्ता से शादी कर चुकी थी और उनकी एक बेटी मोना भी थी। चित्रा जहां मुंबई में रहती थीं, उनके सामने एक गुजराती फैमिली रहती थी। जहां जगजीत अक्सर आते और गानों की रिकॉर्डिंग करते थे। एक दिन चित्रा को सामने से आवाज सुनाई दी। जगजीत के जाने के बाद चित्रा ने पड़ोसी से पूछा, 'क्या मामला है?' पड़ोसी ने जगजीत की जमकर तारीफ की और जब उन्हें उनकी रिकॉर्डिंग सुनाई तो चित्रा ने पूछा, सरदार है क्या? जवाब मिला, हां, लेकिन दाढ़ी कटवा दी है। कुछ देर बाद चित्रा ने जगजीत की गायकी सुनकर कहा, 'छी! ये भी कोई सिंगर है। गजल तो तलत महमूद गाते हैं।'

यूं  बने हमसफर

1967 में जब जगजीत और चित्रा एक ही स्टूडियो में रिकॉर्ड कर रहे थे, इसी दौरान वे मिले तो बात हुई। चित्रा बोलीं, 'आपको मेरा ड्राइवर छोड़ देगा घर तक।' रास्ते में चित्रा का घर आया। उन्होंने जगजीत को चाय पर बुलाया। इसी दौरान जगजीत एक गजल गाते हैं और चित्रा इसे किचन से सुन लेती हैं। जब चित्रा ने उनसे पूछा कि किसकी है, जगजीत कहते, 'मेरी है'। इसके बाद चित्रा पहली बार जगजीत से इम्प्रेस हुई।

चित्रा के पति से इजाजत लेकर की शादी

इसके बाद जगजीत और चित्रा अक्सर मिलने लगे और एक दूसरे को पसंद करने लगे। वहीं दूसरी ओर चित्रा और देबू ने राजमंदी से डिवोर्स ले लिया। जगजीत देबू के पास गए और कहा, 'मैं चित्रा से शादी करना चाहता हूं।' जब इजाजत मिली तो शादी की घड़ी आई। इस शादी का खर्च महज 30 रुपये आया था। तबला प्लेयर हरीश ने पुजारी का इंतजाम किया था और गजल सिंगर भूपिंदर सिंह दो माला और मिठाई लाए थे।

 उनका संगीत अंत्यंत मधुर है और उनकी आवाज़ संगीत के साथ खूबसूरती से घुल-मिल जाती है। खालिस उर्दू जानने वालों की मिल्कियत समझी जाने वाली, नवाबों-रक्कासाओं की दुनिया में झनकती और शायरों की महफ़िलों में वाह-वाह की दाद पर इतराती ग़ज़लों को आम आदमी तक पहुंचाने का श्रेय अगर किसी को पहले पहल दिया जाना हो तो जगजीत सिंह का ही नाम ज़ुबां पर आता है। उनकी ग़ज़लों ने न सिर्फ़ उर्दू के कम जानकारों के बीच शेरो-शायरी की समझ में इज़ाफ़ा किया बल्कि ग़ालिब, मीर, मजाज़, जोश और फ़िराक़ जैसे शायरों से भी उनका परिचय कराया। 

युवा बेटे की हादसे में मौत , चित्रा हुईं खामोश

1990 में एक ट्रेजडी ने दोनों को एकदम खामोश कर दिया. जगजीत और चित्रा के बेटे विवेक का कार हादसे में निधन हो गया। 

इनपुट सोर्स : सबनम महरोत्रा, कानपुर सिटी।