छठ महापर्व भाग 4:  ... तो इसलिए इस सूर्यकुंड में स्नान करती हैं व्रती महिलाएं

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30th October, 2019, Edited by Priyanka Shukla

फीचर्स डेस्क। औरंगाबाद शहर से 18 किलोमिटर दूर, गया से 68 किलो मीटर दूर अवस्थित है देव सूर्य मंदिर। आपने कई सूर्य मंदिरों के बारे में पढ़ा, सुना और देखा होगा, लेकिन बिहार के औरंगाबाद जिले के देव स्थित प्राचीन सूर्य मंदिर अलग है। कहा जाता है कि इस मंदिर का निर्माण स्वयं भगवान विश्वकर्मा ने त्रेतायुग में एक रात में की थी। यह देश का एकमात्र ऐसा सूर्य मंदिर है, जिसका दरवाजा पश्चिम की ओर है और ऊंचाई करीब सौ फीट है। देव सूर्य मंदिर देश की धरोहर एवं अनूठी विरासत है। देव सूर्य मंदिर अपनी विशिष्ट कलात्मक भव्यता के साथ-साथ अपने इतिहास के लिए भी प्रसिद्ध है। काले और भूरे पत्थरों की नायाब शिल्पकारी से बना यह सूर्य मंदिर ओड़िशा के पुरी स्थित जगन्नाथ मंदिर से मिलता-जुलता है।

देव सूर्य मंदिर के पाली लिपि में लिखित अभिलेख मिलने से पुरातत्वविद इस मंदिर का निर्माण काल आठवीं-नौवीं सदी के बीच का मानते हैं, कहा जाता है कि इस मंदिर का निर्माण त्रेता युग के बीत जाने के बाद इला-पुत्र पुरुरवा ऐल ने आरंभ करवाया। पुरूरवा' प्राचीन काल में प्रयाग के प्रसिद्ध राजा थे, जो इला के पुत्र थे. इनकी राजधानी प्रतिष्ठानपुर में गंगा नदी के तट पर प्रयाग में थी। महाराज मनु ने अपनी गुणवती कन्या इला का बुध के साथ विवाह कर दिया।इला और बुध के से महाराज पुरूरवा की उत्पत्ति हुई।

कहा जाता है की की राजा ऐल एक बार देव इलाके के जंगल में शिकार खेलने गए थे।शिकार खेलने के समय उन्हें प्यास लगी। उन्होंने अपने आदेशपाल को लोटा भर पानी लाने को कहा। आदेशपाल पानी की तलाश करते हुए एक पानी भरे गड्ढे के पास पहुंचा।वहां से उसने एक लोटा पानी लेकर राजा को दिया। राजा के हाथ में जहां-जहां पानी का स्पर्श हुआ, वहां का कुष्ठ ठीक हो गया।बाद में राजा ने उस गड्ढे में जा कर स्नान किया और उनका कुष्ठ रोग ठीक हो गया।उसके बाद उसी रात जब राजा रात में सोए हुए, तो सपना आया कि जिस गड्ढे में उन्होंने स्नान किया था, उस गड्ढे में तीन मूर्तियां हैं।

कहा जाता है की राजा ने फिर उन मूर्तियों को वहां से निकाल कर एक भव्य मंदिर बनाकर उसमें स्थापित किया। देव मंदिर में सात रथों से सूर्य की उत्कीर्ण प्रस्तर मूर्तियां अपने तीनों रूपों उदयाचल (सुबह) सूर्य, मध्याचल (दोपहर) सूर्य, और अस्ताचल (अस्त) सूर्य के रूप में विद्यमान है।यह सूर्य मंदिर स्थापत्य और वास्तुकला का अद्भुत उदाहरण है। बिना सीमेंट या चूना-गारा का प्रयोग किए आयताकार, वर्गाकार, आर्वाकार, गोलाकार, त्रिभुजाकार आदि कई रूपों और आकारों में काटे गए पत्थरों को जोड़कर बनाया गया यह मंदिर अत्यंत आकर्षक एवं विस्मयकारी है।

मंदिर के बारें में बताया जाता है कि प्रत्येक दिन सुबह चार बजे मंदिर में भगवान को घंटी बजाकर जगाया जाता है। उसके बाद पुजारी भगवान को नहलाते हैं, ललाट पर चंदन लगाते हैं, नया वस्त्र पहनाते हैं. यह परंपरा आदि काल से चली आ रही है. भगवान को आदित्य हृदय स्त्रोत का पाठ सुनाया जाता है। देव छठ पर्व मेला वर्ष में दो बार चैत्र् एवं कार्तिक मास में शुक्‍ल पक्ष की षष्‍ठी तिथि को मेला लगता है। उस समय यहां लाखों की संख्या में श्रद्धालु गण छठ करने के लिए देश के हर कोने से यहाँ आते हैं।श्रधालु गण मंदिर के प्रांगण में आ कर सूर्य देव को दण्‍डवत करते हैं, अर्ध्‍य देते हैं और पूजा करते है।

कहा जाता है कि जो श्रद्धालु भक्त मन से इस मंदिर में भगवान सूर्य की पूजा करते हैं, उनकी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। यहां मंदिर के समीप स्थित सूर्यकुंड तालाब का विशेष महत्व है। इस सूर्यकुंड में स्नान कर व्रती सूर्यदेव की आराधना करते हैं। प्रति रविवार को असंख्‍य श्रधालु भक्‍तगण देव सूर्य मंदिर आकर सूर्य कुण्‍ड में स्‍नान के बाद भगवान भास्‍कर का पूजन करते है। यहाँ सालभर देश के विभिन्न जगहों से लोग इस मंदिर में दर्शन के लिए आते रहते हैं और मनौतियां मांगते हैं, मनौती पूरी होने पर यहां लोग सूर्यदेव को अघ्र्य देने के लिए विशेषकर आया करते है।

इनपुट सोर्स : विजया एस कुमार