लघु कथा : आठवाँ रिश्ता था जो निशा...

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10th July, 2019, Edited by Vineet dubey

फीचर्स डेस्क। "मधु! निशा को घर मत भेजा करो, जब नीना को लोग देखनें आया करें। समझती नहीं हो तुम"  नीना की माँ चीख़ती हुई मधु से बोली। "इस बार भी रिश्ता गया। वे लोग निशा को ही पसन्द करके गए है।" यह नीना का आठवाँ रिश्ता था जो निशा की वजह से टूटा था।  

बचपन से  दोनों साथ पढ़ीं  बढ़ीं और बड़ी हुईं।#निशा बेहद सुंदर और नीना सांवली सलौनी सी। नीना की उदासी से  निशा भी आहत थी । सखी की  उदासी से निशा को शरारत सूझी। अगली बार जब नीना को रिश्ता आया तो निशा उसकी जगह जाकर बैठ गई और नीना उसकी बगल  में। सलौनी सी नीना गुलाबी सूट में बेहद खूबसूरत लग रही थी और विपिन की नज़रें एकटक उस पर गड़ी थीं। नतीजा वही निकला जो निशा चाहती थी। इस बार निशा रिजेक्ट हुई। नीना को पसन्द कर लिया गया। छोटी सी “एक शरारत” नीना का भाग्य चमका गई और दोस्ती की गरिमा भी।

कंटेंट सोर्स : सुरेखा अग्रवाल “स्वरा”, लखनऊ सिटी।