एक बार फिर आ जाओ ना...

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17th January, 2020, Edited by Vineet dubey

मैं धरा पे इस पार प्रिये तुम गगन के उस पार
मैं विहरिणी प्रेम राग थाम जीवन रही गुजार।
तू हमको देख, हमारी नजर से देखो तो ज़रा
दिल की रानी हूँ नहीं मैं इन्द्रलोक की अप्सरा

मन अब भी स्वर सुनता है दिल वश में कहाँ
मन-वीणा झंकृत हुई तू अनुस्वरा तू व्यंजना
तुम विश्वामित्र बन जाओ और मैं तेरी मेनका
बदल गए पात्र मैं यहां तड़पती ज्यों पुरूरवा

शापित क्यों तड़पू बन करके मत्स्या अद्रिका
या कपटी संसार का तिलोत्मा बन संहार करूँ
सूना मन ध्यानमलि अप्सरा सा जल में प्यासा
अर्धांगिनी हूँ तेरी नहीं मैं इन्द्रलोक की अप्सरा

एक बार आ तपते अधरों से अधर मिला जा
पूरी चांदनी रात में तुम्हारी तारों की बरात में
ललचाऊँ तुम्हें रिझाऊं दिखाकर चौंसठ कला
नशीली आँखों से जाम पिला अंग अंग मिला।

एक बार फिर आ जाओ घटा बन छा जाओ
मेरे काया के रोम रोम जर्रे जर्रे में समा जाओ
नापों मेरी हर गहराई, छिपी जिसमें दर्दे जुदाई
बन जाओ मेरा अक्श, मेरा नक्श मेरी परछाई।

तुम बता कर जाते तो ना रोकती कभी तुम्हें
बस एक बार भरपूर देखती जी भर कर तुम्हें
फिर कभी और कहीं भी नहीं टोकती मैं तुम्हें
एक बार बस एक बार वो राग पुनः सुना जाओ।

तू हमको देख, हमारी नजर से देखो तो ज़रा
दिल की रानी हूँ नहीं मैं इन्द्रलोक की अप्सरा।।

इनपुट सोर्स : शबनम मेहरोत्रा, कानपुर सिटी।