जेएनयू - 2 

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20th November, 2019, Edited by Focus24 team

नई दिल्ली (अताह तापस चतुर्वेदी) । जेएनयू के वामपंथी छात्र कहते हैं- जिन्हें साउथ कैंपस का मतलब तक नहीं पता, जिनको नहीं मालूम कैंपस के भीतर किस तरह की विचारपूर्ण और तार्किक बहस होती है और जिनको अंदाज नहीं उच्च शिक्षा का स्तर क्या होता है! वे जेएनयू के विरोध में बोलते-लिखते हैं। अब यही यदि बात उनको पलटाई जाए तो - 'आप कैंपस के भीतर की दुनिया से यदि छत्तीसगढ़ के बस्तर और कश्मीर के कुपवाड़ा की बात कर सकते हैं तो हम क्यों नहीं! 

यह पूछना छात्र अधिकार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन करार दिया जाएगा। यह जेएनयू के वामपंथी झुकाव का विरोधाभास है जिसे पुरानी इंग्लिश में डबल स्टैंडडर्ड कह सकते हैं। भारत पूरा का पूरा देश ही विचारों का है। यहाँ शिशु नहीं विचार पैदा होते हैं। यहाँ जिनके पास विचार नहीं हैं वे भी एक विचार के पैदा होने का कारण बनते हैं। ऐसे में एक कैंपस विचारों का केंद्र नहीं हो सकता! ऊपर से यह कैंपस अपने विचार का विरोध होने पर आक्रामक हो जाता है। देश को सहिष्णुता की सीख देनेवाले यहाँ के जियाले स्वयं सहिष्णु नहीं हैं। हिप्पोक्रेसी मिटाने का गीत गानेवाले, ढपली बजानेवाले 'दारू मत पियो कैंपस में' कहने पर हिप्पोक्रेट हो जाते हैं। 

बात आ रही है ग़रीबी की। जेएनयू में ग़रीब के बच्चे पढ़ते हैं। आगे चलकर देश के होनहार बनते हैं। 

मैं ऐसे किसी ग़रीब से मिलना चाहता हूँ। मेरा जनरल नालेज पाकिस्तानी प्रधानमंत्री से भी गया-गुज़रा है। कोई एक नाम जानना चाहता हूँ जिसने बाहर आकर देश बदल दिया हो। चलिए अर्थशास्त्र पर आते हैं। आजकल आर्थिक मंदी के चलते सारी सिगड़ियाँ सुलगी हुई हैं। 

एक अभिजीत बनर्जी हैं, अभी-अभी ही अर्थशास्त्र का नोबेल पाया है। वे कम से कम ग़रीब नहीं थे।उनका अर्थशास्त्र कांग्रेस के घोषणा पत्र में जगह पा गया। कांग्रेस को सत्ता न दिला पाया। 

एक निर्मला सीतारमन हैं। 'देश में मंदी आ गई है' मानने से पहले ओला और उबर को आटोमोबाइल सेक्टर की हालत ख़स्ता होने का कारण बताते हुए नया ही अर्थशास्त्र बना रही थीं। 

एक कन्हैया कुमार हैं। एक उमर ख़ालिद हैं। दोनों सीधे प्रधानमंत्री को चैलेंज करते हैं। एक ग्रामीण अर्थशास्त्र सुनाते हैं, एक कश्मीर का। कन्हैया के राजनीतिक पदार्पण को आधारभूत बताने जावेद अख़्तर और स्वरा भास्कर आ गए।  राष्ट्रवादी कम से कम ये तो कह सकते हैं ' हमारा ग़रीब चायवाला बिना जेएनयू की क्लास अटैंड किए, प्रधानमंत्री बन गया।'  मोदीजी के लिए आम भी एक लग्ज़री था!