छठ पूजा : सबसे पहले कर्ण ने शुरू की छठ पूजा, जानें छठ के आठ खास बातें!

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31st October, 2019, Edited by Shikha singh

फीचर्स डेस्क। छठ पूजा को लेकर कई साक्ष्य मिलते हैं। पुराणों के अनुसार यह पूजा बहुत कठिन और संयमित तरीके से किया जाता है। इस पूजा को वैसे तो सूर्य की उपासना के रूप में जाना जाता है। इस पूजा के दौरान प्रात:काल में सूर्य की प्रथम किरण और सायंकाल में सूर्य की अंतिम किरण को अघ्र्य देकर पूर्ण किया जाता है। यह पर्व विशेष रूप से बिहार और पूर्वी उत्तरप्रदेश में प्रचलित है। सूर्य की पत्नी उषा की पूजा तीन दिन तक चलने वाले इस पर्व पर पूजा के रूप में केवल सूर्य की ही उपासना नहीं की जाती है बल्कि सूर्य देव की पत्नी उषा और प्रत्यूषा की भी आराधना की जाती है अर्थात प्रात:काल में सूर्य की प्रथम किरण ऊषा तथा सायंकाल में सूर्य की अंतिम किरण प्रत्यूषा को अघ्र्य देकर उनकी उपासना की जाती है।

देशभर में मनाया जाने लगा यह पर्व

छठ त्यौहार पहले मुख्त: पूर्वी भारत के बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई क्षेत्रों में मनाया जाता था, लेकिन अब इसे देशभर में मनाया जाता है। बता दें कि पूर्व भारत के लोग देश के जिस में कोने में रहते हैं वहां पर धूमधाम के साथ संयमित तरीके से इस पर्व को सेलिब्रेट करते हैं।

36 घंटे का कठोर व्रत

इस पर्व के बारें में बता कि छठ की व्रतधारी महिलाएं लगातार 36 घंटे का कठोर व्रत रखती हैं। इस दौरान वे पानी भी ग्रहण नहीं करती। पहला दिन कार्तिक शुक्ल चतुर्थी नहाय-खाय के रूप में मनाया जाता है।

सामूहिक रूप से दिया जाता है अघ्र्य

बांस की टोकरी में अघ्र्य का सूप सजाया जाता है और व्रती के साथ परिवार तथा पड़ोस के सारे लोग अस्ताचलगामी सूर्य को अघ्र्य देने का दृश्य भक्तिमय होता है। सभी छठ व्रती नदी या तालाब के किनारे एकत्रित होकर सामूहिक रूप से अघ्र्य दान संपन्न करते हैं।

व्रती को सोना पड़ता है जमीन पर

चार दिन तक चलने वाले इस पर्व पर व्रती महिलाओं को लगातार उपवास करना होता है। इस दौरान व्रती को भोजन तो छोडऩा ही पड़ता है। यहीं नहीं इस व्रत को करने वाली महिलाओं को जमीन पर ही चार दिन तक सोना पड़ता है। खास यह है कि इस व्रत के दौरान महिलाएं बिना सिलाई वाले वस्त्र को धारण करती हैं।

ये लोकगीत है प्रसिद्ध

छठ महोत्सव के दौरान छठ के लोकगीत गाए जाते हैं, जिससे सारा वातावरण सुरीला और भक्तिमय हो जाता है। 'कईली बरतिया तोहार हे छठी मैया’ जैसे लोकगीतों पर मन झूम उठता है। सूप से की जाती है पूजा छठी मैया की प्रसाद भरे सूप से पूजा की जाती है। चौथे दिन कार्तिक शुक्ल सप्तमी की सुबह उदियमान सूर्य को अघ्र्य दिया जाता है। व्रती वहीं पुन: एकत्र होते हैं, जहां उन्होंने संध्या के समय सूर्य को अघ्र्य दिया था और पुन: सूर्य को अघ्र्य देते हैं।

कर्ण ने की थी इस पूजा की शुरूआत

सबसे पहले सूर्य पुत्र कर्ण ने सूर्य देव की पूजा शुरू की थी। वह प्रतिदिन घंटों कमर तक पानी में खड़े होकर सूर्य को अघ्र्य देता था। बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई क्षेत्रों में इस व्रत को अत्यंत पवित्र माना गया है।