छठ महापर्व  भाग 3 : कह देब त लाग जाइ भक्क से !

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30th October, 2019, Edited by Priyanka Shukla

फीचर्स डेस्क। इ का है कि हमरा पास त आजे से फोन आने लगा कि कुछो होखे न होखे,छठ वाला प्रसादी "ठेकुआ" तो सबको मिलना ही चाहिए।पूरी दुनिया मे छठ के परसादी माने ठेकुआ ही। त का इहे है एगो परसादी,जे हमनी के माई चाची बनाती है सब।न जी ना, पर दुनिया को बताएगा कौन।हमनी त अपने अपने सब भुला गए हैं।सांच कहियेगा,करेजा पे हाथ रख के का आपको सभ याद है। आप सभ को तो गेहूं का सुखाना पीसना त जरुरे याद होगा,आखिर इतना कष्ट से कौआ हांक हांक जे सुखाया जाता है।लेकिन केतना जाने को चावल का धोना सुखाना याद है।आखिर उसी को तो पीस के छठ का परसादी कचवनिया बनता है। त केतना लोग के जीभ ओर कचवनिया का स्वाद आया, नयका जनेरेसनवा को तो पतो नही होगा।

चावल के धो, सूखा, महीन पीस चीनी या गुड़ मिला के गोल गोल लड्डू जैसा बनता है,माई लोग कई बार लइकन खाती ओकरा बीच मे सिक्का भी डाल देती थी ताकी लइकन सब जब फोड़े त ओहमें सिक्का देख के खुश हो जाये। नहाय खाय के दिन का लौउका दाल का परसादी के स्वाद के भुला सकता है, उपरे से माटी या पीतल के बर्तन में पके चना दाल का अपना सोनहा स्वाद,उ के न याद करेगा।पर ई त दुनिया वाले का जाने।स्वाद त छोड़िए न त अब पीतल के बरतने है, उ का है जी की न त अब पितरवा सस्ता है न ही ओकरा घाट के बनावे के लिए पेशेंस।अब के चार घंटा में एगो दाल बनावेगा जबकि इहा त जस्ता के कुकर में चार सिटी में काम तमाम।त महाराज आरामो चाईये आ स्वादों त महाराज दूनो कइसे होगा। लौको कोनो आज जइसन किनाता था,गांव घर मे जिसका घरे होता था वो बैना में देता था छठ वाले घर में और ऐसे बनता था लौका दाल का परसादी। फिर अगिला दिन दूसरका परसादी होता है खरना के खीर रोटी का।

आ जानते हैं, गुड़हा खीर का आनन्दे अलग होता है बिल्कुल अमृत जैसा।सांझ के पुजा के बाद जब चनरमा को अर्घ्य दे के पान्त पर हवन के धुंआ के बीच परसादी में खीर रोटी और फल मिलता है तो उसका अपना अलग स्वाद होता है और उ मंजर भी एकदमे अलग।परसादी के लिए लोग बाग दूर दूर तक जाते हैं परवैतिन के घरे।गांव घर में उसका बयना जाता है सो अलगे।पर ई महानगर के फ्लैट में रहे वाला सब के का पता होगा।बयना का बात छोर दीजिए इहाँ त लोग अपना अगल बगल वाला को चिनहता तक नही है।फिर का परसादी, का खीर रोटी। तब तीसरे दिन सुप पे रखने के लिए बनता है, ठेकुआ आ कचवनिया।साथे साथे सब सीजन वाला फल आ अरग देने के दूध। आ जानते हैं दीवाली से लेके छठ तक के छव दिन कोई फल को हाथ भी नही लगाता।

बुजुर्ग आ बच्चा के लिए तो माफी ही रहता है।बाग बगीचा केकरो हो पर छठ के फल के लिए कोई मनाही नही,जेकरा मन हो जेतना ले जावे,कई बार तो बाग के मालिक सब घरे तक पहुँचा देता था,पर शहरीकरण के दौर में न तो उ बागे बगीचा बचा है न उ लोगे,जे ई सब मानता है। आ जानते हैं छठ के परसादी देने से जादे महत्व है परसादी मांगने पर।गांव सब मे तो बड़ बुजुर्ग लोग भी झोली लेके मांगने पहुच जाते हैं घाट पर।समाज के समरसता का भान तबे होता था।न कोई छोटा न कोई बड़ा।बस परवैतीन आ परसादी के भिखार इहे दु जात।जेतना मेंहरारुन ओतना मांग बहुराइ आ खोईछा, जे सिर्फ उ चाहे ओकर बल बच्चन ही खा सकता है। छठ अब दूर दूर तक फैल गया है इंहा तक विदेशन मे भी,पर खाली ठेकुआ का सुगन्ध काहे पहुंचा सबके नथुना तक।बाकी परसादी काहे न,जरा सोचियेगा।आ ई बर्ष छठ में कचवनिया जरूर बनवाईएगा न त कहि हमरा नवका पीढ़ी इसको बिसरा ही न जाये।बाकी त जे है से हइए है।

इनपुट डेस्क : विजया एस कुमार