एहसास

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13th October, 2019, Edited by Focus24 team

फीचर्स डेस्क। इस पुस्तक के बारे में कुछ लिखने से पहले एक बात साफ करना चाहता हूं कि पृष्ठ संख्या से किसी पुस्तक की महत्ता नहीं आंकी जा सकती। लेखिका निक्की शर्मा पटना में जन्मी और अब मुंबई में बस गई हैं। हिंदी पर उनकी पूरी पकड़ है। वह अपने शब्दों को भटकने नहीं देतीं। जो कहना चाहती हैं, उसे के इर्द-तिगर्द उनकी कलम चलती रहती है और थोड़े ही शब्दों में अपनी बात कह जाती हैं। इस कहानी संग्रह में भी लेखिका ने एहसास जगाती छोटी-छोटी कहानियों को लिखा नहीं बुना है। ५६ पृष्ठ की इस पुस्तक में पाठकों को वह सब कुछ मिलेगा जो वह अपने आसपास देखते हैं और महसूस करते हैं लेकिन देखकर चले जाते हैं। एहसास छोटी-छोटी कहानियों का संग्रह है।

इस संग्रह में कुल जमा १९ छोटी-छोटी कहानियां हैं। पहली कहानी है 'मां उठो न"। इस कहानी में किसी अपने प्रिय के बिछुडऩे का एहसास कराने में लेखिका निक्की शर्मा सफल होती हैं। जब कोई बच्चा बिछ़ुड रही अपनी मां से कहता है-'मां, उठो न, मैं रो रहा हूं। तो यह सुनकर ही आसपास मौजूद लोगों की आंखें नम हो जाती हैं। यह एहसास ही तो है। दूसरी कहानी 'प्यार तो प्यार हैÓ में लेखिका ने यह समझाने का पूरा प्रयास किया है कि नकल करने से प्यार नहीं हो जाता, लेकिन आजकल परिवारों में देखा जाता है कि बड़े-बुजुर्ग किस प्रकार वर्तमान पीढ़ी पर साधिकार अपनी इच्छा थोपने का प्रयास करते हैं। तीसरी कहानी 'गुलाबोÓ बाल विवाह पर आधारित है। बाल विधवा बाल विवाह का साइड इफेक्ट कहा जा सकता है लेकिन समाज इस साइड इफेक्ट को मानने का तैयार ही नहीं था।

बाल विधवा के एहसास के इर्द-गिर्द बुनी कहानी है गुलाबो। इसी प्रकार सभी कहानियां समाज में फैली किसी न किसी बुराई को लुकर बुनी गई हैं। मुखौटा, एहसास, अछूत, प्यार के आगे, बेटियां कमजोर नहीं होती जैसी कहानियां केवल कहानी भर नहीं हैं, यह समाज को जागरूक करने के लिए एक कलमकार द्वारा उठाए गए अभियान का हिस्सा हैं। मुंबई के जाने-माने पत्रकार राजेश विक्रांत ने पुस्तक की भूमिका में 'ये 'एहसास" सृजन की खुश्बू से भरे हैं" लिखकर पुस्तक संग्रह की सार्थकता साबित कर दी है। उन्होंने शायर बशीर बद्र के शेर 'खुदा ऐसे एहसास का नाम है, रहे सामने और दिखाई न दे, का उल्लेख करके साफ कर दिया है कि एहसास है क्या।

एहसास वही कर सकता है जो संवेदनशील हो और लेखिका निक्की शर्मा ने जिस प्रकार विषयों का चयन किया है, उससे यह भी साबित हो जाता है कि लेखक वही हो सकता है जिसमें महसूस करने की क्षमता हो। मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि यदि आप इस पुस्तक को पढऩा शुरू करेंगे तो पूरी पुस्तक एक बार में पढ़ डालेंगे लेकिन फिर भी मन करेगा कि अभी फिर पढऩी है। यह निक्की जी का पहला संग्रह है जो पुस्तक आकार में पाठकों के सामने है। बिना किसी लाग लपेट और बिना किसी शाब्दिक आडंबर के जो महसूस किया, उसे अच्छी और सार्थक कहानियों में बुना है। यह कहानी संग्रह सार्थक बने और भविष्य में भी इसी प्रकार नए संग्रह का आगाज हो, मेरी यही शुभकामनाएं हैं।

पुस्तक समीक्षा: संतराम पाण्डेय