पावस की संध्या

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19th March, 2020, Edited by Focus24 team

तुम्हारे लफ़्ज़ किसी की यादों को क्यूं बयां करते हैं 

पावस की मधुर संध्या में चुप नहीं,जज़्बात बयां करते हैं

तुम्हारे लफ़्ज़ ऐसे जैसे निहारते होें आफताब 

वो तोहफ़े भी ऐसे जैसे  उनमें भी हों जज़्बात 

कैसे रखूँ ? मेरी नज़र से देखो जज़्बात को, ख़्याल को 

लगता है तुम्हारे शेर देते जवाब मेरी नज़रों के सवाल को

कैसे तुम्हारी सांसे मेरे चेहरे को छूकर चली जाती हैं 

फिर तुम्हारी कलम मुझे देख शेर गढ़ती चली जाती है

फिर पावस की बूँदें तप्त देह सहलाती फिसल जाती हैं

तुम्हारे लफ़्जों की बारिश शेर सुना यहीं बरस जाती है

नहीं छोड़ते मुझे अकेला चाय भी तुम्हारे नाम से मीठी 

पावस में खिड़की से बारिश की बूँदे चेहरे पे आ  टिकती

आ के अपनी साँसों से इंतजार को और नमकीन बनाओ 

आहिस्ता आहिस्ता आंखों को चूम पावस के गीत गाओ,

मन का सूनापन नहीं सुहाता पावस की गीली संध्या में 

क्यूँ बार-बार मेरे नयनों का पानी खारा बनता संध्या में 

इसीलिये कहती हूँ  चुप न रहो , कोई शेर सुनाओ 

जो गूँज रहे हैं गीत  प्राणों में ,बस गाओ और  सुनाओ

इनपुट सोर्स : शबनम मेहरोत्रा, कानपुर।