ये अनकहे रिश्ते...

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9th October, 2020, Edited by Pratima Jaiswal

फीचर्स डेस्क। हाईकोर्ट के सीनियर जज मिश्रा जी लॉन में बैठे मस्ती से चाय पी रहे थे और अपना पसंदीदा गाना गुनगुना रहे थे...बड़ी मुश्किल से तो इतवार आता है... पर तभी रीता जी  टपक गई,"आज साहब की अदालत में एक पारिवारिक केस की सुनवाई होनी है।" पहले तो वो चौंके... फिर अपनी मैडम को देख कर मुस्कुराए,"ठीक है भई, अपने साहबजादे को कह दीजिए... उस कन्या के माता पिता को कल शाम को चाय पर बुला लें।"

उनको जैसे जोरदार करेंट लगा...अरे हमने तो कुछ कहा सुना ही नहीं... जज साहब सीधे मतलब की बात पर आ गए... किसी तरह स्वयं को सम्भाल कर बोली,"आपने कैसे समझ लिया... हम प्रणव की पैरवी करने आए हैं।"

वो भी मस्ती के मूड में तो थे ही...उन्हें चिढ़ा कर बोले," हम भी उड़ती चिड़िया के पर गिन लेते हैं... इस समय आप इतनी मिश्री घोल कर बोल रही थी...कोई भी झटका खा जाए...हम किस खेत की मूली हैं।"

"आपकी इस वकीली बुद्धि से हम तो पार नही पा सकते...वो कुछ और जुमला बोलना ही चाह रही थी...वो बीच में ही बेटे को देख पुकार उठे,"अमाँ बरखुरदार...वहाँ से क्या ताकझांक कर रहे हैं...इधर आइए और मिनी के पापा को फोन लगाइए ।"

"आप जानते हैं... मिनी के बारे में।"

"हाँ जी बेटे, कॉफी हाउस में उनको आपके साथ देख चुके हैं।"

"पापा, आज रविवार है.. अभी ही बुला लेते हैं।

जब वो लोग आए तो वो मिनी की मम्मी को देख कर एकदम जड़ हो गए... यही हाल उनका भी था.. 

 जज साहब उन्हें बहुत पसंद करते थे पर उस समय उनकी बहुत ही मामूली  हैसियत के कारण वो रिश्ता नही हो सका था..

सब कुछ इतना अप्रत्याशित था...सब हतप्रभ थे...कोई कुछ बोल नही पा रहा था...जज साहब तो उठ कर अपने कमरे में जाकर बंद हो गए। दोपहर में लंच के लिए मैडम मिश्रा ने उठाया तो हड़बड़ा कर बोले,"प्रणव को गाड़ी निकालने के लिए बोलो...जल्दी चलो...मिनी के घर चलना है।"

सब उनका रवैया देख कर भौचक्के थे...वो बिना किसी की तरफ़ देखे आँख मूंद कर गाड़ी में बैठ गए.  ...वहाँ मिनी ने ही दरवाजा खोला... उसकी आँखें उसकी पोल खोल रही थी...लगता था खूब रोई है... पर दौड कर मम्मी पापा को बुला लाई....उनको देखते ही रीता जी ने उनके आगे अपना आँचल फैला दिया... भरे दिल से मिश्रा जी बोले,"हम लोग आपके आगे झोली फैला कर अपने घर की रोशनी... अपने घर का उजाला आपसे माँग रहे हैं... देखिए... आज इंकार करके निराश मत कीजिएगा... उस दिन मैं अकेला आया था...पर आज तो मेरे साथ सब लोग हैं.. जो रिश्ता उस दिन नही हो पाया... आज दोनों बच्चों को एक करके हमलोग रिश्ता बना लें।"वो रोती हुई रीता जी के गले लग गई ....बहुत मुश्किल से बोल पाई...मैं तो बिल्कुल निराश हो गई थी...उधर प्रणव और मिनी मुस्कुरा रहे थे...बरसों की जमी बर्फ पिघलने लगी थी।

इनपुट सोर्स : नीरजा कृष्णा, पटना सिटी।