अजित ...

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25th November, 2019, Edited by Focus24 team

फीचर्स डेस्क। अगर आपको प्रकांड राजनीतिशास्त्र परिपूर्ण विश्लेषण की उम्मीद है तो इधरीच थांबा! मैं महाराष्ट्र की राजनीति का मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन करने की कोशिश में हूं। मैं अजित पवार के मन में अभी क्या चल रहा होगा सोच रहा हूं। मैं उनके अचानक एनसीपी की घड़ी हाथ से निकालकर भाजपा का कमल फूल पकड़ने के निर्णय का कारण कम से कम अपनी समझ से समझ पा रहा हूं। चाचा अपनी गद्दी के लिए भतीजे को नहीं बेटी को चुनता। भतीजे ने इसलिए अपना नया परिवार चुन लिया। मोदीजी को ट्विटर पर थैंक्यू भी बोल दिया। मेरी समझ कहती है चाचा को भतीजे से वो राग नहीं था, जो बेटी से था। कायदे से होना चाहिए था क्योंकि अजित का जायज हक सुप्रिया से अधिक है।

चाचा पवार की तरह भतीजा पवार भी राकांपा का फाउंडर मेम्बर है। पार्टी को बनाया है भाई उसने। मेरा मानना है अजित ने चाचा के साये से बाहर निकलने और चचेरी बहन से प्रतियोगिता बंद करने के लिए बीजेपी से हाथ मिलाया है। शरद पवार अपनी विरासत बिटिया रानी बड़ी सयानी सुप्रिया ताई को सौंपते यह तय था। अजित ने राकांपा से नहीं चाचा से बगावत की है। ' अजित का बगावत बूझे...राजा का बेटा राजा नहीं बनेगा, आई मीन राजा की बेटी रानी नहीं बनेगी...राजा वो बनेगा जो हकदार होगा...' इस एक कदम से फिलहाल तो अजित सुप्रिया से बहुत आगे निकल गए हैं। राकांपा में फूट दिख रही है। हालांकि राकांपा तब तक प्रभावी रहेगी जब तक शरद होंगे।

सुप्रिया में पिता सी काबिलियत नहीं। मैं नया-नया खेमा बाँधनेवाली तीन पार्टियों कांग्रेस, शिवसेना और राकांपा को सीनियारिटी के क्रम में आंकते हुए पाता हूं कि तीनों का ध्रुव परिवार है। कांग्रेस परिवार के पदचिह्न स्थापित करनेवाली राष्ट्रीय खानदानी पार्टी है। बाकी सभी परिवारवादी पार्टियों की सरदार, आइडल, आइकन। उससे विचारधारा की सहमति दिखानेवाली मुलायम की समाजवादी पार्टी, लालू की राष्ट्रीय जनता दल और शरद की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी न्यूज चैनलों में ज्यादा चर्चा पाती हैं। मुलायम, लालू और शरद ने पार्टी नहीं परिवार के लिए ऱाजनीतिक खेत तैयार किया है। फार्मूला है, पहले बाप खेत तैयार करे और फिर आगे संतानें उसे जोतती रहें। शिवसेना भी इस फ़ेहरिस्त में शामिल हो गई है, जो खानदानी पार्टी पहले से थी, मगर बाल ठाकरे के बाद से खेत की जोताई करनेवाले लल्लू साबित हुए।

शिवसेना का जनाधार बाल ठाकरे से था, ठाकरे परिवार से नहीं, यह साबित हो गया। किंतु बाल-पुत्र उद्धव अपने पुत्र आदित्य के लिए नए सिरे से खेत तैयार करने में लगे हैं।  फसल को कीट-पतंगों और चिड़ियों से बचाने का काम चिड़ीमार संजय राउत कर रहे हैं। इस तरह कांग्रेस, राकांपा और शिवसेना विचारधारा में उत्तर-दक्षिण होकर भी जन्म और गोत्र से परिवारवादी हैं, सो तीनों साथ हो लिए। तीनों पार्टियों के अध्यक्ष अपनी संतानों के भविष्य चलाने के लिए पार्टी चला रहे हैं। वैसे भाजपा भी सोनम गुप्ता से कम बेवफ़ा नहीं है। भाजपा ने उसे बलमा बनाया है जो कभी उसके लिए शक्ति कपूर था। अजित पवार को 70  के आंकड़े से बड़ा प्यार है। वे एंटी करप्शन ब्यूरो के हिसाब से 70 हजार करोड़ रुपए के सिंचाई घोटाले के एक आरोपी हैं, अजित तब शायद उप-मुख्यमंत्री ही थे, कांग्रेस-राकांपा गठबंधन की सरकार थी।

महाराष्ट्र के को-ऑपरेटिव बैंक घोटाले के 70 कथित कर्ता-धर्ताओं में भी उनका नाम है। इसी कारनामे की वजह से मनी लांड्रिंग को लेकर ईडी अर्थात प्रवर्तन निदेशालय (भाजपा का नया हथियार) अजित पवार को पिंजरे का पी चिदम्बरम बना सकती थी। खुदा न खास्ता...लाहौर व्हाया कुवैत यदि भतीजा...चाचा के पास लौट आता है तो वो वापसी क्या वापसी होगी...जिससे शरद-पुत्री सुप्रिया की ताजपोशी पर मुहर लग जाएगी और अजित पर गद्दार सिपहसालार का तमगा! भतीजे पवार ने बड़ी चतुराई और बहुत दूर की सोच से यह खेल खेला है...वे भाजपा का सगा बनकर अपनी नई पहचान बनाने जा रहे हैं। वे महाराष्ट्र की राजनीति में या तो नया इतिहास लिखेंगे या उनका इतिहास बन जाएगा। इतना रिस्क चलता है! रुपया कमाया खूब है। अब नाम कमाने की बारी है, वो भी चाचा के बगैर। उनके चाचा यही करते आए। चाचा से भतीजे ने सीखा!

बुरे काम का बुरा नतीजा... क्यूं भई चाचा ...अरे हां भतीजा