मैं अप्सरा ख़ूबसूरत हूँ…..

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7th July, 2020, Edited by Focus24 team

दर्पन ही नहीं सब कहते मैं अप्सरा ख़ूबसूरत हूँ
दादी नानी बहने सखियॉं सब मिल नजर उतारें
यौवन ने दी दस्तक नार नवेली तके सब दिनरात
गजाला निगाहें गजब शबाब ये अदाएँ जैसे ग़ज़ल

यौवन का खिंचाव सहमी बाला बनी मैं रूपगर्विता
मैं अप्सरा दिल न किसी को दूँ देख दर्पण शरमाऊँ
मैं चाँदनी शीतल मंद पवन सी तुम तपते रेगिस्तान
तू काला अमावस मैं गोरी चाँद सा मुखड़ा मेरा गुमान

तुम कुरूप रहेगा अजन्मा प्यार मरुस्थल सा अनजान
बलिष्ठ काया का अभिमान पर आँखों में प्रंणय निवेदन
बराबर से ठिठक के निकल जाने वाले ये कैसा सरूर
तेरा तकना, ठिठकना जाने क्यूँ दिल भाने लगा ज़रूर

सखियाँ छेड़े तेरे नाम से मन दम्भी न माने मैं अभिमानी
अस्वीकृत प्रेमी आकर्षित करते नित जतन स्वाभिमानी
अकस्मात् कहाँ खो गये तुम अब राह तकूँ दिन रात
तमन्ना मचलने लगी दिल की लगी मन न बहलाये

तुम फिर आये हसरतें रगों में देखो मचलने लगीं
चाहत का पैगाम मिलते ही लब से आह निकलने
तुम्हें पाने की चाहत तपिश जिस्म को पिघलाने लगी
तुम्हारे ख्वाबों की दरिया में मैं सैलाब सा बहने लगी

लड़ रही हूं अपने हठी मन से तुम्हें फिर पाने में के लिए
तोड़ना चाहती हूं हर बंधन तुझमें समा जाने के लिए
सोचती हूं क्या पाया अब जी कर केवल जमाने के लिए
जमाने की परवाह में नहीं छोड़ूगी तुझे चले जाने के लिए

स्वीकार प्रिय प्रणय निमंत्रण कर रूप का गर्व विसर्जित
कर लो मुझ पर नियंत्रण मैं अब हूं तुम्हें संपूर्ण समर्पित
मेरा सबकुछ है तुमको अर्पित, अब नहीं तनिक चिंतित
लोक ने एकाकी बनाया, तुमने किया नव संसार सर्जित
मेरे नवलोक के मनु हो तुम, मैं तुम्हारी श्रद्धा संकल्पित

इनपुट सोर्स : शबनम मेहरोत्रा,कानपुर सिटी।