मणिकर्णिका का एहसास...

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16th May, 2020, Edited by Focus24 team

फीचर्स डेस्क। काशी वासी होने के नाते, और वो भी जन्म से काशी के घाटों के किनारे, जीवन बिताते बिताते, मुझे क्या, किसी को भी एहसास हो जाता है कि, किस घाट पर जाना है, और किस घाट पर नहीं! किस घाट के गुरु कौन और किस घाट के माँझी कौन! किस घाट का पानी गहरा और किस घाट का अन्दाज़ ही नहीं!  ख़ैर, हर व्यक्ति जो, काशी में रहता है उसके मन में, मणिकर्णिका का नाम आते ही, सीधे मृत्यु का संशय होने लगता है! लोग आम भाषा में भी, पूछते है कि, "कहो, मणिकर्णिका जाए क मन ह का"। जो वहाँ से लौटते हैं, वो कपड़ा बदलते हैं और मिर्च पानी का कुल्ला कर घर में प्रवेश करते हैं। 

शायद, सबसे प्रसन्न मृतक होता है कि, मणिकर्णिका जाते, वहाँ, भगवान शंकर, कान में तारक मंत्र फूंक के, इस आत्मा को, परम धाम देते हैं। पर, इधर, घाट वाकरों की टोली अजब निराली निकाली। काशी के घाटों को, पूरा विश्वविद्यालय ही घोषित कर दिया। और, पूरा श्रेय भगवान आशुतोष को इस विश्वविद्यालय का चांसलर बना दिया। अब तो मुहर ही लग गयी। 

इधर, घाट वाकरों ने तो, रोज़ रोज़, मणिकर्णिका धाम का दर्शन करना शुरू कर दिया। रोज़, शमशान की भस्म, ताप, अग्नि, डोम, पंडे, और मृतक के परिजनों के दर्शन करते घाट वकार रोज़ कुछ ना कुछ सीख के रहे। कई बार तो, चिता अग्नि की ताप से लगा, कि कहीं कोई वकार जल ना जाए! मुझे, मणिकर्णिका तीर्थ के बारे में, विस्तार से, स्वामी श्री: अविमुक्तेश्वरानंद जी ने बताया था और इसके, विस्तार के बारे में ज्ञान दिया था। घाट वाक् विश्वविद्यालय के संकाय प्रमुख प्रो Shri Prakash Shukla जी ने, इस परम धाम के बारे में, अपनी महान कृति, "छीरसागर में नींद" में, विस्तृत चर्चा कि, जिसका विमोचन, स्वयं चिता अग्निं के समक्ष हुई थी। मुझे ही नहीं, बल्कि, सभी घाट वाकरों के मन में, रोज़ मणिकर्णिकातीर्थ के दर्शन की लालसा रोज़ रहती है। और उसके बीतते ही, बात में, सारगर्भिता और दिल में, एहसास के सागर भर जाता है। 

तो, अब वो विशेष बात, तो हमने घाट वकार के तौर पर, लगभग पिछले तीन वर्षों से लगातार दर्शन कर के, मैंने महसूस किया, वो मैं आपके सामने ले आता हूँ। 

सबसे पहले, लोग सोचते होंगे कि, आख़िर जिस शिव के नाम पर ये परम धाम मणिकर्णिका है, जिसके बारे में, बालि ने, भगवान राम से, अपने मरते समय बताया कि, जो शिव काशी में, आपके नाम का मंत्र दे कर सबको परम धाम देते हैं, सो अब वही मेरे समक्ष है, तो अब इंतज़ार कैसा! 

तो क्या, वही शिव यहाँ तारक मंत्र देते हैं! और अगर देते हैं तो कैसे और कब देते हैं! क्या, शिव मणिकर्णिका में निवास करते हैं! क्या, शिव उन सबको भी आशीर्वाद देते हैं, जो रोज़ मणिकर्णिका धाम के दर्शन करते हैं! 

मुझे लगता है कि, इन सवालों का जवाब आपको, तभी मिलेगा जब आप, उस धाम को महसूस करेंगे। तब महसूस करेंगे, जब आपके प्राण चेतना आपके पास हो। आप, शिव को महसूस करेंगे, जब आपके मन में ऐसी श्रद्धा रहेगी। अगर आप केवल, फ़ोटो सेल्फ़ी के लिए गए होंगे तो आपको, बस वही दिखेगा जो सबको दिखता है। 

पर, महसूस आपको ज़रूर होगा, तब जब आप शिव को खोजेंगे। जलती चिताओं के ताप में, शमशान के राख में, डोमों के बात में, शव के श्रिंगार में, शमशान के हवाओं में, वहाँ के सीढ़ियों में, परिजनों के पीढ़ियों में, आपको केवल और केवल शांति मिलेगी। किसी में, ना कोई जल्दी, ना कोई क्रंदन। ना तो शवों की बदबू, और नाहीं, किसी चिता से कोई जलता। 

हर ओर, केवल और केवल एहसास। 

जैसे, कोई उस धाम में, बैठ सबको शांति दे रहा। सबको, इस बात का एहसास करा रहा कि, दुनिया के इस सबसे बड़े न्यायपालिका में, सबके साथ न्याय हो रहा। कोई ना अमीर ना कोई गरीब, ना कोई सेठ ना कोई मज़दूर। सभी, अपने अपने, बांस के विमानों से आ रहे और, शिव के गणों के हाथों, इस दुनिया से मुक्ति पा रहे। 

कहीं किसी में कोई जल्दी नहीं।

सब क़ुछ ठहरा। बस एक चीज़ वहाँ चलायमान। और वो है, शवों को आने का क्रम और फिर, धुवाँ बन फ़िज़ाओं में फैलने की जल्दीबाज़ी।  कई बार मैंने महसूस किया कि, मणिकर्णिका के रास्ते में, शवों को भी इस धाम में पहुँचने की जल्दीबाज़ी दिखती है। जैसे शमशान के पास पहुँचते हैं, वैसे परिजनों के पद चाप और तेज! जैसे कोई कह रहा हो कि, जल्दी और जल्दी। 

इस पूरे प्रक्रिया, के दौरान, मैंने महसूस किया कि, एक संकरी गली में, शायद, २० मीटर चौड़े जगह में सब कैसे इतने फुर्ती से सब काम हो जाता!  यही, शिव का मैनेजमेंट स्किल है। यही शिव का धाम है, जो शवों को मिनटों में, परम धाम प्रदान कर दे रहे। इस पवित्र भूमि के पशु पक्षी इंसान शव सब शिव हैं। सबकी यहाँ भूमिका है। सबका लक्ष्य एक, कि जो मुक्ति के आसरे आया, उसे मुक्ति दो।

भोर ब्रम्हवेला में, मणिकर्णिका का एहसास अलग होता है। जैसे, स्वयं आपको चिताओं में भगवान शिव के दर्शन हो रहे हैं। माँ गंगा के बहती धारायों और गगन के ललिमाओं में, जैसे ये एहसास उन सभी के लिए जो शव के परिजन आए हैं। जैसे देवाधिदेव कह रहे हों कि। ये नश्वर शरीर भस्म हो रहा पर, एक नए कलेवर में आत्मा परम धाम में प्रवेश कर रही। यही शिव हैं।  यही एहसास मुझे, रोज़ सुबह, ३ बजे मेरा नींद तोड़ देती और पाँव ख़ुद ब ख़ुद, इस ओर चलने लगते, जिधर शिव का वास। 

और फिर मन को परम आनंद। कभी आप भी महसूसिए, अपने देव को। 

विजय नाथ मिश्रा के फेसबुक वाल से