सात फेरे: सातों वचन साथ निभाऊंगी तेरे

सात फेरे लेना यानी विवाह बंधन में बंध जाना। कई सवाल, कई उलझनें मन में हिलोरे मारती है। पर जीवनसाथी अगर पूजा और चंद्रेश जैसे हो तो विवाह की हर परीक्षा पास हो जाती है।

सात फेरे: सातों वचन साथ निभाऊंगी तेरे

फीचर्स डेस्क। 02 दिसम्बर 2005 को हमारा विवाह हुआ । मगर शादी और फेरों तक का सफर कैसे शुरू हुआ यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है। 

बात वर्ष 2005 के होली के दिन की है ।

मैं हरिद्वार में अपने मम्मी पापा के साथ होली मनाने आयी हुई थी... कॉलेज से तो मैं जल्दी-जल्दी घर आ जाती थी, मगर ऑफिस से छुट्टी जल्दी नहीं मिल पाती थी। चूँकि मेरा मन तो बस घर पर आराम करने, गाने सुनने और गुजिया खाने का ही था, इसलिए मैं मम्मी पापा की प्रिय टोली के साथ होली उत्सव मनाने बाहर नहीं गई। 

अभी मम्मी पापा को निकले थोड़ा ही समय हुआ था कि अचानक फोन (दूरभाष) पर एक लंबी सी घंटी बजी... दूसरी तरफ से एक गंभीर आवाज आयी जिसे मैंने पहले कभी नहीं सुना था, फोन मम्मी पापा के लिए ही था... इसलिए उनके उस समय घर पर नहीं होने की बात सुन कर थोड़े विराम के बाद दूसरी तरफ से मुझसे मेरा परिचय लिया गया...

अभी बस मैंने अपना नाम ही बताया था कि उस गंभीर सी आवाज में एक अलग सी चहक सुनाई दी... 

आवाज आई-

"बेटा हमने तुम्हें अपने छोटे बेटे के लिए 'सलेक्ट' कर लिया है! बस उसी बारे में तुम्हारे माता पिता से आगे की चर्चा करनी थी....."

पूरी बात में मुझे सिर्फ 'सलेक्ट' शब्द ही समझ आया था... कारण शायद यह था कि अपने पहले प्रयास में ही पी0 सी0 एस0 की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद भी मैं उन दिनों और भी कई परीक्षाओं के लिए दिन-रात परिश्रम कर रही थी।। 

तो फोन सुन कर पहला ख्याल आया... 

ये मैंने कौन सी परीक्षा पास कर ली? 

कहाँ 'सिलेक्शन' हो गया?? 

कुल कितने अभ्यर्थी थे ???

मेरी क्या ' रैंक' आयी होगी????

ये वाली परीक्षा कब दी थी???

साक्षात्कार कब और कहाँ हुआ था??

मेरे अपने विषय 'भूगोल' में मुझे कितने अंक मिले होंगे?(काश मेरे सबसे ज्यादा हों) 

खैर अपने विचारों को थामा मैंने और पूरी बात समझने की कोशिश की। जब समझ में आया तो मेरे हाथ से फोन लगभग छूट सा ही गया... 

एक अलग सी घबराहट महसूस हुई, ऐसा तो कभी किसी परीक्षा फल के आने से पहले भी महसूस नहीं हुआ था। उसके आगे क्या होगा? अनजाने से भविष्य से डर सा लग रहा था .. 

फोन पर सुने उस कथन के बाद मैं क्या उत्तर दूँ ? क्या संबोधन करूँ??? ऐसे कई नए सवालों ने मस्तिष्क को घेरा था.... 

जब कुछ समझ नहीं आया तो मैंने फोन यह कह कर रख दिया कि मम्मी पापा के घर वापस आने पर मैं उनको बता दूँगी ... 

हुआ यूं कि फोन पर मेरी बात अपने होने वाले ससुर जी से हुई थी... 

मम्मी पापा ने घर आने पर पूरा किस्सा सुना और जीवन की कहानी अपने अगले पड़ाव की तरफ़ बढ़ चली... 

चन्द्रेश के साथ रोका, सगाई और फिर सात फेरों की बारी आई।

कई वर्षो के साथ में हमारे बीच विश्वास,  प्रेम और दोस्ती भी गहराई।

"सात फेरों में लिए हमने वचन सात।

जीवन की ये परीक्षा अब मैं दूँगी इनके साथ।।"

इनपुट सोर्स:पूजा रमन

लखनऊ