एकांतवास: कितना कठिन है ये अहसास

चाहे आप कितने भी ऊंचे पद पर क्यों न पहुंच जाए। हमेशा एक बात याद रखना आज आप जो भी माता पिता की वजह से है। उनको कभी अकेला न होने देना। बीना फुलेरा की ये एहसासों भरी कहानी पढ़िए और अगर ऐसी गलती आप कर रहे है तो तुरंत सुधारे।

एकांतवास: कितना कठिन है ये अहसास

फीचर्स डेस्क। सतीश ऑफिस से आते ही उदास बाहर बैठ गया। उसने अपनी पत्नी श्रेया से फोन में कहा श्रेया "तुम सब लोग अपने कमरों में चले जाओ मेरी तवियत ठीक नही हैं मुझे कुछ दिन अलग कमरे में रहना पड़ेगा" । श्रेया ने जल्दी सतीश की व्यवस्था कोने में पड़ी माँ के कमरे में कर दी । माँ जी "आप लॉबी में शिफ्ट हो जाइए वहा सतीश रहेंगे कुछ दिन" "लेकिन ज्यादा ताक झाक न करिएगा नही तो पहाड़ छोड़ आएंगे आपको।" माँ ने चिंतित होकर कहा अरे ! बहु उस कमरे में तो बिजली पंखा भी नहीं है चारपाई भी टूटी है सतीश कैसे रहेगा वहाँ ! क्या ? तुम कहना चाहती हो कि" तुम बहुत सताई हुई हो और कष्टमय जीवन जी रही हो "" नही , नही बहु.मैं तो सतीश के बारे में सोच रही थी " कहती माँ जी बाहर निकल आयी ।

सतीश ने पीछे से माँ के कमरे में प्रवेश किया तभी माँ को लॉबी में एक बेड मिल गया था। सतीश ने तेज बुखार में दो दिन जैसे तैसे निकाल लिए थे अब उसके स्वास्थ्य में कुछ सुधार हुआ तो उस कमरे के घुटन भरे वातावरण में उसका जीना मुश्किल हो गया । उसने श्रेया को आवाज लगाई कोई सुनता नहीं सब बहरे हो गए है क्या?उसे पता नही था कि उसकी आवाज उस बंद कोने से कही नहीं पहुंच पा रही थी । गर्मी से बुरा हाल था मच्छर भी रात भर खूब खून चूस रहे थे उसके फोन की बैटरी भी खत्म हो चुकी थी। चार्ज करने का कोई स्विच नही था। ये भी कोई रहने लायक जगह है क्या? सतीश बुदबुदाया।

तभी वह अकेलेपन से पागल सा हो रहा था। कैसे वहाँ से बाहर निकले ,किससे बातें करें । उसने गुस्से में माँ की पुरानी धोती अपनी ओर जोर लगाकर खिंची तभी उसमें से कुछ कागजो के गठ्ठर बिखर गए । जो उसकी माँ ने एकेलेपन में उस कमरे में लिखे थे । जिसमें एकेलेपन की छटपटाहट बच्चो के साथ रहने खेलने खाने की भूख लिपटी थी । हर शब्द गीला था ताजे घाव की तरह स्रावित ,आज सतीश को एहसास हो रहा था कि माँ को इस बंद स्टोर के कमरे में अकेले जगह देकर उसने कितना बड़ा गुनाह किया था कैसे अकेले दिन बिताये होंगे माँ ने धत्त .. उन चिठियो को सीने से लगा कर सतीश रोता जा रहा था माँ ने कितनी बार उसे आवाज लगाई होगी पर वह कभी सुन नहीं पाया था । पांच साल से माँ उस बंद कोठरी में आखिर , आखिर कैसे? ..क्यों ? दरवाजे पर मिली दो रोटी खा कर माँ ने समय बिताया । एकांत वास से मुक्त होते ही आज वह सीधे माँ के पास जाकर फूट फूट कर रो पड़ा ,माँ भी बच्चे को गले लगता देख आज अपने आशुओँ को रोक नही पाई खुशी से पागल हो , मेरा बच्चा , मेरा बच्चा सतीश कहती जा रही थी मुझे माफ़ करना माँ मैं कितना नासमझ था सतीश ने माँ के पैर पकड़ते हुए अपनी चुप्पी तोड़ी । तभी बच्चो ने यह दृश्य देखा सभी भावविह्वल हो गए । सामने खड़ी श्रेया को भी अपनी भूल का एहसास हो रहा था । 

इनपुट सोर्स: बीना फूलेरा

उत्तराखंड नैनीताल 

पिक्चर सोर्स:गूगल