धरती माँ कह रही पुकार के,तुम भी उसको सुनो ना

"कोई है बाहर ? दरवाजा खोलो जल्दी, यहाँ बहुत अंधेरा है " मैं जोर जोर से दरवाजा खटखटा रहा था कमरे में धुप्प अंधेरा था, शायद मैं अकेला ही था वहाँ। बाहर की शांति मेरे अंदर के शोर को और बढ़ा रही थी....

धरती माँ कह रही पुकार के,तुम भी उसको सुनो ना

फीचर्स डेस्क। "कोई है बाहर ? दरवाजा खोलो जल्दी, यहाँ बहुत अंधेरा है " मैं जोर जोर से दरवाजा खटखटा रहा था कमरे में धुप्प अंधेरा था, शायद मैं अकेला ही था वहाँ।  बाहर की शांति मेरे अंदर के शोर को और बढ़ा रही थी।

" किसने मुझे यहाँ बन्द किया है? दरवाजा खोलो जल्दी"  मैंने फिर से आवाज़ लगाने की कोशिश की लेकिन इस बार न जाने क्यूँ मेरे गले ने मेरा साथ नहीं दिया। 

मैं निढाल हो वहीं नीचे बैठ गया और सोचने लगा कि आखिर मैं यहाँ पहुँचा कैसे और मैंने ऐसा क्या किया है जो मुझे यहां बंद कर दिया गया है। एक अनजाने से डर से मेरी धमनियों का लहू सर्द पड़ने लगा था।

मैं यादों के गलियारे में झांकने लगा कि कैसे मैं अपनी गलती जानूँ , मानूँ और सुधारूँ, ताकि यहां से निकल सकूँ। लेकिन मैं तो एक शिक्षित, सफल, अमीर और प्रख्यात व्यक्ति हूँ मैं भला कैसे कोई गलती कर सकता हूँ!! 

"तुझे अपनी कोई गलती याद नहीं आई?" इस बार अंधेरे को चीरती एक अनजानी सी आवाज़ मेरे कानों में पड़ी और दरवाजे की झिरी से एक प्रकाश पुंज आ चमका। 

"क- कौ-कौन हो तुम ?" मैंने विस्मित हो हकलाते हुए पूछा ।

"वही, जिस पर तुम बोझ बन बैठे हो " 

"मैं समझा नहीं " थोड़ी हिम्मत जुटाते हुए मैंने कहा। 

"मैं पृथ्वी हूँ , याद करो तुम मुझे धरती माँ भी कहते हो "

"हाँ माँ, पर मैंने क्या किया, मुझे क्यों सजा दे रही हो, मुझे बाहर निकालो माँ " मैंने याचक हो विनती की। 

"याद करो, मैं तो हरी भरी वसुंधरा थी, मेरी प्राण वायु से ये प्रकृति जीवंत थी, तुमने मेरी अकूत सम्पदा का दोहन कर मुझे बंजर बना दिया। यहाँ के जीव-जंतु, वृक्ष-वनस्पतियों से ये जल- थल- नभ अलंकृत थे किंतु तुमने इनकी पवित्रता, प्राकृतिकता और विशालता को खंडित कर के रख दिया । कितनी बार तुम्हें चेतावनी दी, कभी बाढ़,कभी भूकंप तो कभी कुछ बीमारियों के रूप में, लेकिन तुम फिर भी न समझे। " 

"हमने तो सिर्फ विकास किया है माँ " मैंने अपना पक्ष रखना चाहा ।

" हा , विकास के नाम पर ईश्वर की बनाई सृष्टि ही बदलना चाहते हो"

"नहीं माँ, क्षमा करो" मैंने दोनों हाथ जोड़ दिये। 

"ये कदाचित संभव नहीं , ईश्वर ने अब "फॉर्मेट" का बटन दबा दिया है" और वह प्रकाश पुंज अचानक गायब हो गया। 

"नहीं " मैं जोर से चीख पड़ा और बिस्तर से गिर पड़ा। आँखें खोलीं तो खुद को पसीने से तर पाया। उगते सूरज की लालिमा और चिड़ियों की चहचहाहट ने बता दिया कि ये एक भयावह सपना था, पर सच्चा था ।

मैंने हाथ जोड़ विनती की, हे प्रभु ऐसा "करो-ना" बस क्षमा करो ।

इनपुट सोर्स: सुनीता रमन, लखनऊ

इमेज सोर्स:गूगल