संस्मरण: मकर संक्रांति

हर साल की तरह इस साल भी जिस दिन भी सूर्य नारायण मेहरबान हुए उसी दिन काला तिल धो धा कर सूखा लिया।कल दोपहरी की शांति में हल्की धूप सेंकने का मोह त्याग जुट गई.....

संस्मरण: मकर संक्रांति

फीचर्स डेस्क। साल 2022 का पहला त्योहार मकर संक्रांति आने वाला है ।अब चाहे त्योहार कोई भी हो रसोई में चहल पहल ना बढ़े ऐसा भी कहीं होता है भला।अब ये तो हमारे सूर्यं नारायण के उत्तरायण या मकर में जाने का त्योहार इस ठंढी में भी नई ऊष्मा से भर देता है।पता नहीं ये ऊष्मा ठिठुरती ठंढ और कोहरे से निजात मिलने की उम्मीद की हैं या तिल गुड़ के सोंधेपन और मिठास की है ।
             

सो हर साल की तरह इस साल भी जिस दिन भी सूर्य नारायण मेहरबान हुए उसी दिन काला तिल धो धा कर सूखा लिया।कल दोपहरी की शांति में हल्की धूप सेंकने का मोह त्याग जुट गई अपनी रसोई में।अब आप कहेंगे ये भी कोई लिखने की बात है सभी बनाते हैं इसमें क्या ख़ास है।आपका सोचना भी ठीक है ।पर गुड सी मीठी एक याद मेरे लिए इस तिल के लड्डू बनाने के सारे उपक्रम को ख़ास बना देती है।
                                                   

हर साल तिल को भून भानकर  जैसे ही गुड का पाग बनाने को कढ़ाई चढ़ाती हूँ गुड के फदकने के साथ ही मेरी दुबली पतली खूब लम्बे घुंघराले बालों का बड़ा सा जूड़ा बनाए मेरी फूआ याद आ जाती है ।जिनसे मेरा अपनी शादी के बाद मिलना गाहे बेगाहे ही हुआ है ।आज भी हर साल संक्रांति का तिल बनाते समय याद आ जाती है।
                                     

हमारे बिहार में संक्रांति पर लाई और तिल के लड्डू ज़रूर बनाये जाते है। अब आजकल घर में किसी को मीठा खाना है किसी को नहीं तो मैं थोड़ी बहुत लाई बाज़ार से ख़रीद लाती हूँ हां तिल हमेशा बड़े शौक़ से बनाती हूँ।लेकिन उस समय तो घर में थोड़ी बहुत लाई नहीं बल्कि अच्छी मात्रा में लाई बनती थी और हम बहनो को माँ की बनाई लाई ,तिल से ज़्यादा पसंद फूआ के हाथ की बनी लाई और तिल आती थी।
                                                 

फूआ और हमारा घर एकदम पास तो एक पैर इस आँगन तो दूसरा उस आँगन मे वाला हाल था।हमेशा फूआ ही दोनों घर का लाई बनाती रेत में भूने खिले खिले चूड़े की लाई ,मुरमुरे की लाई किसी में अदरक डलता किसी में नही।बड़े चाव से फूआ आँगन में अंगीठी के सामने पाग जाँचती  हंसी - कहकहो ,क़िस्से- कहानियो के बीच एकदम परफ़ेक्ट लाई ,तिल के लड्डू बना डालती।इन सब कार्यक्रम में सूर्य नारायण सारी धूप समेट कल आने की दिलासा देते पश्चिम में उतरने को कब तैयार हो जाते भान ही नहीं होता।हम बच्चे भी लाई बँधवाने में मदद कर खुश होते उससे ज़्यादा ख़ुशी होती कि चलो अब काम निपटा।तब तक फूआ का अभी बैठो का आदेश मिल जाता।अभी त कढ़ाई सेराई (ठंढी होनी)ना त बेटियन के कानकोच (एक आँख बडी दूसरी छोटी वाला)दुल्हा मिल जाई अब कान कोच दुल्हा के परीछी।लो अब उसी गुड तिल के पाग वाली कढ़ाई में मज़े का घी ,आटा डलता और स्वादिष्ट सोंधा हलवा बनता।इस तरह संक्रांति के लाई तिल बनने के लम्बे चौड़े कार्यक्रम का समापन होता।
                                           

 हम बच्चे हलवे मे खुश माँ फूआ चाची कानकोच दमाद का परिछना ना पड़े इसमें खुश।कितने साल गुजर गए इस बात को पर हर साल बिना नागा ये बात याद आती है ।प्यारी सी याद को संजोए तिल के लड्डू बनाने के बाद मैं भी पाग वाली कढ़ाई ज़रूर ठंढी करती हूँ।बेटी ना होने की वजह से कानकोच दमाद मिलने का डर भी नहीं फिर भी ना जाने क्यू अच्छा लगता है बहुत अच्छा लगता है। कल भी कढ़ाई सेरवाने की ख़ातिर हलवा बनाया ।खुद भी खाई सासुमां को भी खिलाया।
                                     

हम सबकी बदलती जीवन शैली में हमारे ऐसे हंसी ठिठोली वाले क़िस्से कहानियां कही गुम होते जा रहे है तो सोचा इस संक्रांति अपने नये परिवार ऑनलाइन परिवार के सदस्यों को सुना डालूँ।

सभी को लोहड़ी,मकर संक्रांति ,माघी पिहू, पोंगल की हार्दिक शुभकामनाएँ ।

संस्मरण - कनक एस, मेंबर फोकस साहित्य ग्रुप