अभिशापित सीरीज - भाग-2

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फीचर्स डेस्क। वे चारों हवेली के आस-पास की जगह पूछते-पूछते शहर से बहुत दूर एक गाँव में पहुंचते हैं। लेकिन ताज्जुब की बात, वे लोग जिन- जिन लोगों से पूछते; किसी को भी उस हवेली के बारे में नहीं पता होता। "छोड़ो ना यार, चलो वापस चलते हैं, शायद किसी नें विक्रम के साथ मजाक किया हो, हो सकता हो ऐसी कोई हवेली हो ही नहीं" विकल्प नें अपना तर्क दिया और फिर सभी निराश होकर वापस जाने का सोचते हैं। लेकिन थोड़ी दूर जाने पर... उन चारों को एक जंगल में से एक चमकती हुई रोशनी दिखाई पड़ती है।

"यार, चल ना उस जंगल में चलते हैं... देखते हैं ये चमकदार रोशनी कहाँ से आ रही है। शायद कुछ फन भी हो जाए।" महीश नें उत्सुकता जताते हुए कहा।"पागल हो गये हो क्या यार, समय देख रहे हो? कितनी रात हो गयी है और तुम्हें जंगल में मस्ती करने की पड़ी है।" विकल्प नें अपना डर जाहिर करते हुए कहा। नहीं ना यार, बस ये चमकदार रोशनी का राज पता करने के लिए तो बोल रहे हैं और वैसे भी हम इतनी दूर आ गये हैं। तो ये हवेली ना सही, कम से कम जंगल में ही थोड़ी मस्ती कर लिया जाए। विक्रम नें महीश का साथ देते हुए कहा और फिर चारों उतर पड़े गाड़ी से और उस चमकदार रोशनी की तरफ बढ़ने लगे। एक तरफ घना अंधेरा और उस पर ये काली रात... किसी डरावने मंजर से कम नहीं था। कि तभी अचानक वे चारों एक हवेली के पास पहुंचते हैं। वो हवेली बिल्कुल उस फोटो वाली हवेली जैसी थी। वो हवेली बाहर से देखने पर बहुत ही आलीशान व शानदार थी।

"यार विक्रम, तू छा गया यार... क्या मस्त जगह तू हमें लेकर आया है।" महीश नें मनीष के साथ ताली बजाते हुए कहा। "हाँ वो तो है, पर ये हवेली कितनी सुनसान जगह पर है, ये भी तो सोचो और तो और हमें यहाँ पहुँचने के लिए कितने गहरे और खतरनाक घने जंगलों से गुजरकर यहाँ आना पड़ा। विक्रम मेरा दिल कह रहा है, हमें यहाँ से वापस जाना चाहिए। हो सकता है किसी नें तुम्हारे साथ मजाक किया हो, वापस चलो सब के सब..." विकल्प नें पैर पीछे लेते हुए बोला। "देख ना, इसकी कितनी फट रही है अभी से, फट्टू...तू सुन कोई पागल है क्या जो विक्रम के साथ ऐसा मजाक करेगा। वो भी इतनी सुंदर हवेली पर बुलाकर और हवेली की तस्वीर और चाबी भेजकर कौन मजाक करेगा। यार विक्रम तू इसकी बातों पर ध्यान मत दे, तू चल; अंदर!.." मनीष नें अपना बैग उठाते हुए कहा और आगे बढ़ गया। पीछे-पीछे महीश, विक्रम और विकल्प भी हो लिए। 

अंदर जैसे हवेली के फाटक पर पहुंचते हैं, फाटक अपने-आप अंदर की ओर खुल जाता है। ये देखकर उन सभी के चेहरे पर से हवाईयां उड़ जाती है। "देखा...., देखा...., ये फाटक अपने-आप कैसे खुल गया। यारों प्लीज अभी भी वक्त है बात मान लो। यहाँ पर कुछ तो गड़बड़ है। प्लीज वापस चलो.." विकल्प नें घबराहट के साथ कंपकंपाते हुए आवाज में कहा। "क्या यार, विकल्प तुझे जाना है तो जा ना..., हमें क्यों वापस चलने के लिए कह रहा है। अब हम यहाँ तक आए हैं तो अंदर जाकर ही रहेंगे और एक हफ्ते भी यहीं रहकर मजे करेंगे।" विक्रम नें अपने दोस्तों की हाँ में हाँ मिलाते हुए कहा। कि तभी सामने से एक बुजुर्ग महिला अपनी लाठी के सहारे चलते हुए, अजीब सी दिखने वाली हालत में उन चारों के नजदीक आयी। जिसे देखकर वे चारों एक बार फिर डर गये। उस बुजुर्ग महिला को देखकर ऐसा लग रहा था कि जैसे उसके आधे चेहरे को किसी नें तेल डालकर जला दिया हो।

"आप मिस्टर विक्रम वत्सल हैं...?" उस बुजुर्ग महिला नें लड़खड़ाती हुई आवाज में पूछा।

"हाँ... और आप..?" विक्रम नें जवाब के साथ उस बुजुर्ग महिला का परिचय पूछा।

"मै इस हवेली की देखभाल करती हूँ।" फिर से उस बुजुर्ग महिला नें अपनी लड़खड़ाती हुई जबान से कहा।

फिर विक्रम नें पार्सल में आयी सभी चीजों को उनके सामने रखा। 

उस बुजुर्ग महिला नें उन सामान को देखा और फिर कहा, 

"चलिए अंदर, आपका ही इंतजार हो रहा था।" उस बुजुर्ग महिला नें अंदर चलने का इशारा किया और आगे बढ़ गयी। पीछे-पीछे वे चारों भी हो लिए।

"क्या मै जान सकता हूँ, हमें यहाँ किसने और क्यों बुलाया है?" विक्रम के इस सवाल से बुजुर्ग महिला के बढ़ते कदम वहीं रूक गये।

और पीछे मुड़कर पूछा,  'क्यों आपने चिट्ठी नहीं पढ़ी..?' 

"जी पढ़ी ना.. तभी तो हम आएं हैं.." मनीष नें जवाब दिया।

"तो फिर ये सवाल क्यों..." उस बुजुर्ग महिला नें गुस्से से भरी हुई लाल-लाल आंखों से देखा।

"नहीं बस जनरली ही पूछ लिया," विकल्प नें उत्तर दिया। तो वो महिला आगे बढ़ गयी।

"अच्छा आप सुनिए ये बाहर का फाटक कैसे अपने-आप खुल गया।" लेकिन वो बुजुर्ग महिला बिना कोई जवाब दिये उन चारों को हवेली के अंदर ले जाती है।

हवेली जितनी बाहर से आलीशान और सुंदर थी, उससे ज्यादा सुंदर वो अंदर से भी थी। 

"क्या बात है यारों, कितनी मस्त जगह है..." महीश नें बैग नीचे रखते हुए कहा।

"चलिए मै आपको आप चारों का कमरा दिखा देती हूँ" उस महिला नें अपनी लड़खड़ाती हुई जुबान और लाठी के टेक से आगे बढ़ते हुए कहा।

चारों दोस्त हवेली के अंदर अपने आस-पास रखी सामान और खूबसूरत-खूबसूरत चित्रों को देखते हुए आगे बढ़ते हुए जा रहे थे। सब इतना खूबसूरत लग रहा था कि वे चारों सब भूल गये।

तभी अचानक वो महिला रूक गयी और पीछे वे चारों अपने आस-पास रखी वस्तुओं और चित्रों में ऐसे खोये थे कि उन्हें उस महिला के रूकने का भान भी नहीं हुआ और वो उस बुजुर्ग महिला से जा टकराये।

"आपका कमरा आ गया, आप चारों इसी कमरे में विश्राम कीजिए, तब तक मै आपके नहाने के लिए बाथरूम तैयार करती हूँ और हाँ याद है ना आपको किसी भी सामान को हाथ नहीं लगाना है। बस इस कमरे के सामान को ही छूने की इजाजत है। वरना...." कहकर बुजुर्ग महिला वापस जाने के लिए मुड़ गयी।

"अच्छा सुनिए,....." वो बुजुर्ग महिला उन चारों की तरफ मुड़ीं।

"वो... पत्र में... लिखा था, यहाँ हमारी सेवा में 24 घंटे तीन खूबसूरत अप्सराएं....." मनीष बोला ही था कि विकल्प नें बात बीच में काटते हुए बोल पड़ा। "कुछ नहीं, आंटी जी.., आप जाईये अपना काम कीजिए।"

"घबराओ नहीं बेटा, वे तीनों अप्सराएं आपकी खिदमत में पेश होने ही वाली हैं। बस थोड़ा और इंतजार कर लीजिए। वैसे मै भी किसी अप्सरा से कम हूँ क्या..?" उस बुजुर्ग महिला नें खतरनाक हंसी की ओट में कहा।

"जी... जी...बिल्कुल", विकल्प नें जवाब दिया।

क्या यार, वो तुम्हें किस एंगल से अप्सरा नजर आने लगी। कि तभी उस बुजुर्ग महिला के जाते ही महीश और मनीष दोनों विकल्प के ऊपर टूट पड़े।

"छोड़ो, तुम दोनों उसे .. और ये बताओ क्या यहाँ तुम्हें कुछ अजीब नहीं लग रहा और खासतौर पर वो बुजुर्ग महिला, किस तरह से गुस्से से देखती है।" विक्रम नें छुड़वाते हुए कहा।

"कहा था ना मैनें, यहाँ कुछ गड़बड़ है... चलो वापस लेकिन नहीं..."

"तो हमनें कहा था तुम्हें अंदर चलने को.., बोला था ना चले जाओ वापस..." महीश नें विकल्प पर झल्लाते हुए कहा।

"देखा विक्रम, हमें यहाँ आए 20 मिनट भी नहीं हुए और हममें फूट पड़ गयी। मान लो और चलो... वापस चलो। अभी भी वक्त है...." विकल्प नें डर से भरे लहजे में कहा।

"महीश, मनीष यार विकल्प सही कह रहा है, मुझे भी यही आभास हो रहा है, यहाँ कुछ गड़बड़ है। ऐसा लग रहा है, कि जैसा दिख रहा है वैसा है नहीं... और तुम दोनों ये भी सोचो, कि जैसे हम यहाँ आए, हम चारों के विचार कितने बदल गये। एक दूसरे के विपरीत सोचने लगे। उसके बाद.. फाटक का अपने-आप खुल जाना। बाहर उस बुजुर्ग महिला का हैरानी भरा व्यवहार उसकी डरावनी लाल आंखें उसका डरावना चेहरा, उसका किसी भी सामान को ना छूने का आदेश.. सब कितना विचित्र है। यार मानो कुछ गड़बड़ है यहाँ... मेरी मानो चलो वापस चलते हैं।" विक्रम नें समझाते हुए कहा।

"नहीं यार, सबकुछ नॉर्मल है... यहाँ से हम तो नहीं जाने वाले..." मनीष नें विक्रम की बात को भी नकारते हुए कहा।

"ठीक है तुम दोनों रूको, लेकिन मै और विकल्प अब यहाँ नहीं रूकेंगे।" जैसे विक्रम और विकल्प अपना-अपना बैग उठाकर जाने लगे कि तभी सामने दरवाजे पर तीन बहुत ही खूबसूरत अप्सराओं जैसी प्रतीत होती हुई लड़कियां आकर खड़ी हो गयी थी। क्रमशः

इनपुट : ज्ञान प्रिया, फैजाबाद।