अनोखा रिश्ता 

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फीचर्स डेस्क। फ़ारुख खालिक जी को आज ही उत्तर प्रदेश के माध्यमिक शिक्षा विभाग में नियुक्ति पत्र मिला। उन्होंने प्रयागराज के कटरा में रहने वाले बड़े भाईजान साज़िद को फोन करके बताया। वहाँ पर रहने के लिए कमरा खोजने के विषय में आगाह भी कर दिया। भाईजान ने कहा," क्या ज़रूरत है! मेरे ग़रीबखाने में ही रह जाना ।" "नहीं भाईजान! मैं अकेला रहने वाला बन्दा, घर-परिवार की बन्दिशें अब अखरती हैं"- मज़ाक के लहज़े में फ़ारुख जी ने बोला। साज़िद भाई ने कहा-" तो ठीक है। देखता हूँ।" ढूँढते-ढूँढते छोटा बघाड़ा में फ़ारुख जी के मन मुताबिक कमरा मिला और उनको सूचित कर दिया गया। जल्दी ही सामान के साथ उन्होंने प्रयाग आकर कमरे पर सामान भी जमा लिए। कुछ ही दिनों में प्रयाग के रहन-सहन में ढल गए।

एक दिन कार्यालय से आकर चाय की प्याली और पत्रिका लेकर वह बालकनी में बैठे थे कि पड़ोस के घर से मारपीट और एक बच्चे की रोने की आवाज़ आ रही थी।उन्होंने बालकनी से इधर-उधर झाँका लेकिन कुछ साफ-साफ नहीं दिखाई दिया।अतः निराश होकर वापिस आ फिर कुर्सी पर बैठ पत्रिका पढ़ने की कोशिश करने लगे। बच्चे की रोने की आवाज़ उनके मन को बेचैन कर रही थी। अंततः उन्होंने पत्रिका मेज पर रखी और उस आवाज़ के सहारे रास्ते पर बढ़ने लगे। वह कुछ ही दूर चले थे कि देखा मैले-कुचैले कपड़े पहने, बढ़ी हुई दाढ़ी वाला एक अधेड़ आदमी जो लगता था कि हफ़्तों से नहाया भी न होगा, एक बच्चे को बुरी तरह से पीट रहा था। मारते- मारते कह रहा था," बड़ा आया है पढ़ने वाला।

अरे ! पढ़-लिखकर कौन सा कलेक्टर बनने वाला है ? कब से समझा रहा हूँ, कुछ काम-धाम कर पर नहीं। मेरे सर पर ही मूँग दलेगा। कितना समझाया चार पैसे घर आएँगे तो दो रोटी तुझको मिलेगी और तेरे इन भाई-बहनों को भी लेकिन बाबूजी को पढ़ने का शौक लगा है। आज तो पढ़ाई का भूत उतार कर ही रहूँगा।"

फ़ारुख जी से उस आदमी की निर्दयता देखी नहीं गई और आगे बढ़कर उसका हाथ रोकते हुए बोले ," अरे मियाँ ! नन्हीं सी जान को मार ही डालोगे क्या ? बच्चा पढ़ना ही तो चाहता है। आख़िर इसमें बुराई ही क्या है ?"

एक अजनबी को अपने बच्चे का पक्ष लेता देख वह आदमी और आग बबूला हो गया। अब तो और चिल्लाने लगा," ओ भाईसाहब! आप इस पचड़े में न पड़ो।यह मेरे घर का मामला है।इस बिगड़े लड़के को रास्ते पर ला रहा हूँ। लातों के भूत बातों से नहीं मानते। इसकी मति भ्रष्ट हो गई है। आज तो समझा कर ही रहूँगा।" कहते-कहते हाथ में लिए डंडे से बच्चे को दो डंडे और जड़ दिए। फ़ारुख जी से देखा नहीं गया और उस आदमी से उलझने के बजाय बीच-बचाव कर उस बच्चे को अपने घर ले आए।

संन्यासनी

घर लाकर उसकी मरहमपट्टी कर उसे एक गिलास हल्दी वाला दूध दिया। फिर बड़ी ही सहानुभूति के साथ उससे पूछा," बेटा! तुम्हारा क्या नाम है ? कहाँ पढ़ते हो ?"

आँसू पोछते सुबकते हुए उस बच्चे ने कहा," बाबूजी !मेरा नाम कृष्णा है। यही पास में एक मिशनरी स्कूल वाले निःशुल्क शिक्षा देते हैं। वही से कक्षा आठ तक पढ़ाई की है। अब नौवीं व दसवीं वालों को सरकारी विद्यालय में प्रवेश लेना है तो मैंने बापू से कहा।पर....पर..वह तो मुझ पर गुस्सा हो गए। कहने लगे आगे पढ़ने से कोई लाभ नहीं। चल मेरे साथ रेलगाड़ी में रेवड़ियाँ व किताबें बेंच।मेरे काम में हाथ बँटा। उससे चार पैसे घर में आएँगे। मेरे मना करने पर मारने लगे।

दो घूँट में ही दूध पीकर फिर आगे बताने लगा," बाबूजी...बाबूजी मैं आगे पढ़ना चाहता हूँ।मैं बापू की तरह रेवड़ियाँ नहीं बेचना चाहता है। पढ़-लिखकर अपने पैरों पर खड़ा होना चाहता हूँ। कुछ सम्मानजनक काम करना चाहता हूँ।"

कृष्णा की बातों ही बातों में कब रात ढल गई, पता ही नहीं चला। अतः फ़ारुख जी ने कहा," बेटा! चलो आपको घर पहुँचा दूँ।" कृष्णा उनके पैर पकड़कर गिड़गिड़ाने लगा," बाबूजी!बापू फिर मारेगा। मुझे मत भजिए। मैं घर का सारा काम कर दूँगा। ईश्वर के लिए सहारा दे दीजिए।आप बहुत नेकदिल इन्सान हैं। आप पहले व्यक्ति हो जिसने बापू से मुझे बचाया।"

"ठीक है! ठीक है! कोई बात नहीं। नहीं मन है तो अभी मत जाओ। इधर फोलडिंग चारपाई रखी है। यह बिस्तर बिछाकर यहीं सो जाओ। लेकिन हाँ ,पहले हम दोनों कुछ खा लेते हैं। मेरे पेट में तो चूहे दौड़ रहे हैं-" कहते हुए मुस्कुराने लगे। कृष्णा के मुख पर भी हल्की सी मुस्कान तैर गई। उसकी मुस्कान ने फ़ारुख साहब के दिल को बहुत सुकून दिया। कहीं न कहीं कृष्णा का साथ उन्हें भी भा रहा था।  

सुबह उनके उठने से पहले ही कृष्णा ने अपना बिस्तर समेटा और कमरे से लेकर रसोईघर तक की साफ-सफाई कर डाली।चाय के साथ अख़बार लाया और बोला," बाबूजी ! उठिए, मुँह-हाथ धो लीजिए।" फारूख जी ने आँख खोलने के साथ ही कृष्णा का मुस्कुराता हुआ चेहरा देखा और प्रसन्न मुद्रा में बोले," अरे! बेटा आप कब उठे? मैं तो आज सोता ही रह गया। वाह... कमरे का तो आपने नक्शा ही बदल दिया। अभी मैं मुँह धुल कर आता हूँ, साथ में चाय पीते हैं।"

अब यह रोज़ का कार्यक्रम हो गया। वस्तुतः देखते ही देखते दोनों एक दूसरे की ज़रूरत बन गए। फ़ारुख़ जी ने उसके पढ़ाई का ख़र्च ही नहीं उठाया अपितु पुत्रवत स्नेह भी करने लगे। कृष्णा भी सारा दिन उनके पास रहता और प्रत्येक ज़रूरत का ध्यान रखता। कृष्णा का परिवार भी उसकी तनख़्वाह पाकर अपनी ज़रूरत पूरी कर रहा था। उसकी चार बहनें और एक भाई भी था। माता-पिता अपने जीवन यापन में लगे थे। उन्हें उसके रहने न रहने का कोई अन्तर न पड़ता। इधर कृष्णा दिन पर दिन फ़ारुख जी के पिता सदृश प्रेम पाकर निहाल हो रहा था।

धीरे-धीरे पाँच वर्ष बीत गए। कृष्णा ने स्नातक परीक्षा भी पास कर ली और उसे फ़ारुख जी के सहयोग से उनके ही कार्यालय में बाबू की नौकरी भी मिल गई। अब वह विवाह के भी योग्य हो गया था। पिता ने सोचा वह कमा-धमा रहा ही है, क्या आवश्यकता है फारुख जी के यहाँ आने-जाने की। कहने पर कृष्णा ने साफ मना कर दिया । उसने पिता से कहा,"  ये बाबूजी ही मेरे लिए सब कुछ हैं। जब मुझे संरक्षक की सबसे ज़्यादा ज़रूरत थी तो मेरे साथ बाबूजी ही खड़े थे। अब उनकी सेवा करने की मेरी बारी है। आपके पास मेरे अलावा और भी बच्चे हैं। इनके लिए बस मैं हूँ। मैं कृतघ्न नहीं हूँ। अब जीवनपर्यन्त इनकी सेवा करूँगा। आपकी ज़रूरतों का भी ध्यान रखूँगा परन्तु घर नहीं जाऊँगा। मेरे इस जीवन को जीने लायक बाबूजी ने बनाया है। इस पर मात्र उनका ही अधिकार है।

कृष्णा की बातों को सुनकर उसके पिता हतप्रभ थे और फ़ारुख जी का हृदय गद्गद। उन्होंने कृष्णा को गले से लगा लिया। उन्हें नि:स्वार्थ प्रेम के बदले जो प्रेम मिला आज उससे वह अभिभूत थे। खुदा का शुकराना अदा कर रहे थे।

कंटेंट सोर्स : डॉ. उपासना पाण्डेय, प्रयागराज सिटी, उत्तर प्रदेश।