संन्यासनी  

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फीचर्स डेस्क। स्वाह ,स्वाह,स्वाह की ध्वनि प्रतिध्वनि उसकी कुटिया से से आती हुई बाहर के माहौल को भक्तिमय कर रही हो ऐसा तो नहीं था क्यूँ की वो जगह भक्ति के लिए उपयुक्त नहीं थी वो जीवन के अटल  सत्य को दर्शाने वाला स्थान था। शमशान के भीतर थी उसकी कुटिया और वो थी “शमशान की सन्यासनी” पूरे माहौल में चमड़ी के जलने से आने वाली गन्ध के साथ उसकी मदिरा की दुर्गन्ध ने वातावरण को वीभत्स सा बना रक्ख़ा था ।हर आने वाली लाश के परिजनो को उसे भेंट चढ़ानी होती थी नहीं तो यहाँ से जाने वाला हर आदमी परेशान रहता है।

ऐसा मिथक फैला रक्ख़ा था उसने और शमशान के कर्मचारियों ने काले कपड़े का एक लम्बा सा झींगोला जैसा वस्त्र ,काले घने लम्बे बाल और चेहरे पे काले रंग का ही लेप उसकी छवि को डरावना सा बनाते थे बस उसकी आँखें शराब के नशे में यूँ लाल रहती जैसे दो दहकते हुए कोयले के अंगार जिनको देखने मात्र से उसके अंदर की आग की दहक पता चलती। जितनी क्रूरता और कठोरता वो अपने व्यक्तित्व में ला सकती थी सब उसने अपने में समाहित किया हुआ था। बरसो से वक़्त मौसम या माहौल कुछ भी रहा हो पर सन्यासनी ने अपनी पूजा में कोई भी विघ्न नहीं आने दिया था। शमशान के लोग जानते थे की वो कोई सिद्धि प्राप्त करना चाहती है जिसकी वजह से वो मसान की देवी की अर्चना, हवन रोज़ ही करती और फिर शमशान की आने वाली पहली अर्थी के दर्शन कर ही वो मधु का पान करती।

आज भी वो अपनी दिनचर्या में व्यस्त थी हवन कर शमशान की सीढ़ियों से उतरती हुई पहली अर्थी के दर्शनो को वो पास आई ही थी कि उसके पाँव ठिठक गये । इतने सालों में आज पहली बार हुआ की वो अर्थी को देख कर विचलित हुई हो । ये क्या मधु दीदी पूरे सोलह शृगार के साथ दुनिया से विदा हो गई और गले में वही मोहर पहने है।एक पल को ठिठके उसके क़दमों को उसने बड़ी कठोरता से सम्भाला और अपने नज़राने के तौर पर गले से वो मोहर उतारने लगी की एक किशोर ने मधुर वाणी में कहा “आप ये न उतारें मेरी अम्माँ की प्रबल इच्छा थी की वो चिता पर इसे पहन कर ही जलें ।आपको इसके बदले में और जो चाहिये ले लें मैं दे दूँगा ।”

सन्यासनी से उस नवयुवक को नज़र भर के देखा और दिल को कठोर कर कहा “ हम यही लेंगे,नहीं तो मेरी पूजा और तेरी ये चिता दोनो की आग में दहक पूरी न होगी “ “पर मैंने अपनी अम्माँ को वचन दिया है ।वो कहती थी इसमें उनकी जान बसती है ।” “हाँ तो जब जान ही न रही तो इसका क्या ?” कह सन्यासनी ने अब तक के रुके हुए हाथ को आगे बढ़ाया ही था कि नवयुवक घुटनो पे बैठ उसके आगे हाथ जोड़ कर विनती करने लगा “मुझे मेरी अम्माँ को दिया वचन पूरा कर लेने दें “ उसके निर्दोष मुखड़े को देख सन्यासनी एक पल को फिर विचलित हुई पर फिर कठोरता से उसने लाश के गले से वो मोहर उतार ली ।ये देख किशोर बिलख उठा परिजन उसे कुछ समझाते की सन्यासनी ने मोहर वापस लाश के ऊपर रख उसके माथे को चूम लिया और अपनी कुटिया में जा मधु पान करने लगी।

शराब की गन्ध और चमड़ी जलने की दुर्गन्ध ने वातावरण में जगुप्सा का पुट छा गया। वो जितनी भी शराब पीती उसकी व्याकुलता उतनी ही बढ़ती जाती आज वो ख़ुद को नशे में धुत्त कर देना चाह रही थी पर नशा था की उस पर असर ही न कर रहा था ।और वो अपने पूरे होशों हवास में बीस साल पीछे की ज़िन्दगी के पन्नो को अपने समक्ष फड़फड़ाते हुए देख रही थी। गोरा चिट्टा रंग सुकोमल सुंदर काया घने लम्बे बाल और गोल गोल मुखड़े पे बड़ी बड़ी हिरणी जैसी आँखे। सुंदरता के सारे मायने पे खरी उतरती सुधा।अपने स्वभाव में भी चंचल तितली सी और ख़ुश मिज़ाज थी । उसके ठीक विपरीत थी उसकी मधु दीदी साँवला रंग घुंघराले बाल और तुनक मिज़ाज स्वभाव हर बात को दिल में रख कर बदला लेने जैसी प्रवृति पर सुधा थी की अपनी मधु दीदी पे जान निछावर करती थी ।

मधु दीदी को उसके रंग रूप से कष्ट तो शुरू से ही था पर वक़्त जब ब्याह का आया और हर कोई रिश्ता सुधा के लिये बताता तो उसकी ईर्ष्या और बढ़ जाती। एक अच्छा रिश्ता और मधु का विवाह हो गया मधु बहुत ख़ुश थी की उसका विवाह एक बहुत ही बड़े घर में हुआ था। जब मधु के  पाँव भारी होने की बात उसके मायके पहुँची तो सबसे ज़्यादा ख़ुश सुधा ही हुई थी। फागुन माह लग चुका था मधु की ससुराल से सुधा को होली खेलने का बुलावा आया तो सुधा बहुत ख़ुश हुई और मधु दीदी की ससुराल जाने के लिए पिता से जिद्द करने लगी ।पिता के हाँ कहते ही माँ बोली भी “सुधा को मत भेजो जवान बिटिया ऊपर से त्यौहार वो भी होली का मुझे ठीक न लग रहा “ “क्या ठीक न होगा अम्माँ होली तो त्यौहार ही जीजा ,साली का है।

हम जायेंगे मधु दीदी के यहाँ होली खेलने” और वो अपनी लाड़ भारी बातों से अम्माँ को मना मधु दीदी की ससुराल जाने की तैयारी करने लगी की तभी अम्माँ ने गहनो की अलमारी खोल उसे एक चेन पहनने को दी “लो ये पहन लो त्यौहार में बहन की ससुराल नंगे गले जाओगी तो लोग क्या कहेंगे “तभी गहनो के बीच मोहर देख वो बोली “अम्माँ ये भी चेन में डाल दो न इसे हम पहनेगे “ “न बिटिया न ये तो  मधु को पसंद है जब उसका बच्चा होगा तब देने का वादा किया है ।ये न पहन बिटिया उसे अच्छा न लगेगा “ सुधा ने अम्माँ के हाथ से लेते हुए कहा “जब दीदी के बच्चा होगा तब दे देना तब तक हम पहन के जीजा पे रोब झाड़ लें ज़रा “ और खिलखिलते  हुए वो उसको पहन मधु दीदी की ससुराल होली खेलने क्या गई की उसकी ज़िंदगी ही विष हो गई ।

ससुराल में सब उसे देख जितना ख़ुश हुए मधु उतना ही जल भुन गई क्यूँ कि सब सुधा को ही पूछ  रहे थे।उसके प्रति लोगों का ध्यान थोड़ा कम क्या हुआ की वो तो बिफर ही पड़ी और सुधा को एकांत में ले जा बोली “ये मोहर तूने क्यूँ पहनी ये तो अम्माँ ने हमको देने को कहा है ।” “हाँ,हाँ जब बच्चा आयेगा तब न “सुधा ने अपनी मधु दीदी को प्यार से थपकी देते हुए कहा कि तभी उसके जीजा वहाँ आ पहुँचे और बोले “क्या चल रहा है बहनो में “मधु ग़ुस्सा छुपाते हुए मुस्कुरा के बोली “ज़्यादा मेरी बहन के पीछे न पड़ो “ सुधा ने चुहल करते हुए कहा “पड़ो जीजा जी होली का माहौल है ।होली तो होती ही जीजा साली की है।

क्यूँ  दीदी ? “उसके अल्लाहड पन को देख जीजा प्यार से उसके सर पे हाथ फेर हँस दिये । पर ये सब मधु के बर्दाश्त के बाहर हो गया  और सुधा के गले में चमकती वो मोहर भी ।उस पर अपनी ही बहन के प्रति बचपन से भरी ईर्ष्या और मोहर के प्रति लालच ने विकराल रूप ले लिया और उसने रंग वाले दिन सुधा को धोखे से शराब पिला दी और नशे की हालत में उसे पीछे के कमरे में बंद कर दिया और ख़ुद रंग का मज़ा लेने लगी।
पर वक़्त को तो कुछ और ही मंज़ूर था ।

अपनी साली को रंग खेलते  न पा उसे खोजते हुए उसके जीजा उस कमरे तक पहुँच गये ।भंग का रंग उन पर भी चढ़ा था ।वो नशे में मदमस्त हो रही सुधा के रूप में ऐसा खोये कि नशे ने रिश्तों की सीमा ही पार कर दी ।घर की नौकरानी ने ये ख़बर मधु को दी तो होली के सारे रंग स्याह हो गये ।वो पूरे घर के साथ उस कमरे में पहुँची और सुधा और अपने पति के संबंधो के चिथड़े उड़ा दिये। सुधा को उसी हालत में घर से निकाल दिया । पति तो पुरुष था उसका क़ुसूर का पलड़ा हल्का कर दिया गया सुधा स्त्री वो भी पराए घर ऊपर से नशे में कहाँ क्षम्य था उसका क़सूर ।मधु दीदी ने अपने घर के पट उसी क्षण उसके लिये बंद कर दिये ।

सुधा निर्लज्जता का दाग़ दामन पे ले कहाँ जाती उस ढलते दिन के धुँधलके में भटकती हुई जा पहुँची औघड़ साधुओं की टोली में। रिश्तों की जो डोर उससे टूटी थी उसका जाल बिछाने वाली उसकी अपनी ही बहन थी कहाँ पता था उसे वो तो सारा दोष अपने नशे को दे ख़ुद को ही कोश रही थी । यही वजह थी की उसने ख़ुद को बस्ती से दूर औघड सन्यासीयों के साथ दर दर का राही बना दिया और ख़ुद को शराब का आदी । औघड की दीक्षा देने वाले उसके गुरु ने उसे कहा था कि शमशान में रह कर वो देवी की उपासना करे तब ही उसे अपने किए अपराध से निजात इसी जीवन में मिल जाएगी नहीं तो रिश्तों को कलंकित करने वाले न जाने कितने जन्मो तक इनका दंड भोगते है।

वो नशे से थर-थर काँप रही थी कि किशोर उसकी कुटिया तक आ पहुँचा और बोला “आपने कोई अपराध नहीं किया मेरी अम्माँ की ईर्ष्या ने आपको अपराधी बनाया मेरे पिता ने मेरी अम्माँ को कभी माफ़ नहीं किया और वो घर में रहते  होते हुए भी सन्यासी का जीवन जीते है मेरे पिता ने मुझे आपसे आशीर्वाद लेने को कहा है ।वो दूर गेरुए वस्त्र में खड़े सन्यासी मेरे पिता है। ये सब सुन सन्यासनी की दहकती अंगरो सी आँखो से जलते हुए अश्रु धारा का सैलाब फूट पड़ा और उसने वहाँ रक्खे अपने त्रिशूल को अपनी छाती में उतार दिया और बोली रिश्तों के रंग को बदरंग करने की मेरी सज़ा आज पूरी हुई ।।

कंटेंट सोर्स : ज्योत्सना सिंह, गोमती नगर , लखनऊ  सिटी।