किन्नर

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फीचर्स डेस्क।  विदुषी का आज ऑफिस का पहला दिन था। सुबह से ना जाने कितने कपडे निकाल चुकी थी, कभी बाल खोल रही थी कभी बांध रही थी,  गरिमा दी ज़रा देख के दीजिये ना कपड़ों के साथ की मैचिंग ज्वेलरी, मुझे तो कुछ समझ ही नहीं आ रहा है क्या पहनूं आज। उफ़ छुटकी तू भी न बड़ा परेशान करती है,  ऑफिस ही तो जाना है क्या फरक पड़ता है कुछ भी पहन ले,  कौन सा तुझे लडके वाले देखने आने वाले हैं जो तू इतना सज धज के ऑफिस जा रही है। क्या दी?  हर वक़्त वही बात। लड़के वाले आयेंगे ना तो मैं घर का सबसे गन्दा वाला सूट पहन कर उनके सामने जाऊंगी,  शादी करनी हैं करें न करनी हो न करें मैं जैसी हूँ वैसी ही रहूंगी। तो ऑफिस जाने के लिए खुद को क्यों बदल रही है छुटकी।  पहन जा ना ये ही घर वाले कपड़े।  लाती हूँ तेरे लिए लंच पैक करके, तू ज़रा ठहर। कहाँ जानती थीं गरिमा दी की उनकी छुटकी पहले दिन ही सब पर हर प्रकार से अपना प्रभाव छोड़ देना चाहती थी, आखिर बैंक की मेनेजर बन कर जो जा रही थी। 

कैसे जायेगी तू छुटकी,  प्रकाश दादा को बोल दूँ ऑफिस जाते हुए रस्ते में छोड़ देंगे तुझे। न गरिमा दी न,  उनके स्कूटर से गयी तो कल ही पहुंचूंगी ऑफिस। ओला कैब बुक करके चली जाऊंगी पहले ही दिन देर से पहुंचने का मन नहीं है मेरा। अच्छा बाबा जो तेरा मन करे कर, पर याद रख बचपन से आज तक तू हमेशा प्रकाश दादा की स्कूटर पर ही बैठ के गयी है सारे इम्तिहान देने, और ये बैंक का पेपर भी उनके स्कूटर ने ही पास कराया है तुझे। क्या दी?  ये मेरी मेहनत का फल है स्कूटर किसी को एग्जाम पास नहीं कराते।  पर तुम नहीं समझोगी,  तुम्हारे तो सारे काम भगवान् को हाँथ जोड़कर ही पूरे हो जाते हैं, पर मैंने मेहनत की है और अपनी मेहनत का श्रेय मैं किसी स्कूटर को नहीं दे सकती।  अपना पर्स संभालते विदुषी घर से निकल जाती है। अरे दही शक्कर तो खा ले आज तेरा पहला दिन है ऑफिस का।  अरे दी आप खा लो अब मुझे देर हो रही है। बड़ा तगड़ा विरोधाभास था दोनों बहनों में एक बिलकुल धरातल पर पाँव जमाये हुए और दूसरी हवाओं में उडती तितली की तरह जिसने अपनी उड़ान की सीमा तक निर्धारित नहीं की थी। जल्दी चलाओं ना गाडी, कार चला रहे हो या साईकिल ,आज ही पहुंचा दोगे न, आईने में खुद को निहारते बडबड किये पड़ी थी विदुषी। मैडम जी देखिये तो कितना जाम है अब क्या गाड़ी उड़ा के ले जाऊँ।

उफ़ ये दिल्ली का ट्रैफिक भी। अच्छा अब चलो बातें कम बनाओ।  आज पहली बार एच.डी.ऍफ़.सी बैंक जा रही थी विदुषी, और वो भी मनेजर बन कर। लिफ्ट में भी वो खुद को शीशे में निहारती रही की कहीं कोई कमी ना रह जाए। लिफ्ट से निकल कर बस गेट पर पहुंची ही थी वो गेट अपने आप खुल गया। वाह ऐसा तो उसने बस अंग्रेजी पिक्चरों में देखा था। गेट से अन्दर घुसते ही चपरासी ने उसका सामान उसके हाँथ से ले लिया और सामने खड़े एक स्टाफ ने बढ़ कर उसे गुलदस्ता दिया और वेलकम किया। मैं प्रणव हूँ मैडम , साल भर से इसी ब्रांच में हूँ,  आइये आपका परिचय सभी लोगों से करवा दूं। ये मीनल , ये निशा ,ये पूनम, ये आदित्य जी हमारे वहां के सबसे सीनियर स्टाफ,  ये रोहन, ये मनोज ........सबसे बड़ी ही आत्मीयता से हाँथ मिलाती विदुषी रुक गयी जब प्रणव ने उसका परिचय पुरुष प्रधान से करवाया और बस दोनों हाँथ जोड़ कर वो बोली, प्रणव जी काम शुरू करें मेल जोल तो हो ही जायेगा।  बैंक के कष्टमर हमारी पहली जिम्मेदारी हैं, किसी भी कारन से उन्हें असुविधा नहीं होनी चाहिए। पुरुष प्रधान अपने दोनों हांथों को जोड़े मैडम के उत्तर की प्रतीक्षा में खड़े रहे। 

प्रणव : आइये मैं आपको आपका केबिन दिखा देता हूँ और विदुषी प्रणव के पीछे होली। अपने केबिन में पहुँच कर उसने प्रणव से ऑफिस के काम से सम्बंधित सभी जानकारियाँ प्राप्त की और काम में लग गयी। और कब लंच हो गया उसे पता ही नहीं चला। सारा ऑफिस स्टाफ लंचरुम में एकत्र हो गया और प्रणव विदुषी को बुलाने आ गया , आइये मैडम हमारे साथ लंच करिए। विदुषी लंचरुम में आती है, दिन भर आपाथापी में काम करता बैंक का स्टाफ मस्ती के मूड में था सब हंस बोल रहे थे और पुरुष के लंच के पीछे पड़े थे मानों उसमें कोई अमृत रखा हो। सबने एक दूसरे से बाँट कर खाना खाया, पर कोई भी ये महसूस ना कर सका की विदुषी ने सबका लंच तो शेयर किया पर पुरुष का लंच नहीं खाया। हाँ पुरुष डील डौल , बात करने के लहज़े, शक्ल सूरत में थोड़ा अलग था। पर बहुत संतोषी, स्पष्ट,  मेहनती, मृदुभाषी  सभी का सहयोग करने करने वाले। पूरा स्टाफ उनका बड़ा सम्मान करता था। उम्र में वो शायद उतने बड़े नहीं थे कुछ चार पांच साल ही बड़े होंगे बाकी स्टाफ से। पर न जाने क्यों विदुषी को उसका होना पहले दिन से ही अखरने लगा था। ऑफिस से लौट कर विदुषी ने पलंग पे अपना बैग फेंका , गरिमा दी चाय मिलेगी,  ऑफिस में वो डिप डिप वाली चाय पी कर दिमाग खराब हो गया। हाँ हाँ ज़रूर मिलेगी,  तुम्हारी अदरक , काली मिर्च और ज्यादा सी चीनी वाली चाय। कैसा था आज का दिन राजनंदिनी।  आज तो काम करना पड़ा होगा तुझे , कैसा रहा तेरा पहला दिन ऑफिस में। चिटक गयी विदुषी गरिमा दी के मुंह से निकले व्यंगात्मक संबोधन राजनंदिनी से।  तुम तो ना दी बस मुझमे बुराइयां ही खोजती रहो , कभी अच्छाइयों को ढूँढने का भी प्रयत्न कर लिया करो। 

अब बोलो तो चाय पियूं वरना जाके अपने लिए चाय खुद बना लूं। इतना क्रोध कहाँ से भर के लायी है विदु ? वैसे तो राजकुमारी कहने पर तू बोलती थी हाँ हूँ मैं राजकुमारी और तुम सब मेरे गुलाम हो। आज क्या हुआ तुझे? ऑफिस में कुछ हुआ क्या? सब ठीक तो है? हाँ सब ठीक है? और क्या होगा ऑफिस में ? जो होगा बाकियों के साथ होगा मैं बॉस हूँ वहाँ दी बॉस।  अब लेट लूं थोड़ी देर अगर तुम आदेश करो तो , थक गयी हूँ बहुत। ठीक है तू आराम कर मैं खाना बना लेती हूँ, क्या खाएगी ये बता? कुछ मत बनाओ दी आज खाना खाने बाहर चलेंगे, कुछ चाईनीज़ खाते हैं आज। अच्छा ठीक है, बाबूजी को फ़ोन कर देती हूँ और माँ को तैयार होने को बोल देती हूँ मैं। ठीक है दी बोल दो सब एक घंटे में चकाचक तैयार हो जायें। उठ जा विदु, सब तैयार बैठे हैं माँ ने शुगर की दवा भी खा ली है, बाबा भी अपनी ऐनक लगा के तैयार बैठे हैं आज केंचुएं खाने के लिए। छि दी केंचुएं नहीं नूडल्स कहते हैं उन्हें , कितनी बार समझाया। मुझे नहीं बाबा को समझा की वो केंचुएं नहीं नूडल्स हैं हँसते हुए बोल के गरिमा दी कमरे से बहार चली जाती हैं। अरे मैडम आप यहाँ कैसे? विदुषी अरे प्रणव जी , बस कुछ ख़ास नहीं फेमिली के साथ डिनर के लिए आयें हैं।  ये माँ बाबा और गरिमा दी हैं। नमस्ते अंकल, नमस्ते आंटी, नमस्ते दी। आओ न बेटा तुम भी हमारे साथ खाना खा के ही जाओ। 

आज विदुषी केंचुएं खिलाने ले जा रही है। बाबा अब बस भी करो नूडल्स बताया था ना। बाबा हँसते हुए तू तो हमें पिछले छह सालों से बता रही है, पर हम सीखना ही नहीं चाहते, कहते हुए ठाह्का मार कर हंस देते हैं। नहीं अंकल फिर कभी आज ज़रा जल्दी में हूँ चलता हूँ।  फिर मुलाकात अवश्य होगी।  नमस्ते। माँ कौन है ये लड़का, तेरे साथ ऑफिस में ही है , बड़ा संस्कारी लग रहा था, देख कैसे सबको नमस्ते की उसने। तुझे कैसा लगता है विदु? माँ तुझे कुछ और सूझता भी है शादी ब्याह के अलावा अभी मुझे बहुत कुछ करना है  और एक शादी का नतीजा देख के अभी सुकून नहीं मिला तुझे जो मेरी शादी के भी पीछे पड़ गयी हो। गरिमा के चेहरे की ख़ुशी का पीला पड़ जाना शायद उस दिन पूरे राजीव चौक ने महसूस किया था , बस विदु ही उसका दर्द ना समझ सकी। बाबा ने गरिमा के कंधे पर हाँथ रख उसे सांत्वना देने का प्रयत्न किया और बस इतना ही बोल सके छोटी है जाने दे। गरिमा ने बाबा के हाँथ पर हाँथ रख मौन आश्वासन प्रदान कर दिया की सब ठीक है बाबा , मैं भी ठीक हूँ। चलिए विदु के नूडल्स खाते हैं। 

हंसी ठिठोली के साथ सब खा पी कर घर आ कर सो गये बस जगती रही तो गरिमा , जो अपने बीते हुए कल को रोज़ अपने साथ चलते हुए पाती थी कभी बाबा की लाचारी में , अभी अम्मा की शुगर की बीमारी में जिसका पूरा दोष वो उन चिंताओं को देती थी जो उसकी टूटी हुयी शादी के कारन उसकी माँ को हुआ था और बची कुची कसर विदु की बचकानी हरकतें कर देतीं।  रात आँखों ही आँखों में बीत गयी गरिमा की और पूरी रात विदु सपने में जाने क्या क्या बडबडाती रही।  सुबह आँख मलते उठी विदु , दी चाय दे दो न , मैं फिर लेट हो गयी कहते हुए बाथरूम की तरफ सरपट दौड़ गयी। गरिमा दी से अपनी मनपसंद चाय बनाने को बोलना उसकी दिनचर्या का हिस्सा ही था। दिन सरपट उड़ते चले जा रहे थे और आफिस के लोगों से उसकी दोस्ती भी बढ़ रही थी और कुछ रिश्ते भी पनप रहे थे। प्रणव के सहयोग और साथ ने उसे जल्दी ही आफिस का सारा काम सिखा दिया था और अपने साथ कि आदत भी डाल दी थी। अब प्रणव उसे सुबह घर से ले लेता और शाम को आफिस के बाद उसे घर छोड़ता हुआ जाता। कभी घर की चाय कभी कॉफी शॉप की कॉफी दोनों साथ साथ ही पीते। बस अगर किसी को विदुषी आत्मसात ना कर सकी थी तो वो पुरुष था । पिछले कुछ महीनों में शायद एक या दो बार ही उसने पुरुष को किसी काम के लिए बुलाया होगा। और पुरुष भी उसकी ये नफरत महसूस कर सकता था पर आदत से मजबूर पुरुष की वो मधु भरी मुस्कान विदु को भी वैसे ही मिलती जैसे बाकी सबको मिलती थी।समय पंख लगा के उड़ रहा था ।

आज विदुषी के ऑफिस में एक पार्टी थी, सभी खुश थे और शाम की पार्टी की तैयारियों में लगे थे, कोई फूलों का आर्डर दे रहा था तो कोई वाइन का , कोई खाने की व्यवस्था देख रहा था तो कोई डी जे वाले की।विदुषी ने भी घर पर फ़ोन करके पापा को बता दिया था, की वो आज देर से घर लौटेगी।सभी लोगों ने बैंक की सफलता के उपलक्ष्य में दी गयी पार्टी एन्जॉय की और रात करीब एक बजे अपने अपने घर के लिए निकल पड़े।प्रणव ने कहा विदु मैं छोड़ दूंगा तुम्हें।तभी पुरुष ने बीच में ही बोलते हुए कहा मैडम आपके घर का रास्ता रात में मोटर बाइक पर जाने के लिए सुरक्षित नहीं है, आप कैब बुक कर लीजिए वो ज़्यादा सुरक्षित होगा।आप परेशान ना हो , प्रणव है मेरे साथ, उसके रहते मुझे कोई खतरा नहीं । चलो प्रणव बहुत देर हो रही है।दोनों निकलते हैं।आज बहुत मज़ा आया सब कितने खुश थे न प्रणव। हाँ विदु। बहुत दिन बाद आफिस में ऐसी पार्टी हुई है।दोनों अपनी ही मस्ती में चले जा रहे थे।

विदु प्रणव के कंधे पर सर टिकाए बैठी थी और कुछ गुनगुना रही थी और प्रणव गाड़ी की गति धीमी कर उसका गाना सुनने की कोशिश कर रहा था। विदु को लग रहा था प्रणव जैसा साथी पाकर उसे सब कुछ मिल गया है, कोई भी लड़की शायद ऐसा ही साथी चाहती है जिसके साथ वो पूर्ण रूप से सुरक्षित महसूस कर सके ,जो उसका पति होने से पहले उसका दोस्त हो, जो उसकी संवेदनाओं को महसूस कर सके। स्वयं के भाग्य पर गर्व करती विदु अपने में ही प्रसन्न हो रही थी।तभी अचानक प्रणव गाड़ी के ब्रेक तेजी से दबाता है और विदु सकपका जाती है , क्या हुआ प्रणव?और कुछ लोग हाँथ में हथियार लिए उन्हें घेर लेते हैं।सारा सामान हमारे हवाले कर दो।प्रणव उग्र हो कौन हो तुम लोग ? तुम्हे पता नहीं कौन हूँ मैं? कौन है बे तू, और बंदूक से भी नहीं डरता है क्या? कहते हुए एक हवाई फायर करता है। अबकी नही लगी तुझे इसका मतलब ये नहीं कि हर बार नहीं लगेगी।प्रणव घबरा जाता है सारा सामान दे दो विदु बहुत खतरनाक लोग हैं ये।विदु अपना पर्स दे देती है।समझदार है तू , अब थोड़ा और समझदार बन और अपनी जान प्यारी है तो लड़की को छोड़ और अपनी जान बचा कर भाग वरना। देखो तुम मुझे नहीं जानते , मुझे कुछ भी हुआ तो पुलिस तुम्हे छोड़ेगी नहीं मैं कमिश्नर का बेटा हूँ।अच्छा वो हम तेरे मरने के बाद देख लेंगे। कहते हुए उसके पैर की तरफ़ गोली चलाता है।और प्रणव वहाँ विदु को अकेला छोड़ गाड़ी उठा कर भाग जाता है। विदु बहुत मिन्नतें करती है पर वो उसकी एक नहीं सुनते। तभी एक कार बहुत तेज़ी से आकर बिल्कुल विदु के बगल में आ कर रुकती है , एक हाँथ विदु को अंदर खींचता है और विदु कार की सीट पर आ कर लगभग गिर सी जाती है, और कार फुल स्पीड में आगे बढ़ जाती है। कहाँ ले जा रहे हो मुझे, कौन हो तुम कहकर जैसे ही वो कार के ड्राइवर की तरफ मुड़ी तो देखा वहां पुरुष बैठा था। परेशान मत होइए मैडम, में आपको अपने घर ले जा रहा हूँ, आप कपड़े बदल लीजिये फिर आपको आपके घर छोड़ दूंगा।

आपसे कहा था ये रास्ता खुली गाड़ियों से जाने वाला नहीं है, में रोज़ इसी रास्ते से जाता हूँ। नहीं मुझे नहीं जाना तुम्हारे साथ मुझे यहीं उतार दो। डरी हुई विदु को कुछ समझ नहीं आ रहा था। आँखें लाल थी , बदन कांप रहा था, कपड़े फटे हुए थे, और विश्वास छिन्न भिन्न था, जिसके साथ सुरक्षित महसूस कर रही थी वो अपनी जान बचाने के लिए उसे दांव पर लगा कर चला गया था। और ना जाने क्यों जिससे वो नफरत कर रही थी वो उसे वहाँ से बचा के ले आया था। पर इतनी नफरत झेलने के बाद भी वो उसे क्यों बचा लाया ये प्रश्न बार बार विदु के मन को परेशान कर रहा था। और वो पुरुष को भी शंका की दृष्टि से ही नाप रही थी।शायद पुरुष उसके मनोभावों को समझ गया था, गाड़ी को ब्रेक लगाते हुए, मेरा घर आ गया मैडम, आप आइये ।नहीं में यहाँ से अपने घर चली जाऊंगी तुम परेशान मत हो।अच्छा ठीक है चली जायेगा, बस कपड़े बदल लीजिये। पता नहीं क्यों पर विदु के कदम पुरुष के पीछे बढ़ गए। विदु को अंदर से एक सलवार कमीज ला कर देते हुए वो बोला डरिये मत मैडम मुझसे आपको कोई खतरा नहीं ,  आप शायद इसीलिए मुझसे ठीक से बात नहीं करती क्योंकि आपको मैं चेहरे मोहरे से ठीक नहीं लगता, मेरी चाल ढाल अजीब है, पर मैडम इसमें मेरा कोई दोष नहीं, मैं क्या करूं?मैं बस नाम का पुरुष हूँ, ईश्वर ने मुझे इस योग्य नहीं समझा कि मुझे किसी का प्रेम मिल सके इसीलिए मुझे किन्नर बना कर धरती पर भेज दिया। हतप्रभ बैठी सुन रही थी विदु , और बोलता जा रहा था पुरुष, शायद आज वो अपने मन की सारी व्यथाएं कह देना चाहता था। विदुः स्वयं पर शर्मिंदा थी कि उसने क्या कर दिया। ईश्वर की एक कृति के साथ कितना अभद्र व्यहवार कर दिया।

आज उसने महसूस किया कि कमियों से युक्त इंसान कितनी वेदनाओं से गुज़र रहा होता है और खास कर वो कमियां जो प्रकृति प्रदत्त होती हैं, और उन कमियों के दोषी वो नहीं होता। शायद ऐसी ही बहुत सी वेदनाओं से भरा हुआ था पुरुष।बस एक ही वाक्य निकला उसके मुंह से आफिस मेंहां आफिस में सब जानते हैं मैडम। आज वो स्वयं को बहुत छोटा महसूस कर रही थी। कपड़े बदलवा कर पुरुष ने उसे उसके घर छोड़ दिया। विदुषी पूरी रात ना सो सकी और बस पुरुष के बारे में सोचती रही।सोमवार सुबह आफिस पहुंचते ही उसने पुरुष को अपने केबिन में बुलाया और माफी मांगीहो सके तो हमें छोटा समझ कर माफ कर दीजिए मेरे गलत व्यहवारों के लिए। पर आपसे कुछ कहना चाहती हूँ, आज उसका तुम आप में बदल चुका था।

जी मैडम आप कुछ भी कह सकती हैं, कहिये।वो नपुंसक हैं जो स्त्रियों को बस समान समझते हैं, वो नपुंसक हैं जो अपनी मर्यादाओं का उल्लंघन करते हैं, वो नपुंसक हैं जो विपत्ति में फंसी एक लड़की को अकेले छोड़ के भाग जाते हैं।और मैं समझ चुकी हूं कि कोई भी पुरुष या किन्नर शरीर से नहीं अपने विचारों से होता है।इसलिए आपसे अनुरोध है मेरा मुझे मेरी सभी गलतियों के लिए माफ कर दें।

स्वधा रवींद्र "उत्कर्षिता", लखनऊ सिटी।