घाट 84 : रिश्तों का पोस्टमार्टम- भाग-5

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फीचर्स डेस्क। तुम सच मे बहुत क्यूट हो..मासूमियत चेहरे पर साफ साफ दिखती है। आज भी ऐसे लड़के होते हैं इस पर विश्वास करना बहुत कठिन है। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि मेरे साथ ये हो क्या रहा है ? बस जो हो रहा है उसे मैं होते रहना देना चाहता था। पता है सौरभ- जब तुम्हें पहली बार देखा था तो एक अजब सा अपनापन लगा। अभी तक मेरे मुंह से एक भी शब्द नहीं निकला था, वो खूबसूरत सी आवाज़ कब 40 मिनट बीत गये पता ही नहीं चला, निशा क्या कह रही थी कुछ समझ नहीं आया बस उसकी आवाज़ सुने जा रहा था। फिर आवाज आयी ... सौरभ ट्रेन चल दी है नेटवर्क कट रहा है, और फ़ोन कट। कभी कभी ये मोबाइल नेटवर्क ही प्यार का सबसे बड़ा दुश्मन बन जाता है। मारे खुशी के मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था।

तभी फिर से मेरा दरवाजे पर दस्तक हुयी.....मैंने धीरे से दरवाजा खोला तो देखा अंकल की लाल आँखे हांथ में एक लम्बा चाकू लिये मुझे बाहर आने को बोल रहे थे। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि पिछले दो दिनों से मेरे साथ ये हो क्या रहा है ?

मैंने सहमी सी आवाज में बोला अंकल आप ठीक तो हैं ना.... हां यार, नीम की लकड़ी के टुकड़े कर रहा था कपूर के साथ जलाने के लिये...सुना है इससे मच्छर भी मर जाते हैं और वो जो विदेशी वायरस फैल रहा है वो भी खत्म हो जाता है...वही लकड़ी आँख में उछलकर लग गयी। मेरी सांस में सांस आयी ओ थैंक गॉड...क्या ? अंकल ने कहा... अरे कुछ नहीं वो आपको थोड़ी ही चोट लगी है मैंने बात घुमाते हुये कहा...इस कमरें में आई ड्राप रखा है अलमारी में वो निकाल दो। फिर अंकल बोले अकेले नींद नहीं आयेगी नई जगह है तो चलो मैं भी इसी कमरे में सो जाता हूँ...नही नहीं अंकल....पर वो कहाँ मेरी बात सुनने वाले थे।

अब मैं अंकल से कैसे कहता कि मुझे निशा की डायरी पढनी है....मुझे अकेले ही सोने दो.....मैं चुपचाप लेट गया पर नींद कहाँ आने वाली थी, आँखे भारी थी पर मन हल्का होकर आसमान में उड़ रहा था। अरे भई दुनियां की सबसे खूबसूरत लड़की के मुँह से तारीफ जो सुनी थी। सुनहरी त्वचा वाली, गोल्डन गर्ल, ओह मॉय गॉड, क्या उसके दिल में भी मेरे लिये बत्ती जलती है......हाय रे.....मर जॉवा गुड़ खाके...सौरभ द ग्रेट। शायद मेरी भी प्यार की गाड़ी चल पड़ी ? मैं खु़द ही खुद को छेड़ रहा था। छेड़ते छेड़ते कब सो गया पता ही नहीं चला।

अचानक एक झटके से मेरी आँख खुली तो देखा पास में हीं गुलाबी गाउन में आँटी चाय लेकर खड़ी हैं। कॉलेज नहीं जाना क्या....अंकल भी ऑफिस जाने की तैयारी में है, आँटी ने बोला। यार ये आँटी कितने पतले कपड़े पहनती हैं...अंकल कैसे झेलते होंगें....यार कोई बाहरी घर में आया हो तब तो कुछ तो सोंचना चाहिये...मैंने खुद से कहा फिर बोला जी आँटी, नौ बजे तक मैं भी निकलूँगा।

नहाधोकर मैंने भी जल्दी से अंकल के साथ नाश्ता किया और निकला पहले दिन कॉलेज करने... तीन बजे तक सारे क्लास किये फिर निकल पड़ा मिशन बी एच यू भ्रमण पर.... इतना बड़ा कालेज...इतने संकाय....ग़ज़ब है गुरू....ये सब मैं खुद से ही बाते करता जा रहा था। आई आई टी, हॉस्पिटल, रिसर्च सेंटर दूर दूर तक फैला...हरियाली ऐसी कि धूप भी पूँछकर ज़मीन को छूती होगी....न जाने कितने छोटे बड़े हरे भरे पार्क, सही है सौरभ, बढ़ियां जगह आये हो.....मजे़ करो...

आगे बढा तो एक पार्क के पास ही छोटी सी स्टॉल थी वहीं निशा की मित्र मंडली हँसी ठिठोली करती दिखी...मैं भी पास गया...हाय, कैसे हो आप सब ?, मैंने पूँछा... ठीक नहीं होंगे तो क्या ठीक कर दोगे ?, टुईं ने मुझसे कहा...और सारे तेजी से हँस पड़े, टुईं ये नया है अभी, मज़ाक मत करो यार...स्वाती नें कहा... नया है तो क्या नाँचें ? फिर टुई नें कहा फिर सभी तेजी से हँसने लगे.....मैं झेप गया और सर झुका लिया....क्या ब्रो बुरा मान गये...? टुईं ने मेरे कन्धे पर हाथ रखकर पूँछा...अरे नहीं भई ऐसी बात नहीं, मैंने धीरे से कहा- नहीं बुरा मान जाओगे तो मेरा क्या उखाड़ क्या लोगे ?...फिर टुई ने मज़ाकिया अन्दाज में कहा और फिर सभी तेजी से हँस पड़े....अब बस पण्डित यहां नहीं है तो उसके दोस्त को इतना परेशान करना ठीक नहीं....रश्मि ने कहा...तो क्या करना ठीक रहेगा...शक्ति शिकारी ने आँख मारते हुये कहा।

चल कुछ खाते हैं...समोसा कौन कौन लेगा...पिंकी ने बोला.....लगभग सभी तैयार हो गये, समोसे वास्तव में अच्छे स्वाद वाले थे....तो और क्या चल रहा है सौरभ....? पिंकी ने कहा...सभी को तो जानते हो, परिचय हुआ है ना...? फिर से मुझे सबका परिचय कराया। कुछ पूँछ सकता हूँ आप लोंगो से मैने धीरे से कहा, हां पूँछो उत्तर मिला।

ये टुईं कैसा नाम है? सब मुस्कुराने लगे और फिर टुईं ने खुद कहा कि बड़ी दुख भरी कहानी है मेरे दोस्त....सुनोगे... मैंने बोला हां बताओ... बचपन में सुई नहीं बोल पाता था। सुई को टुइंर् बोलता था, जब पण्डित मेरी मम्मी से मिलने पहली बार मेरे घर गयी थी तो मम्मी ने उसे मेरी ढेर सारी बचपन की बातें बताई, सुई वाली बात भी बताई बस फिर क्या ...नामकरण की उस्ताद पण्डित जी ने कर दिया मेरा नाम करण बस वही आज तक चल रहा है। तेरी कहानी सच में बड़ी टुई भरी है...रश्मि ने कहा और फिर सभी हँसने लगे। वैसे असली नाम क्या है टुई का...? मैंने धीरे से पूँछा... प्रबल दिवाकर शर्मा....मतलब ये प्रबल भी है।  और शर्माता भी....स्वाती ने कहा।

इस भाई की क्या कहानी है मैनें शक्ति शिकारी की तरफ हांथ दिखाकर पूँछा.....कुछ नहीं ये तो चलता फिरता लफद्दर है, पिंकी ने कहा। "मतलब" मैंने बोला- मतलब ये कि दुल्हन वही जो पिया मन भाये और लड़का वही जो सीनियर पटाये, यही इनका वैज्ञानिक दृष्टिकोण है। अब तक छप्पन वाले नाना हैं.....शिकारी नं. वन, इनका पूरा नाम है शक्ति प्रजापति, तो हो गया शक्ति शिकारी...पिंकी ने बात खत्म करते ही शक्ति के सर पर धीमें से चमाट मारी....

देख सौरभ स्कूल, कॉलेज में टीचरों और दोस्तों के उपनाम जबतक न हों तो क्या खाक स्कूलिंग की...जैसे मैथ वाले प्रोफेसर का नाम "लालपरी", साइंस वाले का "लोटा", इग्लिश वाले छोटा चेतन, हिन्दी वाले का क्या नाम था शक्ति....? स्वाती ने पूँछा....बद्रीनरायण "ठुसकी".....फिर सारे तेजी से हंसने लगे।

छोड़ो यार सौरभ हमारे बारे में तो पता चल ही जायेगा तुम अपने बारे में कुछ बताओ....टुईं ने अपने बालों में हाथ फेरते हुये कहा।

मै बस....क्रिकेट खेलने का साख है, गाने सुनता हूँ, खाना बनाकर खिलाना अच्छा लगता है और कभी कभी कुछ लिख भी लेता हूँ, क्या क्या लिखते हो सौरभ....? शक्ति ने पूँछा... कहानी, दोहे, छनद और कविता लिखता हूँ.....मैने उत्तर दिया....कविता लिखी नहीं जाती भाई पढी जाती है....शक्ति शिकारी ने सामने से 4-5 गुज़रती हुयी लड़कियों की ओर देखकर कहा और उठकर उसी ओर चल दिया। लो चल दिया शिकार पे, ये नहीं सुधरेगा....रश्मि में बड़े मज़ाकिया अन्दाज में कहा।

जाने दे इसे, सौरभ निशा का फोन आया था वो कल शाम को दिल्ली से वापस आ रही है, तुम उसे लेने स्टेशन पर जाओगे ? मेरे मन में मावे के ढेर सारे लड्डू एक साथ फूटने लगे...हां चले जायेंगें, मैंने शर्माते हुये कहा....अकेले नहीं जाना है, हम भी चलेंगें साथ में....रश्मि ने छेड़ते हुये फिर कहा।

मैंने देखा एक लड़का दौड़ता हुआ हमारी ही ओर आ रहा था......वो तेजी से हाँफता हुआ रूका और सांसे भरकर कुछ कहने की कोशिश करने लगा.....पिंकी, रश्मि, टुई, स्वाती, रमन सब उसे बड़ी बेसब्री से देख रहे थे, रमन ने उसे पानी दिया और कहा आराम से बता हुआ क्या है.......?

वो.....वो... अपना .....वो जो अपना... तुलसी... वो तुलसी है ना.. .अरे सांस ले आराम से बता हुआ क्या ......बिल्कुल आराम से, रमन ने उसे धीरज बधाते हुये कहा। फिर वो लड़का बोला कि वो जो अपना तुलसी टपोरी है ना.....उसकी लाश मिली है, रविन्द्र पार्क के पास से... सबके सब स्तभ्ध रह गये... ये क्या.. मेरी हालत फिर जस की तस.....अब ये तुलसी टपोरी क्या बला थी।

क्रमशः इनपुट : सौरभ दीक्षित।