घाट 84, "रिश्तों का पोस्टमार्टम" - भाग-4

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फीचर्स डेस्क। तभी मेरा फ़ोन बजा.... "दिल के टुकड़े टुकड़े करके मुस्कुरा के चल दिये".... निशा ने पलटकर मुझे एक नज़र देखा और सभी जोर से हँस पड़े, निशा ने भी पलटकर एक नज़र देखा और...... वो भी मुस्कुराई। फोन उठते ही उधर से आवाज़ आयी, सौरभ बोल रहे हो...जी, मैंने उत्तर दिया। मैं इन्द्रबदन शर्मा बोल रहा हूँ, सुबह आपके पापा ने नंबर दिया था, जी अंकल, नमस्ते...मैंने कहा। तो शाम 6, साढ़े 6 बजे तक लंका चौराहे पर मिलो...मेरे जी अंकल बोलते ही फ़ोन कट गया।

रश्मि ने कहा...यार सौरभ रिंगटोन तो बहुत बढ़िया लगाई है, फ़िर सब खिलखिला कर हंस दिए। मैंने भी झेंपते हुए कहा कि वो कोई गाना नही मिल रहा था तो बस, ऐसे ही....लग गयी। जतिन ने पूंछा तो ब्रो, रुकने का क्या सीन है..? मैंने कहा आज तो डीएलडब्ल्यू वाले अंकल के यहाँ फिर कोई पीजी देखूंगा, हॉस्टल का क्यो ट्राई नहीं किया, मेरी बात को रोकते हुए पिंकी ने कहा, बस ऐसे ही..मैने उत्तर दिया।

चल फ़िर ठीक मिलते हैं, शक्ति शिकारी ने कहा...हमने अपने फ़ोन नंबर बदले और वो लोग आपस मे हंसी ठिठोली करते हुए चल दिये...दिल के टुकड़े टुकड़े.... हा हा हा...मुझे अभी भी उनकी धीमी धीमी आवाज़ आ रही थी।

मैं बीएचयू से बाहर आया, चौराहे के पास रोड के दोनों ओर बहुत सी खाने पीने की चीजें की दुकानें और ठेले लगे थे, मैं कुछ खाने का प्लान ही बना रहा था कि फ़िर मेरा फ़ोन बजा, मैने नोकिया की डिफॉल्ट टोन को लगा लिया था....हाँ सौरभ कहा हो..? उधर से आवाज़ आयी...जी अंकल महामना की मूर्ती के पास ही हैं, ठीक बोलकर फ़ोन कट...अबे क्या आदमी हैं यें, पूरी बात भी नहीं सुनते, मैने ख़ुद से कहा...

पी पी...होर्न बजा, काली स्प्लेंडर पर बैठे आदमी ने मुझे पास आने का इशारा किया...मैं उस ओर बढ़ चला, 30 मीटर जाने में मुझे 12 मिनट लग गए क्योंकि बनारस में लोग सीधे तो चलना ही नहीं जानते...ऐसा लग रहा था कि यहां के लोग दूसरी गाड़ियां तो छोड़िए पैदल वालों के लिए भी जाम लगावा सकते हैं।

स्प्लेंडर के पास पहुंचा तो 43-44 साल के एक थुल थुल शरीर वाले आदमीं ने बोला सौरभ...और बैठने का इशारा किया, जिसे मैं सर हिलाकर स्वीकार कर चुका था। गाड़ी स्टार्ट हुई और आगे बढ़ने लगी..कुछ दूर चलकर ही उन्होंने बातचीत शुरू कर दी...मुझे कुछ भी ठीक से सुनाई नहीं दे रहा था क्योंकि जब आप बाइक पर पीछे बैठे होते हो तो चलाने वाले कि आवाज़ बमुश्किल ही सुनाई देती है और अगर चलाने वाले ने हेलमेट पहना हो तो भगवान भरोसे... ।

कुछ देर चलने के बाद गाड़ी एक सोसायटी में जाकर रुकी, शर्मा अंकल के भाई डीएलडब्ल्यू में कोई इंजिनियर के पद पर कार्यरत हैं, गाड़ी खड़ी करने के बाद अपना हेलमेट निकलते हुए उन्होंने कहा कि तुम्हारी आँटी थोड़ा मॉडर्न है। मैंने जी मे सिर हिला दिया फिर अंकल के पीछे पीछे चल दिया।

एक घर पर जाकर अंकल ने डोरबेल बजाई अन्दर से एक 32-33 वर्ष की महिला ने आकर दरवाजा खोला, उसने हल्के हरे अंग का सिंगलपीस गाउन पहना था जो काफ़ी पतला दिख रहा था। उससे उनके शरीर पर लिपटे दो कपड़ों को अलग अलग साफ देखा जा सकता था, ये तुम्हारी आँटी हैं....शर्मा अंकल ये कहकर कुर्सी ओर बैठ गये और अपने जूते खोलने लगे...

....आँटी तो सच मे कुछ ज़्यादा मॉर्डन हैं....मैंने बुदबुदाते हुए ख़ुद से कहा, हांलांकि मुझे शर्म से ऊपर देखने की हिम्मत नहीं हो रही थी पर मैंने गौर किया कि आँटी ऐसे देख रहीं थी कि निगाहों से मेरा एक्सरे करने वालीं हैं....

तो तुम हो दीक्षित जी के बेटे सौरभ.....आँटी ने कहा...मैंने नमस्ते करके जी मे सर हिलाया....अचानक आँटी पीछे मुड़ी और कहा चाय या कॉफ़ी.... मैं जैसे ही कुछ कहने को हुआ कि फिर वो बोलीं ठीक है हाँथ पैर धूल लो खाना लगाती हूं साढ़े आठ हो गए हैं......मैंने फ़िर खुद से कहा,  आँटी भी ग़ज़ब ही हैं..

खाना लग चुका था, आलू मटर की सूखी सब्जी, अरहर दाल, के साथ चपाती, सलाद को अच्छे से सजाया हुआ, नमक और आचार को डाइनिंग टेबल के बीच पहले से ही रख दिया गया था, 2 दिन बाद सुकून से खाने बैठा था। मै और अंकल आमने सामने खाना खाने बैठे ही थी कि तभी आंटी भी हमारे साथ खाना खाने आ गयीं जो डाईनिंग टेबल पर बिल्कुल मेरे बग़ल वाली कुर्सी पर बैठी थीं, 

तो सौरभ क्या करने आये हो बनारस....आंटी ने पूंछा, पोलिटिकल साइंस में ग्रेजुएशन, मेरा उत्तर सुनकर वो बोलीं, अच्छा और खाना खाने लगीं, खाना खत्म होने के बाद अंकल ने पापा को फ़ोन लगाकर बता दिया था कि आज मैं उनके साथ ही रहूंगा... फिर जैसा होगा कल बात करेंगे

मेरा बिस्तर पास के कमरे में हीं लगाया गया था जो देखने मे स्टडी रूम जैसा लग रहा था, मैंने बिस्तर पर लेटते ही चादर को सर से ओढ़ लिया फिर निशा की डायरी खोली और अपने फ़ोन की टॉर्च जला ली, डायरी की लिखावट बहुत ही खूबसूरत थी, मुझे यक़ीन हो गया था कि ये किसी भी विज्ञान संकाय के विद्यार्थी की डायरी हो ही नहीं सकती, क्योकि उनकी लिखावट अधिकतर उनके अतिरिक्त अन्य के पढ़ने के लिए बहुत मुश्किल होती है.....

मेरी उत्सुकता डायरी को छूते ही बढ़ती जा रही थी, दिल भी तेजी से धड़क रहा था, हालांकि कमरे में मै अकेला ही था पर फ़िर भी छिपने को मन कर रहा था, अचानक दरवाजे पर दस्तक हुई...सौरभ

मैंने दरवाज़ा खोला तो आंटी पानी की बोतल लिए खड़ी थी, ये लो और अग़र कुछ चाहिए तो मांग लेना, शर्माना मत.....कुछ भी.... उनका ये अंदाज़ मुझे डरा रहा था पर में हाँ के अतिरिक्त कुछ कह भी नहीं सकता था। मुझे डायरी पढ़ने की जल्दी थी इसिलये आंटी को कहा कि मुझे नींद आ रही है और जल्दी से कमरा बंद कर लिया, डायरी पढ़ना शुरू किया जिसपर सबसे पहले लिखा था, अंतिम इच्छा....जिस दिन मेरी बिटिया डुग्गू अपने पिता से पहली बार मिले, उसका विवरण इस डायरी में लिखकर गंगा जी में बहा देना, ये मान लेना मेरी आत्मा को तृप्ति मिल गयी। 

अब ये कौन सा लफ्फदर (कन्फ्यूजन) है बे, मैने ख़ुद से कहा। एक प्रश्न का उत्तर मिलता नहीं साला... 2 नये प्रश्न मुँह खोले खड़े रहते हैं.....मैने डायरी के आख़री पन्नों को खोला, जिसमे 4-5 पेज ऐसे लग रहे थे जो हाल में ही लिखे गए हों,  मैने पढ़ना शुरू ही किया था कि मेरा फ़ोन बजा....

रात के 9 बजकर 50 मिनेट हुए थे, इस टाइम मुझे कौन फ़ोन करेगा...सोंचकर मैंने फ़ोन उठाया...उधर से आवाज़ आयी..सौरभ.. मैं निशा, मैं जानती हूं कि तुम क्या सोंच रहे होंगे कि इतनी रात को मैंने तुम्हें फ़ोन क्यो किया....मैं मंडुवाडीह स्टेशन पर थी, गाड़ी छूटने में अभी आधा घंटा था तो सोंचा कॉल कर लूं। 

निशा...नहीं, पण्डित जी....नहीं मैंम... क्या कहूँ मैंने धीरे से कहा। तुम सच मे बहुत कियूट हो..मासूमियत चेहरे पर दिखती है...शायद इसीलिये मैंने तुम्हें फोंन किया.........बिजी तो नहीं हो... नहीं नहीं बोलिये मैंने कहा... अच्छा लगता है तुमसे बात करना.....एक अजब सा अपनापन होता है तुम्हारी बातों में... निशा कुछ बोले जा रही थी पर मुझे कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था, बस उसकी आवाज़ जो कानों में शहद घोल रही थी उसी मिठास में बहा जा रहा था। पता ही नहीं चला कि कब आधा घण्टा हो गया। आप जिसे पसन्द करते हो जब उसके साथ रहते हो तो घड़ी भी दुगनी रफ्तार से चलने लगती है, ऐसा लगता है.... फिर आवाज आयी....अब नेटवर्क जाने लगा है तो सौरभ मैं बाद में फोंन करती हूँ..... अचानक आवाज आनी बंद हो गयी...मैं बहुत कन्फ्यूज़ था कि ये हो क्या रहा है मेरे साथ.....

अज़ब सी खुशी भी मिल रही थी और हो रहे घटनाक्रमों से डर भी............डायरी अभी भी मेरे हाथ में ही थी जो मेरे दिल की धड़कने बढा रही थी....जैसे ही मैंने फिर से उसे पढने के लिये खोला दरवाजे पर दस्तक हुयी...दरवाजा खोलते ही मैंने देखा कि अंकल की आँखें बिल्कुल लाल थीं और वो हाथ  में बड़ी सी चाकू लिये मुझे बाहर आने को बोल रहे थे... फिर अचानक... ।

क्रमशः इनपुट : सौरभ दीक्षित