अनुत्तरित प्रश्न 

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28th April, 2019, Edited by Focus24 team

फीचर्स डेस्क। अनुपमा और विमल कुमार को ऐसा महसूस होने लगा  जैसे वे अपने  ही घर में  किसी  सजावटी सामान की तरह हो गये है। विमल जी ऐसा महसूस होता है समपन्नता हमरे लिए एक खूब सूरत सोने के पिंजरे में रहने वाले केदी की तरह हो गईं हैं।

अनुपमा अब तो मुझे भी ऐसा ही लगने लगा है।

"जिसका मन किया जहाँ चाहे जिस कौने में रख दिया सोच लिया चुप चाप रखा रहेगा । "ऐसा सजावटी गुलदान सा जीवन  जहाँ फूल तो खिले हैं मगर खुशबू नहीं है। हमारे जिस्मों​ के अंदर से सजीवता का ऐहसास ही मर गया है ।

" अनुपमा बाहर  सुरमई चादर सी फेली शाम  कभी कितनी सुहानी लगा करती थी। दोनों मिलकर बाहर लान में घंटो बातें किया करते थे।  

अब बाहर जाने का मन ही नहीं करता  क्या हो गया है?

विमल जी दिन तो फिर भी कट जाता है परन्तु जैसे जैसे रात गहराती है मन उद्वेलित हो उठता है ।

हमारी रातों की  नींदें  किस कौने में दुबक गई है ।

नींद को हर रोज घुटनों के बल  ढूंढने पर भी नहीं मिलती शायद हम से किसी बात पर रुठ गई है । 

विमल जी रात की नीरवता में एक ही छत को ताकते हुए "अधेरे मे भी कुछ ऐहसासों को ढूढने की नाकाम कोशिश करते करते कब हमारी सुबह हो जाती है " हमें पता ही नही चलता"

अनुपमा एक बात कहें यू तो घर में दरजनों  गाडियाँ है। लेकिन आप भी चलेगे ऐसा कहने वाला  कोई नहीं ?

" घर में पार्टी की रौनके देर रात तक लगी रहती है "

लेकिन हमारे लिए वहाँ भी कोई जगह नही है। 

विमल जी बच्चों के किसी फ्रेम में  हम फिट नहीं बैठते है। कमरे में बेहतरीन खाना तो मिल जाता है लेकिन एक रोटी और ले लो प्यार से ऐसा कहने और देने वाला कौई नहीं हम दोनो के बीच पसरे संन्नटे में केवल चम्मच की आवाज ही बीच -बीच में खामोशी तोड़ती है। 

विमल जी भोतिक सुखों की कमी नहीं है कमी तो जज्बातों की है सब कुछ बेड पर लगी घंटी बजाते ही सजे सजाए नौकर खाना लेकर हमारे सम्मुख प्रस्तुत हो जाते है खाना खाने के बाद खामोशी से बर्तनों को ले भी जाता है।

दीवारों से टपकती ये खामोशी जो हमारे चारो ओर व्याप्त है। 

ये खामोशी ही काट खाने को दौड़ती हैं

क्या इसी सुख की खातिर हमने घन संचय किया था ? सामने की दीवार पर हर वक्त एक प्रश्न चिन्ह  उनुत्तरित सा लटका रहता है।

कंटेंट सोर्स : अर्विना गहलोत, प्रयागराज सिटी।