शिक्षक दिवस खास : काशी की परम्परा को कायम रखने के लिए संचालित हो रहा “गुरूकुल”

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5th September, 2018, Edited by Ananya Rawat

वाराणसी सिटी। देश ही नहीं विदेशों में भी काशी को विद्या की राजधानी के रूप में माना जाता है। यहाँ धर्म, वेद, विज्ञान, संस्‍कृत, साहित्‍य व संगीत का ज्ञान अर्जित करने के लिए देश के साथ ही साथ विदेशों के कई कोने से छात्र- आते हैं। ऐसे ही काशी समेत सभी स्थानों के बच्चों और बड़ो को तबला का तालीम देने के लिए काशी के श्रीरामचरित मानस के रचयिता गोस्‍वामी तुलसीदास की तपस्‍थली तुलसीघाट के तुलसीकुंज में शास्‍त्रीय संगीत गुरूकुल विद्यालय चल रहा है।

यहाँ फारेनर भी आते हैं सिखने

गुरुकुल के तबला एक्सपर्ट संजय कुमार मिश्र के अनुसार यहाँ पर प्रतिदिन काशी दर्शन को आये विदेशी भी तबला के धून में रंगे रहने के लिए आते हैं।

घाट से दिखता है सुन्दर नजारा

इस गुरुकुल से आप काशी के घाटों में तुलसी घाट का नजारा देख सकते हैं, सुबह नारंगी रंग में प्रकट होते सूर्य देव की छटा निराली होती हैं, जो कुछ छण के लिए किसी स्वर्ग से कम एह्साह नहीं कराती है।

गायन, वादन और शास्‍त्रीय संगीत का पुराना नाता

काशी की बात किया जाय तो यहाँ गायन, वादन और शास्‍त्रीय संगीत का पुराना नाता रहा है, शायद इस धरोहर हो संजोये रखने के लिए इस गुरुकुल की स्थ्पना की गई।

महंत ने किया था 03 सितम्बर को इनागरेशान

इस गुरुकुल का इनागरेशान अभी 03 सितम्बर को संकटमोचन के महंत प्रोफ़ेसर विश्‍वम्‍भर नाथ मिश्र ने किया था।

बारिकियों को सिखाने के लिए जाने जाते हैं गणेश गुरु जी

पंडित गणेश प्रसाद मिश्र ने गुरूकुल में आये छात्र-छात्राओं को स्‍वर गायन, बद्री नारायण पंडित व संजय कुमार पाठक ने तबला वादन के स्‍वर ताल की बारिकियों को सिखाने के लिए ही जाने जाते हैं।

इन विधा में ले सकते है ऐडमिशन

आप अगर तबला, मृदंग, गिटार, सितार, हारमोनियम में रूचि रखते हैं तो इस विधा में यहाँ प्रवेश पा सकते हैं, साथ ही काशी की प्राचीन घाटो के विवरण के लिए आसपास कई साक्षय मौजूद हैं।