घुंघरू

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17th May, 2019, Edited by Abhishek seth

मैं चिता जला कर आया हूं,
रिश्तों की
यादों की
सपनों की
और खुद की भी।

मैंने छोड़ दिया है
डूब के जीना
खुल कर हंसना
कविता पढ़ना
और कलम भी

मैं कौन हूं?
साधु हूं
औघड़ हूं
योद्धा हूं
और डरपोक भी।

मुझे जाना है
कहीं दूर
क्षितिज पर
अपने संसार में
और वापस घर भी।

तुम मेरी क्या थी?
प्रेम थी
प्यास थी
विश्वाश थी
और वैराग्य भी।

तुमने छोड़ दिया
घुंघरुओं को
नृत्य को
प्रेम को
और एक इंसान भी।

अब शेष है,
कुछ चिलम की राख
कुछ अधजले पन्ने
दो पायजेब
और आर्ट्स गैलरी वाला झुमका भी

मुझे अब तुमसे
न प्रेम है
न आसक्ति है
न बैर है
और न ही विरक्ति भी

सुनो,
शांत समुद्र समान है सायं
भांग मिला कर भंग न करना
स्थिर मन फिर चंचल न हो
खग या कोई विहंग न करना
ढल जाएंगे सूरज और हम
घुंघरू बांध के तंग न करना❤️

-सनी सोनी बदरी गुरु