"हर फैमिली की जिम्मेदारी है कि वे अपने बुजुर्गों की केयर करें"

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26th August, 2018, Edited by Neeraj tripathi

वाराणसी सिटी। जिनकी जिंदगी में खुशियां भरने, उनके भविष्य को रोशन करने के लिए खुद को श्रम की भट्ठी में तिल-तिल जला दिया आज उन्हीं ने मुंह मोड़ लिया है। जब कोई त्यौहार आता है तो किसी संस्था के आने की राह देखती इन बोजुर्गों की अपनी कहानी है। ओल्ड ऐज होम में पनाह लिए ये बुजुर्ग हर त्योहार पर ही उदास होते हैं। संस्था की मताए बोलती हैं अब क्या रक्षाबंधन क्या दिवाली और क्या होली। पुरानी जिंदगी याद आती है, तो तकलीफ होती है। उन्होंने कहा सिटी की संस्थाएं और समाजसेवी आकर फल, मिठाई और कपड़े दे जाते हैं। यह सब हमारे मतलब का नहीं हैं। हमें भी अपने परिवार जैसा प्यार और साथ चाहिए। हम चाहते हैं कि लोग हमारे पास खाली हाथ आये और हमसे बात करें।  

प्यार, सेवा, सम्मान देना ही सबसे बड़ा धर्म

अपने लिए तो सभी जीते हैं।  लेकिन दूसरों के लिए जीने वाले शख्स शायद कम ही होते होंगे।  कहा जाता है की आज यदि कोई बड़ा धर्म है तो अपने घर, अपने मुहल्ले और अपने शहर के बुजुर्गों की सेवा करना।  दरअसल, बुजुर्गों के प्रति प्यार, सेवा, सम्मान देना ही सबसे बड़ा धर्म है। कुछ ऐसे ही सोच से परिपूर्ण सिटी के इंटरनेशनल हाकी प्लयेर रह चुकी रश्मि तिवारी ने रक्षाबंधन  के पुर्व संध्या पर सिटी के दुर्गाकुंड स्थित ओल्डऐज होम पहुचीं।  यहाँ वह बुजुर्ग माताओ से मिलाकर उनको खुशियाँ देने की कोशिस कीं।

मैं भी तो आपकी अपनी हूं

सिटी के रश्मि तिवारी उस समय भावुक हो र्गइं, जब वे शनिवार को शाम दुर्गाकुंड ओल्ड ऐज होम में बुजुर्गो के साथ उनकी संवेदनाओं को बांटने के लिए पहुंची। एक बुजुर्ग महिला ने तो उनका पकड़ लिया और अपने साथ कुछ पल बैठने का आग्रह किया। उन्होंने उन माता के पास हमेशा आने का प्रामिस भी किया। इसके बाद अन्य बुजुर्गों से मिलकर उनके सारे अनुभव को समझने की कोशिस की। बता दें कि उपायुक्त लाख कोशिशों के बाद वह अपने आंसू रोक नहीं पाईं। यह वो भावुक क्षण था, जब रश्मि तिवारी ने बुजुर्ग महिलाओं का हाथ पकड़ कर कहा कि मैं भी तो आपकी अपनी हूं।

कई स्टेट से हैं मताए

इस ओल्ड ऐज होम में रहने वाली माता किसी एक स्टेट से नहीं बल्कि कई स्टेट से हैं।  इनके साथ बैठकर इनकी दुःख-सुख समझना अपने आप में एक शुकून भरा पल से कम नहीं होता।

भाषा अलग शब्द अलग पर प्यार एक जैसा

इस ओल्ड ऐज होम में 23 मताए रहती हैं, सभी के अलग स्टेट होने के कारण अपने भाषा अलग हैं अपने शब्द अलग हैं पर खास यह है की यहाँ पहुचने वाले लोगों के लिए प्यार सभी के एक जैसे हैं।

बुजुर्गों की दुआओं से बड़ी कोई दौलत नहीं

बुजुर्गों की सेवा करने में काफी फक्र महसूस होता है। यह सौभाग्य हर किसी को मिल पाना मुमकिन नहीं है। बुजुर्गों की दुआओं से बड़ी कोई दौलत नहीं होती। बुजुर्ग हमेशा ऐसी बातें बताती हैं जो जीवन में बहुत उपयोगी होती है। ऐसे में उनकी सेवा करने से बेहद खुशी मिलती है। अपने बुजुर्गों का, अपने माता-पिता का सम्मान करें। आधुनिकता की होड़ में हम उनसे दूर होते जा रहे हैं। हमें उनके पास बैठकर उनकी भावनाओं और संवेदनाओं को समझना होगा ताकि वे अपने मन का बोझ हलका कर सकें। युवाओं को हर रोज अपने माता-पिता के पास बैठना चाहिए।

रश्मि तिवारी, पूर्व इंटरनेशनल हाकी प्लयेर, वाराणसी सिटी।

हमेशा अपने माता-पिता को प्यार करें

आप अपनी जिंदगी में तरक्की करना चाहते हैं तो सबसे पहले घर के बड़े बुजुर्गों की सेवा कीजिये। मैं आप सब से एक ही चीज कहना चाहता हूं कि आप हमेशा अपने माता-पिता को प्यार करें। उन्होंने आपको बनाया है इस बात को कभी न भूले क्योकि वो खुस तो आप खुस। हमें आज ही को सब कुछ नहीं मानना चाहिए। आज भविष्य में एक बुजुर्ग के साथ आने वाली समस्याएं हो सकता है कभी हमारे व्यक्तिगत जीवन का हिस्सा बन जाएं, इसलिए हमें अपने बच्चों में नैतिक जिम्मेदारी को पनपने का अवसर देना होगा और उनके साथ संवेदनाओं का फैलाव ज्यादा से ज्यादा करना होगा।

शिवम वाजपेई, बिजनेस पर्सन, वाराणसी सिटी।

हर फैमिली की जिम्मेदारी है

हमारा दायित्व बनता है कि हम अपने बच्चों को ऐसी संस्कृति संस्कार दें ताकि वे अपने दादा दादी या माता-पिता के बुजुर्ग होने पर उनकी खूब सेवा करें। ताकि बुजुर्गों को वृद्धाश्रम का सहारा लेना पड़े। यह हर फैमिली की जिम्मेदारी है कि वे अपने बुजुर्गों की केयर करें। आज बुजुर्ग लोगों को बोझ लगने लगे हैं, ओल्ड एज होम भेज दिया जाता है। यह गलत है। सभी को आना है इस अवस्था में, शुरू से ही बच्चों में बुजुर्गों के प्रति बेहतर संस्कार डालें। सभी लोगों को अपने जीवन से जुड़ी बातें बुजुर्गों के साथ सांझा करनी चाहिए। हमें अपने बच्चों को भी घर के बुजुर्ग की संवेदनाओं को समझने का अवसर प्रदान करना चाहिए, क्योंकि हम सबको बुजुर्ग होना है।

सौरभ दुबे, प्रबंधक, द अवेकर्स सोसायटी, वाराणसी सिटी।

संजय दत्त की फिल्म का डायलाग

इस दौरान सौरभ दुबे ने कहा कि - दोस्त्तो शायद आपको संजय दत्त की फिल्म ‘लगे रहो मुन्ना भाई’ याद होगी जिसमे एक डायलाग था कि ‘मैंने एक घर में चार बेटों को पाल कर बड़ा किया लेकिन चार बेटों के घर में एक बाप को रखने की जगह नहीं है।’ यह जुमला असली जिंदगी में उस वक्त तल्ख सच्चाई के साथ सामने आता है जब ओल्ड एज होम्स के बारे में कोई खबर छपती है। 

देशी घी, बिस्किट, चाकलेट और मिठाई

इस दौरान संस्था की अगुआई में सिटी की सोशल वर्कर रश्मि तिवारी और बिजनेस पर्सन शिवम वाजपेई ने ओल्ड ऐज होम और अंध विद्यालय में खाने-पिने और तेल, मंजन और मिठाई देकर माताओ से आशिर्बाद लिया।  वहीँ अंध विद्यालय में रह रहे स्टूडेंट्स जरुरत की वस्तु पाकर खुश दिखे।