जब स्त्री को तोड़ने की...

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7th June, 2019, Edited by Shivangi Agarwal

जाने क्यों लोगो के बदल जाने पर, मन का मौसम ठहर जाता है

बदलना प्रकृति का शाश्वत नियम है,  रात दिन में दिन रात में बदलता है

सर्दी गर्मी बरसात नियम से आते जाते हैं.....

नियमों के भंग होने का भी,  नियम उतना ही सत्य है!

बेमौसम बारिशें भी कोई , दुर्लभ  घटना तो नहीं?

कितने सावन भी सूखे ही बीत जाते है

फिर तुम्हारे बदल जाने से बोलो तो

क्यों मन के सातों सागर रीत जाते है?

तुम्हारा प्यार चाँद जैसा अपनी सुविधानुसार घटा-बढ़ा

फर्क बस इतना था कि इस घटने बढ़ने का कोई

निश्चित क्रम न रहा,  मैं पूनो के चाँद के गिरफ्त में रही

और हिस्से में सदा अमावस ही आयी,  यह मेरे ही नक्षत्रों का दोष भर रहा

अपनी धुरी पर घूमते,  तुम्हारा मेरी धुरी के

करीब हो गुजरना,  एक संजोग भर था

मैं उसे आकाशगंगा का,  कोई सुनियोजित इशारा

समझ बैठी मेरे वजूद पर तुम्हारे वजूद की छाया ने

जब बाधित कर दी मुझ तक पहुँचती हर रोशनी

मैं उस पूर्ण ग्रहण में भी प्रेम की अहसास भर से रोशन ही रही।

यह युगों का सच है, जब स्त्री को तोड़ने की पुरुष की हर कोशिश विफल हुई

तब पुरुष ने जताया, बेइंतहा प्यार और फिर मुहँ मोड़ लिया

इसी सहजता से क्यों नहीं बदल पाती स्त्री क्यों निर्मोही पुरुष से

हर रिश्तें में उसने मोह का नाता जोड़ लिया!

कंटेंट सोर्स : निधि अग्रवाल, झासी सिटी, यूपी.