आवाज

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3rd October, 2019, Edited by Pratima Jaiswal

आवाज की अनुगूँज गुंजित हो रही है, हर जगह उठता धुआँ बारूद का।

हर कदम बढने लगे शमशान तक, हर जुबान कहने लगी गम की सदा।

हर नजर मे आज बस सन्त्रास है, क्यों हुई कैसे हुई ऐसी दशा ?

बोल कुछ  तो बोल मन  मे तौल कर, शब्द की शक्ति अनर्गल ना बहा।

शब्द ही  है ब्रह्म यह ही है सुधा, अपनी कोई कुण्ठा अपनी कोई गरज।

अपने कोई अरमान कोई अपनी क्षुधा, जब नही मिट पाई और बढती गई ।

कर दिये विष का वमन उँचाई से, वायु लेकर उड़ चली चहुँ ओर है ।

देख इसका हस्र  सेको हाथ धधकी चिता, खो चुके हैं जो लाल माता पिता।

डरो उनकी आह से ए बेशरम , कर सको तो करो कुछ ऐसा करम।

मिटे मन  का क्षोभ घटे वैमनश्यता, सो रही जो जाग  उठे वो मनुष्यता ।

-सावित्री मिश्रा, झारसुगुड़ा,ओडिशा।