अपनी नींदे गिरवी रख मुझे सुलाने की भागमभाग

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29th September, 2019, Edited by Vineet dubey

फीचर्स डेस्क। जानती थी यह कलयुग चल रहा है। समय गति अपने हिसाब से चल रही है। और आप मैं हम सब  इसकी गुलामी कर रहें। मुश्किल है साथ देना फिर भी गिरते पड़ते हाँफते बस इसके साथ चलने की कोशिश करते हैं। रोजमर्रा की कहानी है। खुशी का नाटक करते कल की चिंता में मरते हम जनमानस एक पल भी खुद के लिए नही जीते।

पता नही कितने लोग सहमत होंगे इस बात से पर मैं शतप्रतिशत सहमत हूँ। जिंदगी में  भागमभाग ही देखती आई हूँ। सैन्य चिकित्सा अधिकारी पिता के साथ सफ़र बहुत तय किए हैं। उनकी भागमभाग देखी रुकते  ही नही थे बस हर तीसरे साल तबादले। हम सब बढ़ रहे थे। वैसे  ही उनकी उम्र उतना ही luggage भी। अंत retiredment वहाँ भी जिंदगी की भागमभाग उफ़्फ़फ़। शांत देखा ही नही औऱ माँ भी अपनी जिम्मेदारियों सँग उम्र  की   चाँदी समेटे जिंदगी के आखरी पलो को हम औलादों की सलामती के लिए दुआ माँगती हुई दिखती है। मानसिक सुकून अब भी भागमभाग में।

बहुत वर्षों बाद माँ को करीब से देखा था।robort सी माँ हिम्मत में कही कम नही दिखी।जोश अंदर भरा था। मुझे हिम्मत देती। सर पर हाथ फेरती। बेहोशी में भी सोच रही थी। क्या यह सन्तान की फिक्र थी जो उन्हें आज भी  एक ताकत दे रही थी।नाजुक उम्र जहां मुझे उनकी फिक्र करनी चाहिए थी वहाँ पर  वह मेरी फिक्र कर रही थी। दूसरी ओर में एक माँ अपने दोनों बच्चो को देख अंदर ही अंदर मर रही थी।एक माँ की ऊर्जा दूसरी माँ में समाहित हो रही थी। अद्भुत था वह मंजर। एक तरफ  माँ का वात्सल्य हिम्मत दे रहा था। उसके दूसरी तरफ मेरा ममत्व दोनो बच्चो   को एक नज़र देखने को आतुर था।

पति का कुम्हलाया चेहरा उनकी आँखें शून्य थी। मेरी ज़िंदगी को बचाने की जद्दोजहद औऱ वही भागमभाग। दस दिन नींद को परे कर सिर्फ मेरी हर हलचल का इंतज़ार करती वह आँखे नही भूलती मैं। मेरी एक उफ़्फ़फ़  औऱ उनका मेरा हाथ  संभालना  औऱ कहना सब ठीक है।सोने की कोशिश करो।अपनी नींदे गिरवी रख मुझे सुलाने की भागमभाग। Icu का मेरा जहाँन औऱ बाहर की दुनीयाँ की कल्पना ।मानो दूसरी दुनियाँ में आना गारंटी नही की आप अपनो के पास लौटोगे की नही।सच तब सही लगा  ज़िन्दगी एक पानी का बुलबुला। दूसरे दिन आँख  खुलती तो बस यही लगता किसी दरवाज़े की   झिरी से अपने की सूरत दिख जाएं।

एक मुठ्ठी धूप अपनो की गर्माहट लेकर आएं। वह पाँच दिन कभी नही भूल नही   सकती। बेइंतहा दर्द से  झुझता जिस्म औऱ लाचार जिंदगी  की उफ़्फ़फ़।

 आज अपनो की दुआओं से सकुशल घर लौटी हूँ तो दिनभर बच्चों और इनके चेहरे को एकटक निहारती रहती हूँ।वे चेहरे मेरी   बुरी कंडीशन में एक दूसरे  को कितना सांत्वना देते रहे होंगे। एक दूसरे को आँखो से पढ़ते होंगे और कहते होंगे all is well। माँ हूँ न समझ सकती हूँ।घर वापस आई तो छुटकू चुपके से आ लिपट गए औऱ आँसुओ का बाँध खोल दिया।।मिल नही पाया था न हफ़्तों तक। वजह मिलने का समय बंधा था। मेरा छुटकू पल भर में बड़ा हो गया था।

रही बात बड़के की तो मंडराता ही रहता है इर्द गिर्द   की अब देखता हूँ कैसे जाती हो इधर उधर।  औऱ जीवन साथी वह मेरी आँख खुलने से लेकर मुझे रात की इन्सुलिन लगाने तक माँ  की तरह रॉबर्ट बन मुझे बच्चे सा संभालता है।नज़र भर नही देखता है।जानता है अगर मेरी नज़रो से नज़रे मिलाएगा वहाँ आँसुओ का सैलाब आ जाएगा। पर  हाँ doctors के followups के वक्त जब वह मेरा हाथ पकड़ता है तो उसके हाथों की ऊर्जा सिर्फ बात कहती है सुनो

All is well

औऱ मैं पगली एक माँ, एक बेटी,एक भाभी,एक दीदी,एक मामी, एक सखी के साथ जीवनसाथी की संगिनी बन।उस सशक्त वक्त के हाथों की  कठपुतली बन फिर एक संघर्ष के लिए अपनो के साथ जिंदगी की तरफ़ कदम बढ़ाती हूँ। जानती हूँ मेरे अपनो का हाथ मुझे थामे रहेगा और मैं उनकी ऊर्जा बन उनकी भागमभाग में हमेशा साथ दूँगी।क्योंकि वो है तो मैं हूँ।पिंटू वंदना की भागमभाग मुंबई में एकपाँव औऱ दूसरा मेरे साथ मानो बस का सफर तय कर रहे थे।इसी बहाने घर का सबसे बड़ा चिराग लौट आया था।उसके आने से मैं निश्चिन्त हो  चली थी और ज़िन्दगी की बड़ी जंग लड़ने को तैयार थी।और एक यह निशिचिन्तता भी की मेरे न रहने पर मेरा घर बकायदा घर रहेगा।वक्त का यह तोहफा नायाब रहा। साँसे चलने लगी थी शायद एक उम्मीद जग गई थी बरसो बाद।

जाते जाते  छोटे भाई का कहना #अक्का घबराना नही मैं हमेशा साथ हूं लगा पिता का साया अब  भी मौजूद हैं।दिल थोड़ा फिर संभला। हांजी अब आश्वस्त हूँ।जिंदगी की हर  जंग लड़ने को तैयार हूँ।

वक्त की हर शह गुलाम औऱ मैं सिर्फ मेरे अपनो की। इस तरह तुम सभी का रूहानी साथ मुझे तुम सँग पकड़े रहा। जब मैं जिंदगी से लड़ रही थी। मेरे अपने सभी साथ होते जब मेरी आँखें खुलती अपने इर्द गिर्द सबको देखती तब विश्वास हो जाता था कि अपने है तो डरने की जरूरत ही नही।औऱ दूसरी तरफ दोस्ती    मुझे एक मजबूत संबल दे रही थी। बारी बारी सभी का स्नेह।मिल रहा था। खून पिलाने में कोई पीछे नही रहा।उन सभी का आभार (जो बेहद छोटा शब्द है) उनकी बदौलत आज हूँ मैं।

मैं सदैव कृतज्ञ रहूँगी