23 मार्च : जिंदा ही नहीं, मौत के बाद भी अंग्रेजों के मन में भगत सिंह के लिए रहा था खौफ

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23rd March, 2018, Edited by Focus24 team

नई दिल्ली। आज 23 मार्च है। इतिहास के पन्नों में यह दिन सुनहरे अक्षरों में सुशोभित है। इस दिन भारत के तीन वीर बेटे हंसते हंसते फांसी के फंदे पर झूल गए थे। उन्होंने भारत मां के लिए हंसते हंसते अपनी जान कुर्बान कर दी थी। 
हम सब यह बात अच्छे से जानते हैं कि भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को 23 मार्च 1931 को फांसी दी गई थी। लेकिन क्या आप जानते हैं कि फांसी की तारीख 23 नहीं बल्कि 24 मार्च सुनिश्चित गई थी। अंग्रेज यह बात भलीभांति जानते थे कि भगतसिंह की फांसी होने से एक बड़ा जनाक्रोश पैदा होगा जिसे अंग्रेजी सरकार झेल नहीं पाएगी। इसलिए तीनों वीरों को उनके समय से 11 घण्टे पहले ही फांसी दे दी गई। भारत मां के तीनों सपूत हंसते हंसते फांसी के फंदे को गले लगा लिया था

मौत के बाद हुआ ये हाल

अधिकतर लोग फांसी के बारे में तो जानते हैं लेकिन उसके बाद की घटना के बारे में नहीं जान पाते। दरअसल, अंग्रेजी सरकार के जेहन में इन तीनों वीरों का इतना खौफ पैदा हो गया था कि उनके मरने के बाद उनकी लाश के कई टुकड़े करके बोरी में भरे गए। अंग्रेज सैनिक बोरी में भरकर सेंट्रल जेल की पीछे की दीवार तोड़ते हुए बोरियों को सतलज नदी के किनारे ले जाकर फेक रहे थे। तभी वहां उपस्थित जन समूह ने कुछ संदेहास्पद स्थिति देखी। अंग्रेज लोगों को आता देख वहां से भागे। जनता ने जब लाश के कुछ टुकड़ों को मिलाया तो पता चला कि ये भगतसिंह, राजगुरु और सुखदेव की लाश है। तत्पश्चात उनका विधिपूर्वक अन्तिमसंस्कार किया गया।
वास्तव में भगत सिंह एक विचार थे जो कि जन्म जनता के दिलों में अपना घर बना चुके थे। इतिहास में उनके जीवन की कई घटनाओं का वर्णन है। भगतसिंह को पढ़ा नहीं जा सकता, उन्हें जिया जा सकता है।

बम फेंक दी थी गिरफ्तारी

साइमन कमीशन का विरोध कर रहे लाला लाजपत राय की मौत का बदला लेने के लिए भगतसिंह और राजगुरु ने ब्रिटिश एसएसपी सॉन्डर्स की गोली मारकर हत्या कर दी थी। जिसका अंग्रेजी सरकार के पास कोई सबूत नहीं था। 1929 में भगतसिंह और बटुकेश्वर दत्त ने सेंट्रल असेम्बली में बम फेंका और अपनी गिरफ्तारी दी। 

116 दिनों तक रहे थे भूखे

भगतसिंह को जेल में डाला गया। वे जेल में भी शांत नहीं बैठे थे। उन्होंने अंग्रेजी सरकार के खिलाफ वहां भी जंग छेड़ी। उन्होंने देखा कि वहां भारतीय कैदियों  के साथ बहुत अन्याय हो रहा है। उन दिनों  उन्हें ठीक तरीके से भोजन भी नहीं दिया जाता था। स्थिति देख उन्होंने भूख हड़ताल शुरू कर दी थी। वे इस दौरान 116 दिनों तक भूखे रहे थे। जिसके बाद अंग्रेजी सरकार को उनके आगे झुकना पड़ा था। 
अंग्रेजी सरकार जब सभी ओर से हारने लगी , तब उसने सभी बिना सबूत के भगतसिंह, राजगुरु और सुखदेव पर असेम्बली में बम फेंकने और सॉन्डर्स की हत्या समेत कई केस उनपर लाद दिए। जिसके तहत उन्हें फांसी की सजा सुनाई गई।
वास्तव में भगतसिंह जैसे पुरुष कभी मरते ही नहीं, वे अपने विचारों में सदैव जिंदा रहते हैं। 23 मार्च 1931 की घटना के बाद वे हमेशा के लिए अमर हो गए।