... तो ये हैं भारत के एकलौते संस्कृत भाषी अधिवक्ता, द्रोपदी को वेश्या कहने पर कर्ण पर किया मुकादम

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22nd September, 2018, Edited by Neeraj tripathi

वाराणसी सिटी। अभी कुछ दिन पहले आपने “हिंदी दिवस” मनाया। लेकिन कम ही लोगों को पता होगा कि वाराणसी सिटी (काशी) में “संस्कृत दिवस” भी मनाया जाता है। जी हाँ, पुरे देश में एकलौते संस्कृत भाषा में बहस करने वाले पंडित श्याम जी उपाध्याय हर साल “संस्कृत दिवस” मनाते हैं। खास यह है कि संस्कृत में पांच श्लोक या मन्त्र सुनाने वाले अधिवक्ता को इनकी तरफ से सर्टिफेकेट और कुछ पुरस्कार भी दिया जाता है।  

संस्कृत को बढ़ाने की “जिद”

एक समय था जब संस्कृत जानने वाले को विद्वानों में गिना जाता था। समाज में लोग बड़ी इज्जत करते थे। आज संस्कृत भाषा को कम तवज्जो दिया जा रहा है। सही कहे तो आज सिर्फ पूजा पाठ तक ही सिमट कर रह गई है “संस्कृत भाषा” जबकि एक वक्त था जब लोग संस्कृत में ही बातचीत और लिखा-पढ़ी करते थे।  ऐसे में कई भाषाओं का जन्म देने वाली संस्कृत की जगह आज अंग्रेजी सर चढ़कर बोल रही है तो आज भी इस संस्कृत को बचाने और इस को जन-जन तक पहुंचाने की कवायद में कुछ लोग जुटे हुए हैं जिनमे से एक हैं श्याम जी उपाध्याय।

कोट, कचहरी और ड्रेस सब एक, बस भाषा अलग

हर रोज सभी अधिवक्ता की तरह श्याम जी उपाध्याय भी सुबह कचहरी आते हैं।  सभी की तरह केस की तैयारी करते हैं। लेकिन इन सब में एक बात सबसे जुदा होती है वो है इनकी बहस करने की “भाषा”। दरअसल श्याम जी उपाध्याय देश में अकेले ऐसे अधिवक्ता हैं जो केस संस्कृत में के लड़ते हैं। बता दें कि श्याम जी उपाध्याय बीते 40 सालों से अंग्रेजी या हिंदी में नहीं बल्कि संस्कृत में वकालत कर रहे हैं।  

1978 से श्यामजी कर रहे हैं वकालत

मूल रूप से मिर्ज़ापुर के पंडितपुर गाँव में रहने वाले आचार्य पण्डित श्यामजी उपाध्याय ने 1978  में वकालत शुरू किया। तब से लेकर आज तक संस्कृत भाषा में सभी केस लड़े और खास यह है की कोई भी केस आजतक हारे नहीं।  

पिता की बात सुनकर बदल दिया रास्ता

बकौल, श्याम जी उपाध्याय जब मैं छोटा था, तब मेरे पिताजी एक दिन किसी से बात कर रहे थे और मै वहीँ बैठा था कि कचहरी में काम हिंदी, अंग़्रेजी और उर्दू में होता है लेकिन संस्कृत भाषा क्यों नहीं होता और यही से इस वकालत की नींव पड़ गई। मैं बड़ा होता गया, क्लास बढती गई और साथ –साथ संस्कृत भाषा में वकालत करने के इरादे और मजबूत होते गए। 1978 में डिग्री हाथ में आने के बाद इसे मूलरूप देने के लिए कचहरी आये जो आजतक एक सफल अधिवक्ता के रूप में लगातार जारी है।  

जज ने संस्कृत में दिया आदेश

अधिवक्ता श्यामजी उपाध्याय ने सभी अदालती काम शपथपत्र, प्रार्थनापत्र, दावा, वकालतनामा और यहां तक की बहस भी संस्कृत में किया हैं। बात यहीं नहीं रुकती बल्कि संस्कृत में वकालत के दौरान श्यामजी के पक्ष में जो भी फैसला और आदेश हुआ। उसे जज ने संस्कृत में या तो हिंदी में सुनाया है।  

महाभारत के कलाकारों पर मुक़दमा

अधिवक्ता श्यामजी उपाध्याय ने द्रोपदी को वेश्या कहे जानें पर महाभारत के कलाकारों पर मुक़दमा कर दिया था, जो आज भी हाईकोर्ट में लंबित है। दूसरा चर्चित मामला काशी नरेश की तरफ से मंगला आरती के प्रबंधन के खिलाफ वारंट जारी कराया हलाकि बाद में दोनों तरफ से समझौता हो गया।  

1986 में लव मैरिज भी संस्कृत में

वैसे तो अधिवक्ता श्यामजी उपाध्याय क्रिमिनल देखते हैं लेकिन अपने पेशे में पूरी ईमानदारी दिखाते हैं, इनके कई केस अनोखे हैं, जिनमे से कई लवमैरिज हैं जो इसी भाषा के बहस से एक सफल जोड़ी के रूप में एक दुसरे के साथ निभा रहें हैं।  

परिसर में प्रवेश करते हैं तो प्रणाम करने वालों तांता

माथे पर भस्म और रोली का बड़ा सा टीका, सर पर लंबी चोटी के साथ काले कोट पर दुपट्टा लेकर जब श्याम जी कचहरी परिसर में प्रवेश करते हैं तो प्रणाम करने वालों की कई हाथ एक साथ खड़ें हो जाते हैं। इस परिसर में इनको सभी इज्जत देता है, इसके अलग – अलग कारण हैं। जिनमे से एक यह कि ये लोगों को संस्कृत का ज्ञान भी देते हैं वो भी निशुल्क। श्याम जी की तरफ से संस्कृत को बढ़ावा देने के लिए लगातार प्रयास जारी है।  

दो रचनाये हो चुकी हैं प्रकशित

लगभग 60 से अधिक अप्रकाशित रचनाओं के अलावा श्यामजी की 2 रचनाएं “भारत-रश्मि” और “उद्गित” प्रकाशित हो चुकि है। कचहरी समाप्त होने के बाद श्याम जी का शाम का समय अपनी चौकी पर संस्कृत के छात्रों और संस्कृत के प्रति जिज्ञासु अधिवक्ताओं की कक्षा चला करती है। खास यह कि संस्कृत भाषा की यह शिक्षा श्यामजी निःशुल्क देते हैं। संस्कृत भाषा में रूचि लेनेवाले एक बुज़ुर्ग के अनुसार संस्कृत भाषा को लेकर पूरे न्यायालय परिसर में श्यामजी के लोग चरण स्पर्श भी करते रहते हैं। जब ये कोर्टरूम में रहते हैं तो इनके सहज-सरल संस्कृत भाषा के चलते श्रोता शांति से पूरी कार्यवाही में रुचि लेते हैं।

मिल चूका है कई पुरस्कार

आचार्य श्यामजी उपाध्याय संस्कृत अधिवक्ता के नाम से जानें जाते हैं। वर्ष 2003 में मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने संस्कृत भाषा में अभूतपूर्व योगदान के लिए इनको ‘संस्कृतमित्रम्’ नामक राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया था। बता दें कि देश के एकमात्र वकील, जो पिछले 40 वर्षों से ‘संस्कृत’ में कर रहे हैं वकालत देववाणी संस्कृत के प्रति भले ही लोगों का रुझान कम हो परंतु वाराणसी के अधिवक्ता आचार्य पंडित श्यामजी उपाध्याय का संस्कृत के लिए समर्पण शोभनीय है।

लोगों से संस्कृत बचाने की अपील

पंडित श्यामजी उपाध्याय ने कहा - हम भारतवासियों ने अपने देश की गौरवमयी संस्कृत भाषा को महत्व नही दिया। आज हमारे देश के विद्यालयों में संस्कृत बहुत कम पढ़ाई और सिखाई जाती है। किंतु आज अपनी मातृभूमि पर उपेक्षा का दंश झेल रही संस्कृत, विश्व में एक सम्माननीय भाषा और सीखने के महत्वपूर्ण पड़ाव का दर्जा हासिल कर रही है। जहाँ भारत के तमाम पब्लिक पाठशालों में फ्रेंच, जर्मन और अन्य विदेशी भाषा सीखने पर जोर दिया जा रहा है वहीं विश्व की बहुत सी पाठशालाएं संस्कृत को पाठ्यक्रम का हिस्सा बना रहे हैं।

अमेरिका के नेता राजन झेद ने कहा है कि, संस्कृत को सही स्थान दिलाने की आवश्यकता है। एक ओर तो सम्पूर्ण विश्व में संस्कृत भाषा का महत्व बढ रहा है, वहीं दूसरी ओर भारत में संस्कृत भाषा के विस्तार हेतु ठोस कदम नहीं उठाए जा रहे हैं जिसके कारण भारत में ही संस्कृत का विस्तार नहीं हो पा रहा है और संस्कृत भाषा के महत्व से लोग अज्ञात हैं। हिंदू धर्म के अलावा बौद्ध और जैन धर्म के तमाम ग्रंथ संस्कृत में लिखे गए हैं। न्यूजीलैंड की एक पाठशाला के प्रिंसिपल पीटर क्राम्पटन कहते हैं कि, दुनियाँ की कोई भी भाषा सीखने के लिए संस्कृत भाषा आधार का काम करती है।