देश का एकलौता चूहों वाला मंदिर, यहां सभी की होती हैं मनोकामना पूरी !

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22nd December, 2016 - 4:58 PM, Edited by

राजस्थान। राजस्थान के एतिहासिक शहर बीकानेर से 30 किलोमीटर की दुरी पर है करणी माता का मंदिर है जिसे देश्नोख माता के मन्दिर के नाम से भी जाना जाता है। इस मंदिर में देवी माँ करणी साक्षात् जगदम्बा की अवतार है और करणी माता के पर्चे दूर दूर तक विख्यात है। दूर दूर से लोग माता के दर्शनों को आते है।  इस मंदिर की विशेषता है कि वहाँ चूहों की पूजा की जाती है। चूहों को दूध चढाया जाता है। यहां लाखों की तादाद में चूहे दौड़ते दिखेंगे ,दूध पीते दिखेंगे ,यहाँ तक की माता करणी की मूर्ति के चारों और घूमते हुए दिखेंगे। आश्चर्य ये है कि यहाँ चूहे शुभता के सूचक माने गये हैं। यदि किसी भक्त के पाँव के नीचे आकर कभी चूहा मर जाता है तो बहुत अशुभ माना जाता है और उसके बदले वहाँ सोने या चाँदी का चूहा चढ़ाना पड़ता है।

ये करणी माता का मन्दिर बहुत ही प्राचीन काल से बना है। कहा जाता है कि करणी एक गाँव की कन्या थी जो संवत् 1595 में माँ जगदम्बा की इसी स्थान पर पूजा अर्चना और बहुत  ध्यान साधना किया करती थी। बाद में वो यहीं माता जगदम्बा के ध्यान में समाधिस्त हो गई। कहा जाता है की माता करणी जगदम्बा की अवतार थी और उन्ही में अन्तर्धान हो गई संवत् 1595 चैत्र  शुक्ल नवमी को उनका आज भी मैला भरता है और हजारों की तादाद में भक्त उनके दर्शन को आते है। कहा जाता है बीकानेर और जोधपुर की स्थापना भी माता करणी के ही आशीर्वाद से हुई है। करणी माता से जो मन्नत भक्त मांगते है माता बहुत ही विनम्रता से उसे पूरा अवश्य करती है। आजतक माता के दरबार से कोई भी खाली झोली नहीं आया ऐसा वहाँ सुनने को मिलता है। 

काले और सफेद चूह

करणी माता के मंदिर में दो तरह के चूहे आपको दिखाई पड़ेगे। इन्हें पूजा जाता है। इन चूहों में सफेद चूह के बारे में कहा जाता कि यदि पूजा करते समय ये सफेद रंग के चूहे आपकी बॉडी के किसी भी पार्ट खासकर आपके कंधे पर गिर जायें तो समझों आपके लिए यह शुभ का संकेत है। 

इन चूहों का नाम है 'काबा'

माता के रक्षा में लगे और लोगों के लिए श्रद्घा बने इन चूहों को काबा कहा जाता है। बताया जाता है कि मां को चढ़ाये गए प्रसाद को पहले इन चूहों को दिया जाता है। बाद में इसे प्रसाद के रूप मे सभी को बांट दिया जाता है।  मंदिर के चारों तरफ आपको सिर्फ चूहे ही दिखाई पड़ेगे। इन चूहों की संख्या 20,000 के आसपास बताया जाता है। 

ये है करणी माता के बारे में लोककथा 

वैसे तो करणी माता के बारे में बहुत बातें बताई जाती है। लेकिन करणी माता के बारे में एक लोककथा काफी प्रचलित है। कहा जाता है कि एक बार करणी माता का सौतेला पुत्र कोलायत में स्थित कपिल सरोवर में डूब गया जिससे उसकी मौत हो गई। जानकारी होने पर करणी माता ने यमराज से अपने पुत्र को जीवित करने की कामना की। बताया जाता है कि यमराज ने ऐसा करने मना कर दिया। जब माता ने उनको विवश कर दिया तो यमराज ने चूहे के रूप में उनके पुत्र को जीवित कर दिया। तभी से इस मंदिर में चूहों की पूजा होने लगी। 

बीमारी नहीं होती प्रसाद से

कहा जाता है कि इस मंदिर में जिसको भी प्रसाद दिया जाता है उसको इन चूहों ने पहले झूठा कर चूके होते हैं। लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि इस प्रसाद को कोई कभी बीमार नहीं पड़ता है। जबकि चूहों के झूठा खाने से प्लेग जैसी खतरनाक बीमारी होने की संभावना होती है। 

चूहों के बारे में दो कहानियां प्रचलित

करणी माता के मंदिर में रहने वाले चूहों के बारे में दो कहानियां बतायी जाती हैं। पहली कहान तो यह है कि करणी माता का पुत्र सरोवर में डूबकर मर गया था। जिसे बाद में यमराज ने चूहे के रूप में जिवित कर दिया। इसलिए यहां चूहों की पूजा होती है। वहीं दूसरी कहानी बतायी जाती कि 20,000 हजार सैनिकों की एक सेना एक बार युद्घ छोड़कर देशनोक में शरण लेने आ गई। कहा जाता  है कि इन सैनिको को करणी माता ने अपने शरण में ले लिया और इनको चूहा बना दिया। तब से लेकर आज तक ये सैनिक चूहों के रूप में मंदिर की सेवा कर रहे हैं। 

चढ़ाया जाता है चांदी का चूहा

वैसे तो यहां पर रोजना कई चूहों की मौत होती है। लेकिन आप मंदिर में गए हैं यदि गलती से आपसे किसी चूहे की मौत हो जाती है। तो ऐसे में आपको चांदी के चूहा चढ़ाना होगा। वहीं सफेद चूह का दर्शन करने से आपकी सारी मनोकामनाएं पूरी हो जाती हैं। 

 मां के बाये हांथ में है त्रिशूल

आपको बता दूं कि इस मंदिर में मां का जो मूर्ति है उसमें मां ने अपने बाये हांथों में त्रिशूल को पड़ा हुआ है। 
आप कह सकते हैं कि पूरे भारत में ये एक मात्र ऐसा मंदिर है जहां पर मां ने बाये हाथ में त्रिशूल धारण किये हुए हैं। इस मंदिर का इतिहास लगभग 700 वर्ष पुराना बताा जाता है।

मुख्य कारीगर के लिए प्रसिद्घ

माता करणी मंदिर इन चूहों के अलावा अपने मुख्य कारीगरी और संगमरमर के लिए भी विख्यात है। इस मंदिर के मुख्य द्वार पर चांदी के बड़े-बड़े दरवाजा लगा है। यहां पर माता के सोने के छात्र और चूहों को प्रसाद चढ़ाने के लिए प्रयोग की जाने वाली बहुत बड़ी परात यहां की मुख्य आकर्षण का केन्द्र माना जाता है। 

चूहों का निकलता है जुलुस 

आपको बता दूं कि सुबह पांच बजे मंगला आरती और सायं सात बजे आरती के समय चूहों का जुलूस तो देखने लायक होता है। करणी मां की कथा एक सामान्य ग्रामीण कन्या की कथा है, लेकिन उनके संबंध में अनेक चमत्कारी घटनाएं भी जुड़ी बताई जाती हैं, जो उनकी उम्र के अलग-अलग पड़ाव से संबंध रखती हैं। बताते हैं कि संवत 1595 की चैत्र शुक्ल नवमी गुरुवार को श्री करणी ज्योर्तिलीन हुईं। संवत 1595 की चैत्र शुक्ला 14 से यहां श्री करणी माता जी की सेवा पूजा होती चली आ रही है। 
              
   - स्टोरी अंजू सोनी द्वारा लिखित और संपादित, खामगांव, महाराष्टï।