ऐसे समझे जन्म कुंडली में मांगलिक योग विचार...  

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26th June, 2019, Edited by Focus24 team

फीचर्स डेस्क। वैवाहिक जीवन को सुखमय बनाने के लिए वर एवं कन्या के माता-पिता विवाह से पूर्व वर- कन्या कुंडली मेलापक कराते हैं और जानना चाहते हैं कि गुण अच्छा मिल रहा है या नहीं। यह कुंडली मिलान की प्रथा वैदिक युग से ही चली आ रही है और कुंडली मिलान के समय मंगल दोष को अनदेखा नहीं किया जा सकता क्योंकि मंगल ग्रहों का सेनापति कहा गया है। यह पुरुषार्थ का प्रतीक भी है जब यह निश्चित होता है कि वर अथवा कन्या की कुंडली में मांगलिक योग बन रहा है तो अभिभावकों के लिए यह स्थिति भयानक समस्या सिद्ध होती है। वह परेशान होकर अपने लड़के के लिए मांगलिक योग वाली कन्या तथा अपनी कन्या के लिए मांगलिक योग वाला लड़का ढूंढने लगते हैं।  कभी-कभी ऐसा भी होता है कि मंगला और मंगली के कारण परेशान होकर लोग गलत संस्कार वाले के यहां अनचाहे जगह संबंध स्थापित कर लेते हैं। इस भय से कि कहीं फिर दूसरा मांगलिक योग वाला लड़का या लड़की मिलेगा या नहीं।  फिर स्थिति यह बनती है कि संस्कार भिन्नता की वजह से लड़का और लड़की तथा उनके अभिभावकों के विचार एक दूसरे से मिल नहीं पाते जिससे लोगों की आपसी सहमति नहीं बन पाती है और संबंधों में कटुता आ जाती है।  जिसकी वजह से नाना प्रकार की परेशानियां उत्पन्न होती हैं और फिर संबंध विच्छेद भी हो जाता है।  

अभिभावक को यह लगता है कि हमने कुंडली मिलान करके और अपनी मंगली कन्या का विवाह मंगले लड़के से किया फिर ऐसी स्थिति क्यों बनी इस तरह की चिंता बनी रहती है।  हम आपको बता दें कि वर- कन्या के विवाह के समय जितनी आवश्यकता शास्त्रोक्त विधि द्वारा कुंडली मिलान की है मांगलिक योग विचार की है।  कहीं उससे ज्यादा आवश्यकता दोनों के अच्छे संस्कारों की है।  यदि संस्कार अच्छे हैं तो जन्म कुंडली के दोषों का निवारण हो जाएगा संस्कार ठीक नहीं है तो सुखमय दांपत्य जीवन व्यतीत करना मुश्किल हो जाएगा।  सामान्यजन यह नहीं जानता कि जिस शास्त्र में मांगलिक योग के कारण का उल्लेख है उसी में उसका निवारण भी है और हम आपको बता दें कि भिन्न-भिन्न परिस्थितियों में मंगल दोष का परिहार जन्म कुंडली में स्वयमेव हो जाता है।  जिसे कोई भी प्रशिक्षित अच्छा ज्योतिष विद्वान बता सकता है।  

मांगलिक योग कारण और निवारण

जन्म कुंडली के जन्मांग में मंगल के लग्न में चतुर्थ में सप्तम भाव में अष्टम में तथा व्यय भावगत होने से यह योग बनता है।  जिसे मांगलिक योग कहते हैं। यह योग व्यक्ति के वैवाहिक जीवन में बाधाएं उत्पन्न करता है।  एक अनुमान के अनुसार 100 में से 70 लोगों की कुंडली में यह योग होता है।  लेकिन कुंडली में कुछ ऐसे योग होते हैं जिससे यह मांगलिक दोष प्रभावहीन हो जाता है।   

(1)- वैसे तो वर-कन्या दोनों की कुंडली में मांगलिक योग होने के कारण परस्पर दोष मिट जाता है और विवाह शुभ होता है।  

 (2)- यदि नक्षत्र राशि मिलान में गुणों की अधिकता हो तो (25 गुण से अधिक) विवाह किया जा सकता है| मांगलिक दोष नहीं लगता।  

 (3)- वर-कन्या में से किसी एक की कुंडली में मांगलिक योग हो और दूसरे में नहीं हो फिर भी मंगल से रक्षक ग्रह कुंडली में हो तो विवाह किया जा सकता है।  

 (4)- वर -कन्या की कुंडली के (1,4,7,8 ,12)वें भाव में शनि के स्थित होने से मांगलिक योग स्वयं समाप्त हो जाता है।  

 (5)- मंगल गुरु एक साथ हो अथवा मंगल चंद्रमा का योग हो या चंद्रमा केंद्र (1,4,7 ,10) स्थान में हो तो मांगलिक होने का दोष कट जाता है।  

(6)- यदि चंद्रमा शुक्र दूसरे स्थान में हों अथवा मंगल पर गुरु की दृष्टि हो या मंगल राहु के एक साथ होने पर भी मांगलिक दोष समाप्त हो जाता है।  

(7)- इसके अतिरिक्त वर -कन्या के जन्मांग में मंगल शत्रु क्षेत्रीय (मिथुन -कन्या )अथवा नीच राशिगत (कर्क) का होतो भी मंगल दोष नहीं होता। इसके अलावा भी मांगलिक दोष से बचने के लिए मंगल की शांति एवं कन्या के कुंभ विवाह इत्यादि की व्यवस्था शास्त्र में वर्णित है इसे कराकर मांगलिक दोष के प्रभाव से बचा जा सकता है। इसमें कोई संदेह नहीं है।  जो अभिभावक धन इत्यादि के लोभ में स्वार्थवश वर-कन्या के स्वभाविक गुणों की उपेक्षा कर संबंध स्थापित करते हैं उन्हें दांपत्य हनन का भीषण पातक लगता है।  अतः वर- कन्या की कुंडली का विधि पूर्वक निरीक्षण करके ही विवाह जैसे महत्वपूर्ण संस्कार को क्रियांवित करना चाहिए।   

पंडित नवीन पांडेय (ज्योतिषाचार्य), सिद्धिदात्री ज्योतिष परामर्श केंद्र –वाराणसी।