तमन्ना

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3rd April, 2019, Edited by Shivangi Agarwal

फीचर्स डेस्क। वसु अक्सर कह  देती थी  देव को तुम्हें क्या फर्क पड़ता है मेरे होने या न होने का। और देव हँस कर टाल देता उसकी बात। दोनों ढ़ाई साल पहले एक  समारोह में मिले थे। साधारण सी वसु किताबो में खोई हुई थी, एक खनकति मर्दानी आवाज से वह बरबस  निगाहें ऊपर कर ली।  वह शख्श किसी किताब को पूछ रहा था । शायद उसे   देख नही पाई पर हाँ वह आवाज़ उसके दिल में बस गई। बात आई गई हुई उस शख्श का तो पता नही। पर वसु साल में दो बार लगने वाले पुस्तक मेले में जरूर जाती दिन भर घूमती पर वह आवाज़ उसे  दुबारा नही सुनी। दो साल में वह हर उस जगह पहुँचती जहाँ पुस्तकों की प्रदर्शनी लगती।  इस साल भी वह नाउम्मीद लेकर पहुंची थी। सुबह से शाम हुई और वह मायूस होकर जैसी ही पंडाल के बाहर  आई वह आवाज़ उसे सुनाई दी। लगभग बेतहाशा भागती वह मंच तक  पहुंची। उस शख्श को वह सिर्फ back stage जाते ही देख पाई।

आनन् फानन back stage भी। पता चला महाशय निकल चुके थे। हैरां थी की तालियों की गड़गड़ाहट भी उस बन्दे को रोक नही पाई।  संकोच वश वह सिर्फ नाम ही पूछ सकी। फिर एक साल या छह महीने। आज उसने #you #tube परउस नाम से ऑडियो सुना, और commnt कर दिया। चोंक गई उसका उतर भी तुरन्त आगया धन्यवाद वसु जी। शायद वसु मौका नही छोड़ना चाहती और उसने पुनः एक टिप्पणी दी  देव सर आपकी आवाज बेहतरीन है और आपकी गज़ल भी। वसु देव की कोई भी नई  नज़्म नही छोड़ती थी सब सुनती। शायद टिप्पणी के माध्यम से दोनों में हल्की बातचीत होने लगी थी। एक दिन देव ने वसु को को  टिप्पणी में ही कहाँ मै आज आपके शहर काव्य संध्या में हूँ क्या आप आना चाहेंगी। बगैर देरी किए वसु ने हामी भर दी। मंच खचाखच भरा था। वसु पूर्णिमा के साथ हाल में दाखिल हो चुकी थी। कई शायर कलाम पढ़ चुके पर वसु को जिस आवाज का इंतज़ार था वह अब भी नदारद थी।

खैर देर हो चुकी थी वसु  हॉल से बाहर निकलने को हुई उस आवाज़ से वह थम गई। चकाचोंध से धुन्धला अक्स ही दिख रहा था देव का। नज़्म सुनाकर वह back stage ही जाएंगे यह सोच वसु वही खड़ी हो इंतज़ार करने लगी।  देव को  वह पहचान चुकी थी। जैसी आवाज़  पर उससे विपरीत व्यक्तित्व ,हँसमुख और सौम्य। प्रशंशको से घिरा वह सबसे बाइज्ज़त पेश आ रहा था।पर उसकी आँखे कुछ और हीढूंढूं रही थी। भीड़ और रुकना नामुमकिन था  तो वसु लौट पड़ी।  टैक्सी का बिल चुकता कर वसु  बेमन अपने कमरे में पहुंची। खाना खा कर वह देव की नज़्म की किताब लेकर पढ़ ही रही थी की चोंक गई। पहली नज़्म देव ने वसु के नाम प्रेषित की थी।  विषय था #वसु तुम्हारे लिए मेरी नई नज़्म# #तमन्ना।। तुमने अक्सर मुझे कहा की मुझे फर्क नही पड़ता और मै हँसकर टाल देता हूँ और टालता भी रहूँगा। सुनो एक धुन्दला अक्स है तुम्हारा और उसी अक्स पर यह यह पन्द्रह नज़्में आज तुम्हारे लिए समर्पित  करता हूँ। मेरी तुम्हारे प्रति जो भी ख़्याल है वह इसी में है।

तमन्ना कैसी लगी पढ़कर  प्रतिक्रिया जरूरत देना। 

इंतज़ार में तुम्हारा देव.....  एक मौन था वसु और तमन्ना के दरम्यान। सिरहाने देव की तमन्ना लिए वसु सिर्फ सुबह होने का इंतज़ार कर रही थी क्योंकि आज देव की दूसरी प्रस्तुति भी उसकी शहर में थी....!

कंटेंट सोर्स : सुरेखा अग्रवाल “स्वरा”, लखनऊ सिटी।