गुरु पूर्णिमा स्पेशल: ये धर्मगुरु धर्म की दीक्षा देकर शिष्यों को इतिहास के पन्नों में किया अमर

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9th July, 2017 - 8:41 PM, Edited by

नई दिल्ली। आज गुरु पूर्णिमा है। गुरु पूर्णिमा यानी गुरु का दिन, गुरु की पूजा का दिन। हिन्दू धर्मशास्त्र आदिकाल से ही गुरु की महिमा का बखान करते आ रहे हैं। धर्मग्रंथों ने गुरु को माता और पिता से भी ऊंचा बताया है। स्वयं ईश्वर ने भी इस धरा पर अवतार लेकर गुरु का पूजन कर गुरु को सर्वश्रेष्ठ बनाया। गुरु पूर्णिमा के अवसर पर आज हम आपको कुछ ऐसे गुरु और शिष्य के बारे में बताने जा रहे, जिन्हें संसार सदैव याद रखेगा।

आइए जानते हैं उन महान गुरु एवं शिष्य के बारे में-

एकलव्य और द्रोणाचार्य

द्वापर में हस्तिनापुर के निकट भील जाति के लड़के का नाम एकलव्य था। उस समय हस्तिनापुर में शस्त्र और शास्त्र की विद्या सिखाने के लिए द्रोणाचार्य बड़े प्रसिद्द हुआ करते थे। परन्तु वे केवल क्षत्रिय कुमारों को ही शस्त्र सिखाते थे। एक दिन एकलव्य ने गुरु द्रोण से शस्त्र विद्या सीखने की इच्छा प्रकट की। किन्तु ऋषि द्रोण ने मना कर दिया। एकलव्य भी अपने बात पर अटल रहने वाला था। उसने मन ही मन द्रोण को अपना गुरु मान लिया और वन में आकर वह द्रोण की मिट्टी की मूर्ति बनाकर उसी के सामने अभ्यास करने लगा। धीरे-धीरे वह शस्त्र विद्या में निपुण हो गया। एक दिन वन में एकलव्य की धनुर्विद्या देख द्रोण बड़े आश्चर्यचकित हुए। एकलव्य ने उन्हें बताया कि मैंने आपको गुरु माना और आपकी प्रतिमा के समक्ष मैंने धनुर्विद्या ग्रहण किया। द्रोण जो कि ऋषि होने के साथ ही बड़े चतुर भी थे। वे पांडव पुत्र अर्जुन को संसार का सबसे महान धनुर्धर बनाने का वचन दे चुके थे। उन्होंने तुरंत ही इस समस्या के समाधान के लिए एकलव्य से उसके बाएं हांथ का अंगूठा गुरुदक्षिणा के रूप में मांग लिया। एकलव्य ने बिना कुछ सोचे समझे तुरंत ही चाकू से अपना अंगूठा काटकर अपने गुरु को दे दिया। गुरु द्रोण उससे बहुत प्रभावित हुए।महर्षि द्रोण ने एकलव्य को इतिहास के पन्नों में अमर रहने का वरदान दिया। बाद में महाभारत के युद्ध में कौरवों की तरफ से लड़ने पर श्री कृष्ण ने एकलव्य का वध कर दिया।

कर्ण और परशुराम

महाभारत के युद्ध में एक से बढ़कर एक योद्धा शामिल हुए। लेकिन इन सब में दानवीर कर्ण का नाम सबसे ऊपर आता है। कर्ण जिसे महारानी कुंती ने जन्म दिया था। लेकिन होश संभालते ही उसने स्वयं को सूत पुत्र के रूप में पाया। किशोरावस्था प्राप्त करने पर कर्ण को धनुर्विद्या ग्रहण करने का मन हुआ। उसने ब्राह्मण वीर परशुराम (जो कि भगवान विष्णु के अवतार थे) से विद्या ग्रहण करने की ठानी। किन्तु परशुराम केवल ब्राह्मणों को ही विद्या सिखाते थे। यह बात कर्ण को भलीभांति पता थी। अतः कर्ण भेष बदलकर परशुराम से विद्या ग्रहण करने लगा। एक दिन परशुराम सो रहे थे और कर्ण उनका पैर दबा रहा था। अचानक से एक बिच्छु कर्ण को डंक मारने लगा। किन्तु कर्ण ने उस बिच्छू का पूरा डंक अपने शरीर पर ले लिया। उसने बिच्छु को अपने गुरु के शरीर पर चढ़ने नहीं दिया। कर्ण के शरीर से रक्त बहता देख परशुराम सब समझ गए। उन्हें यह भी समझता देर न लगी कि कर्ण ब्राह्मण नहीं है। परशुराम के सब पूछने पर कर्ण ने अपना वास्तविक परिचय बताया। कर्ण के झूठ बोलने पर परशुराम उसपर अत्यंत क्रोधित हुए और उसे श्राप दिया कि जब इस विद्या की तुम्हें ज़रुरत होगी उस समय तुम उसे भूल जाओगे। महाभारत के युद्ध में कर्ण और अर्जुन के युद्ध में कर्ण अपनी सारी विद्या भूल गया और अर्जुन के हाथों मृत्यु को प्राप्त हुआ।

लव-कुश और वाल्मीकि

श्री राम के सीता से अलग होने के पश्चात् सीता महर्षि वाल्मीकि के आश्रम में रहने लगीं। वहां पर उन्होंने दो जुडवा पुत्रों लव और कुश को जन्म दिया। लव और कुश बचपन से ही बड़े वीर थे और गुरु की आज्ञा का पालन करने वाल थे। उन्होंने बाल्यकाल में ही अपने गुरु महर्षि वाल्मीकि से कई विद्याओं को प्राप्त किया। लव और कुश ने अपने पराक्रम से अयोध्या में अश्वमेध यज्ञ के समय महा पराक्रमी लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न एवं हनुमान से युद्ध कर उन्हें उन्हें पराजित किया तथा उनके अहंकार का दमन किया।

कृष्ण और संदीपनी

कृष्ण जो कि स्वयं परब्रह्म के अवतार थे। किन्तु उन्होंने भी इस संसार को गुरु की महिमा को बताया। संदीपनी मुनि के आश्रम में शिक्षा ग्रहण के दौरान वे अन्य शिष्यों की भांति केवल एक शिष्य बनकर ही रहे। उन्होंने स्वंय को इश्वर होने की किसी को भनक तक नही लगने दिया। उनके गुरु ने उनसे गुरुदक्षिणा के रूप में उनके मृत पुत्र का जीवन मांग लिया था। जिसे कुछ समय पहले यमुना में नहाते समय एक राक्षस ने खा लिया था। श्री कृष्ण ने अपने भाई बलराम संग यमुना में पांचजन्य राक्षस का वध किया तथा यमलोक जाकर यमराज से महर्षि संदीपनी के पुत्र का जीवन मांग लाए। महर्षि को यह समझते देर न लगी कि कृष्ण कोई और नहीं बल्कि नारायण ही हैं लेकिन तब भी कृष्ण केवल एक शिष्य ही बनकर रहे।

कृष्ण और अर्जुन

योगिराज कृष्ण महाभारत के युद्ध में अर्जुन के सारथी होने के साथ उनके गुरु भी बनकर रहे। जब अर्जुन ने युद्ध में अपनों को देख शस्त्र रख दिया तब कृष्ण उनके गुरु के रूप में प्रकट हुए। उन्होंने अर्जुन को गीता का ज्ञान दिया जो कि आज भी पूरे संसार को धर्म सिखाता है। गीता का उपदेश पाकर अर्जुन युद्ध करने को राजी हुए और धर्म और अधर्म के युद्ध में धर्म की जीत हुई।