वह अपूर्ण मिलन...!

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28th January, 2019, Edited by Focus24 team

प्रेम की कसौटी पर अक्सरउग आया करती है  फफूँद

नर्म होती ज़मीनी जागीर पर वह टिकती है

पर ज़ोर ज़बरदस्ती से वह अक्सर बंजर हो जाया करती है

एक मुरझाए हुए खर पतवार सी..!!

उस अमावस से चाँद की स्याही  और पूर्णिमा से चमकते इश्क को 

अक्सर नज़रंदाज़ कर देती है,  कई रश्मि तारिकाएं जानती है

वह पन्द्रह दिन का अंतराल जरूर रोशन करेगा

आकाश गंगा और अपनी सोलह कलाओं से परिपूर्ण करदेगा

वह अपूर्ण मिलन...!!

हाँ उगी हुई  फफूँद जब हौले हौले सुख करलेने लगती है

रंगहीन आकार तब जाकर  प्रेम की कसौटी को

मिलने लगता है एक आधार...!!

यक़ीनन सशक्त होती अमावस सौंप देती हैं

खुद को हारने के लिए सिर्फ इश्क की पूर्णमासी पर

और तब जाकर बंजर होती मुह्ह्बत  पर अंकुरित होती

एक बारिश के  बोसे में इश्क की कली....!!

स्वरा” सूरेखा अग्रवाल, लखनऊ सिटी.