international women's day special : सोचिए अगर भगवान औरत होते तो क्या होता......?

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8th March, 2019, Edited by Shikha singh

फीचर्स डेस्क। अगर भगवान आम महिला होते तो सोचिए क्या करते ? जब भी ऐसा सोचती हूं तो लगता है वो भी अपने अस्तित्व के लिए हर पल लड़ते । क्या एक महिला के कर्म ईश्वर से कम होते हैं ? जरा सोचिए ! 

नहीं _हर महिला अपने आप में ईश्वर का रूप होती है जो हर दायित्व निभाती है बिना कोई भी शिकायत किये। जन्म लेते ही पिता के सम्मान का दायित्व,विवाहोपरान्त मायके , ससुराल के मान सम्मान का दायित्व। घर के ढ़ेर सारे काम। स्वयं का तो अस्तित्व ही खत्म हो जाता है । वैसे एक औरत का अस्तित्व होता ही क्या है ? नाम के पीछे लगा सरनेम भी तो बिना उससे पूछे शादी के बाद बदल दिया जाता है। वो जीती ही कब है अपने लिए। उसे हक ही नहीं दिया जाता स्वयं के लिए सोचे। हर बार उसे मान सम्मान की दुहाई देकर उसकी भावुकता को अदृश्य चाकू की नोंक पर रखकर उसकी खुशियों इच्छाओं को त्यागने पर मजबूर किया जाता है। उसे स्वयं के लिए जीना तो सिखाया ही नहीं जाता। शादी होते ही पति और उसके परिवार की जिम्मेदारियों को निभाना ही वो अपना धर्म-कर्म और जीवन का एक मात्र लक्ष्य समझती है। इतना कुछ करने के बाद भी उसे कहा जाता है !

 "तुम करती ही क्या हो" ? "तुमने किया ही क्या है" ?

 जो तुम करती हो वो तो एक नौकरानी भी कर सकती है । लोग इस तरह के शब्द बोलने से पहले ये भी नहीं सोचते कि उस औरत पर ये सुन कर क्या बितेगी जिसने अपना पूरा जीवन ही उस परिवार को दे दिया जिसने दिल से कभी उसे अपनाया ही नहीं ! पर यही जहरीले शब्द औरत के अस्तित्व को अब ललकार रहे हैं । 

वो अब अपने वजूद की न केवल तलाश ही कर रही है बल्कि लड़ भी रही है। पुरूषों से अगर तुलना की जाए तो हर मायने में वो श्रेष्ठ है पर फिर भी उसे लड़ना पड़ता है अपने वजूद के लिए।

अब जरा सोचिए अगर भगवान होते औरत की जगह तो क्या इतना कुछ सह पाते ? 

क्या आपको नहीं लगता औरतें भी पूजन योग्य होती है ?

मगर पूजन तो छोड़िए उसे तो बस भोग की वस्तु समझा जाता है। त्याग समर्पण की प्रतिमूर्ति समझा जाता है। उसका थोड़ा सा विरोध पुरुष के पौरुष को ललकार देता है।

 मेरी इन बातों से कई लोग कहेंगे "अब समय बदल गया है" ! पर मेरी दृष्टि में सब कुछ वैसे का वैसा ही है। कुछ भी नहीं बदला है। हां अगर कुछ बदला है ,तो वो है_ औरतों की सोच स्वंय को लेकर। वो अब सह नहीं रही बल्कि अपने अस्तित्व के लिए लड़ रही है पहली लड़ाई तो घर से ही शुरू होती है उसकी । कदम बाहर निकले नहीं कि उसे चरित्र हीन,घटिया ,बाजारु जाने किन किन नामों से नवाजा जाने लगता है । पर अब वो डर नहीं रही न ही पलट झगड़ रही है बल्कि अपने कर्मों को और दृढ़ करके मुंहतोड़ जबाव दे रही है । पहले परिवार ,पति ,बच्चे ही उसकी दुनिया थे जो उसका पूरा जीवन था पर अब वो स्वयं के लिए भी जी रही है हर दायित्व निभाते हुए भी तो बोलिए हुई न "अष्टभुजाधारी" ! फिर भी पूज्नीय नहीं वो अब सोचिए भगवान अगर होते एक औरत तो इतना सह भस्म न कर देते संसार को औरत बन कर तो उन्हें स्वयं को ही हर पल साबित करना पड़ता कि मैं भी हूं यहां जो तुम्हारे जीवन रथ को मौन रहकर अपने प्यार और त्याग से सींच रहा हूं । 

एक औरत का जन्म किसी संघर्ष से कम नहीं होता । 

कितने लोग कहते हैं औरतों को अब सम्मान मिल रहा है मगर सच कहूं तो औरतों का अब भी सम्मान नहीं बढ़ा है, बल्कि उसने अब अपना सम्मान करना सीख लिया है जो उसे सम्मानित कर समाज में स्थान दें रहा है। एक कटु सत्य ये भी है कि जब तक औरतें अपना सम्मान नहीं सीखेंगी तब तक कोई उनका सम्मान नहीं करेगा । 

मैं भी एक औरत हूं और ये बखूबी जानती हूं हर मुस्कुराता चेहरा खुश नहीं होता और हर जगह भगवान नहीं पहुंच पाता तभी तो उन्होंने औरत का सृजन किया। जिस घर में औरतों को सम्मान दिया जाता है उन्हें समानता का अधिकार दिया जाता है  वही भगवान वास करते हैं  और उस घर को मन्दिर कहते हैं औरत जीवन सरल नहीं तभी तो वो भगवान के स्थान पर नहीं है और भगवान औरत के स्थान पर नहीं है।

कंटेंट सोर्स : रुबी प्रसाद, सिलीगुड़ी सिटी।