आसमाँ..

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25th February, 2019, Edited by Focus24 team

फीचर्स डेस्क। बस चीखे ही थी अंतर्नाद करती हुई। हुजूम रिश्तों  का।  अंदर बाहर सब खचाखच। निमेष  भौचक्का था कि नित्या ने इतने लोगों को जोड़ा है और मैं उसे कुछ भी नही समझता था।  पंडित आभासी दुनिया  के मित्र एडिटर्स प्रकाशन संस्थाएं एनजीओ  वाले सब मौजूद थे।  कही न जाने वाली नित्या अपनी लेखनी से इतना आगे बढ़ गई थी। यह अंदाज़ पूरे परिवार को नही था। उसका मृदु भाषी सौम्य स्वभाव ही था  जो उसे सबसे जोड़े रखता।  राम नाम सत्य है के मंत्रोच्चार   के  बीच वह दुल्हन सी सजी अपने आखरी सफर पर चल पड़ी थी। दर्द और बीमारी से आखिर वह हार गई थी और अग्नि में विलीन एक शांत धारा बन अंतिम समागम की तरफ चल पड़ी थी। युगों तक एक शांत सन्यास जो  पता नही कब किस तरह से उसे पुनः पल्लवित करेगा। कौन जाने...!!

अग्नि की प्रचण्ड लौं को आँसू भरी  निगाहों से वह अपलक उसमे समाहित  होती जा रही नित्या को देख रहा था। अबूझ बेबस ओर बेवजह का पश्चाताप।जिसे चाहकर भी वह पूरा नही कर सकता था। चलचित्र भांति उसके आंखों के सामने बस यादें  ही जीवंत होती जा रही थी। याद आया उसे कॉलेज का वह पहला दिन....!! 

नित्या जब उससे पहली बार लाइब्रेरी में  मिली थी।जब दोनों को ही किताब चाहिए थी और उस किताब पर दोनों ने एक साथ हाथ रखा था।।एक क़िताब थी तो दोनों को एक हफ्ता आधे दिन के लिए वह किताब रखनी पड़ती।  निमेष कॉलेज में  ही नोट बना लेता ओर नित्या किताब  घर ले जाती

विषय एक थे तो अब दोनों कई बार आमना सामना हो जाता थ।  नित्या  स्वभाव से शर्मीली थी और नित्यम उतना ही शरारती।

कॉलेज पूरा हुआ और नित्यम को आस्ट्रेलिया  जाने का ऑफर भी। झट मँगनी ओर पट  शादी भी...!! धीरे धीरे पारिवारिक जिम्मेदारियां ओर एकांत की आदि अक्सर नित्यम से  कुछ कहना चाहती पर नित्यम  कि अत्यधिक व्यस्तता  प्रणय निवेदन भी ठुकराती रही।कई बार बेबस उसकी हसरत भरी निगाहें उसे बहुत कुछ कहती। जीना चाहती थी वे ओर इसी तरह पराए देश मे नितांत अपने के बीच वह तन्हा होती गई।नित्यम के दौरे एक देश से कभी दूसरे ।वह घर आता पर थका हुआ सा..!!

  दो जिंदगीयां साथ चल रही थी पर एक एकांत में ओर दूसरी व्यस्तता में। कोशिश बहुत करती पर अब जिंदगी ढलने  लगीं थी समय से पहले ओर एक दिन....!!!

 मृत्यु  के बाद भी जीवन होता है  या  नही ? कौन जाने?

 पर बीते पल   चिंतन  और यादे सदैव साथ रहती है।और चलता रहता है एक भरपूर एकांतवास पश्चताप के साथ।जिसकी मुक्ति स्वयं के अंत के बाद से ही  मिलती है तब तक जीवन समर्थन प्रणाली हमेशा के लिए विदा ले चुकी होती है। जिसका अंजाम तो बेहद खूबसूरत होता है पर अंत बेहद दुखद।नित्यंम अब भी उस नीले धुँए  को देख रहा था  जो क्षितिज  को छूने  कि कोशिश में था।मानो नित्या  अपने पसन्द के स्याह दुप्पटे को ओढ़े केसरिया आसमा से मिलने को ततपर हो। हाँ आज एकांत की बेड़ियों  को छोड़ उनमुक्त गगन में आज़ाद वह दुल्हन बन अपने मन को वरण  करने। आज  आसमा में तारो की बारात जरूरत से ज़्यादा आबाद ओर जवान थी। एक धरती का विशेष तारा उनमे शामिल जो  हुआ था। ओर धरा पर एक साहित्य सितारा अस्त हो चला था।  सच हो तो है सबके हिस्से अपने अपने  आसमाँ..!!!

कंटेंट सोर्स : सुरेखा अग्रवाल "स्वरा"  लखनऊ सिटी।